Wednesday, January 20, 2010

ज्योतिर्मयी - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला'

एक
"मानती रहें, चूंकि आप ही लोगों ने, आप ही के बनाये शस्त्रों ने, जो हमारे प्रतिकूल हैं, हमें जबरन गुलाम बना रखा है; कोई चारा भी तो नहीं है-कैसी बात है।" कमल की पंखुङियों सी उज्ज्वल बङी-बङी आंखों से देखती हुई, एक सत्रह साल की, रूप की चन्द्रिका, भरी हुई युवती ने कहा।
"नहीं, पतिव्रता पत्नी तमाम जीवन तपस्या करने के पश्चात परलोक में अपने पति से मिलती है।" सहज स्वर में कहकर युवक निरीक्षक की दॄष्टि से युवती को देखने लगा।
युवती मुस्कुराई-तमाम चेहरे पर सुर्खी दौङ गयी। सुकुमार गुलाब के दलों से लाल-लाल होंठ जरा बढे, मर्मरोज्ज्वल मुख पर प्रसन्न-कौतुक-पूर्ण एक्ज्योतिश्चक्र खोलकर यथास्थान आ गये।
"वाक्ये का दरिद्रता!" युवती मुस्कुराती हुई बोली, "अच्छा बतलाइये तो, यदि पहले ब्याही स्त्री इसी तरह स्वर्ग अपने पूज्यपाद पति-देवता की प्रतीक्षा करती हो, और पतिदेव क्रमशः दूसरी, तीसरी, चौथी पत्नियों को बार-बार प्रतीक्षार्थ स्वर्ग भेजते रहें, तो खुद मरकर किसके पास पहुंचेंगे?
युवती खिलखिला दी।
युवक का चेहरा उतर गया।
"आपने इस साल एम.ए. पास किया किया है, और अंग्रेजी में। यहां पतिव्रता स्त्रियों की पत्नीव्रत पुरुषों से ज्यादा जीवनियां आपने याद कीं!" युवती ने वार किया।
युवक बङे भाई की ससुराल गया था। युवती उसी की विधवा छोटी भाभी है।
"आपने कहां तक पढा है?" युवक ने जानना चाहा।
"सिर्फ हिन्दी और थोङी सी संस्कृत जानती हूं।" डब्बे को नजदीक लेकर युवती पान चबाने लगी।
"मैं इतना ही कहता हूं, आपके विचार समाज के के तिनके के लिये आग हैं।"ताज्जुब की निगाह देखते हुये युवक ने कहा।
"लेकिन मेरे हृदय के मोम के पुतले को गलाकर बहा देने, मुझसे जुदा कर देने के लिये समाज आग है, साथ-साथ यह भी कहिये।" उंगली चूनेदानी में, बङी-बङी आंखो की तेज निगाह युवक की तरफ फेरकर युवती ने कहा, "मैं बारह साल की थी, ससुराल नहीं गयी, जानती भी नहीं, पति कैसे थे, और विधवा हो गयी।" कई बूंद आंसू कपोलों से बहकर युवती की जांघ पर गिरे। आंचल से आंखे पोंछ लीं , फिर पान बनाने लगी।
"तम्बाकू खाते हैं आप?" युवती ने पूंछा।
"नहीं।" युवक के दिल में सन्नाटा था। इतनी बङी, इतने आश्चर्य की, इतनी खतरनाक बात आज तक किसी विधवा युवती की ज़बान से उसने नहीं सुनी। वह जानता था, यह सब अखबारों का आन्दोलन था। इस तरह की कल्पना भी उसने कभी नहीं की थी। कारण, वह कान्यकुब्जों के एक श्रेष्ठ्र कुल में पैदा हुआ था। युवती की बातों से घबरा गया।
"लीजिये" युवती ने कई बीङे उसकी ओर बढा दिये।
"आप बुरा मत मानियेगा, मैं आपको देख रही थी कि आप कितने दर्दमंद हैं।" युवती ने साधारण आवाज में कहा।
युवक ने पान ले लिये, पर लिये ही बैठा रहा। खाइये" युवती ने कहा, "आप से एक बात पूंछूं?"
"पूंछिये।"
"अगर आपसे कोई विधवा-विवाह करने के लिये कहे?" युवती मुस्कुराई।
"मैं नहीं जानता, यह तो पिताजी के हांथ की बात है।" युवक झेंप गया।
"अगर पिताजी की जगह आप ही अपने मुक्ताराम होते?"संकुचित होकर, फिर हिम्मत बांध कर युवक ने कहा, "मुझे विधवा-विवाह करए हुये लाज लगती है।"
युवती मनोभावों को दबाकर, छलछलाई आंखों चुप रही। एक बार उसी तरह युवक को देखा, फिर मस्तक झुका लिया।
दूसरे दिन युवक घर चलने लगा। मकान की जेठी स्त्रियों के पैर छुये। इधर-उधर आंखे युवती की तलाश करती रहीं। वह न मिली। युवक दोमंजिले से नीचे उतरा। देखा दरवाजे के पास खङी उसी की राह देख रही है। युवक ने कहा, "आज्ञा दीजिये अब जा रहा हूं।" हांथ जोङकर युवती ने प्रणाम किया। एक पत्र युवक को देकर कहा, "बन्द दर्शन दीजियेगा।" युवक के हृदय में एक अज्ञात प्रसन्नता की लहर उठी। उसने देखा, नील पंखो पलकोम के पंखो से युवती की आंखे अप्सराओं सी आकाश की ओर उङ जाना चाहती हैं, जहांस्नेह के कल्प-वसंत में मदन और रति नित्य मिले हैं, जहां किसी भी प्रकार की निष्ठुर श्रखंला नवोन्मेष को झुका नही सकती जहां प्रेम ही आंखों में मनोहर चित्र, कंठ में मधुर संगीत, हृदय मॆं सत्यनिष्ठ भावना और रूप में खूबसूरत आग है।
युवक ने स्नेह के मधुर कंठ से, सहानुभुति की ध्वनि में, कहा, "ज्योती।"
युवती निःसंकोच कुछ कदम आगे बढ गई। युवक के बिल्कुल नज़दीक, एक तरह से सटकर, खङी हो गई। फिर युवक की ठोङी के पास, आंखे आंखो में मिली हुई। वस्त्र के स्पर्श से शिराओं में एक ऎसी तरंग बह चली जिसका अनुभव आज तक उनमें किसी को नहीं हुआ था। अंगों में आनन्द के परमाणु निकलते रहे। आंखों में नशा छा गया।
"फिर कहूंगा।"युवक सजा कर चल दिया। "याद रखियेगा-आपसे इतनी ही कर-बद्व प्रर्थना ....." युवक दृष्टि से ओझल हो गया।

दो
"दिल के तुम इतने कमजोर हो? नष्ट होते हुये एक समाज-क्लिष्ट जीवन का उद्वार तुम नहीं कर सकते विजय? तुम्हारी शिक्षा क्या तुम्हे पुरानी राह का सीधा-साधा एक लट्टू का बैल करने के लिये हुयी है?" वीरेन्द्र ने चिन्त्य भर्त्सना के शब्दों में कहा।
"पिताजी से कुछ बस नहीं वीरेन, उनके प्रतिकूल कोई आचरण मैं न कर सकूंगा। पर आजीवन-आजीवन मैं सोचूंगा कि दुर्बल समाज की सरिता में एक बहते हुये निष्पाप पुष्प का मैं उद्वार नहीं कर सका, खास तौर से इसलिये कि मुझे उसने तैरना नहीं सिखलाया।"
"तुम्हे एक दूसरी सामाजिक शिक्षा से तैरना मालूम हो चुका है।"
"हां, होचुका है, पर केवल तैरते रहना, फिर किनारे पर लगना नहीं; सब घाट हमारे समाज द्वारा अधिकृत हैं, और केवल तैरते रहना मनुष्य के लिये असम्भव है।"
तुम फूल पर आ सकते हो।"
"पर उस फूल को लेकर नहीं, जब समाज के किसी भी घाट पर नहीं जा सकता, और केवल कूल इतना बीहङ है कि थके हुये मेरे पैर वहां जम नहीं सकते, वहां दृष्टियों का ताप इतना प्रखर है कि फूळ मुरझा जायेगा, मैं भी झुलस जाऊंगा।"
तो सारांश यह है कि तुम उस पावन मूर्ति अबला का, जिसने तुम्हे बढकर प्यार किया-मित्र समझकर गुप्त हृदय की व्यथा प्रकट कर दी, उस देवी का समाज के पंक से उद्वार नहीम कर सकते?"
"देखो मेरा हृदय अवश्य उसने छीन लिया है, पर शरीर पिताजी का है, मैं यहां दुर्बल हूं।"
"कैसी वाहियात बात। कितनी बङी आत्मप्रवंचना है यह। विजय, हृदय शरीर से अलग भी है? जिसने तुम पर क्षण मात्र में विजय प्राप्त कर ली, उसने तुम्हारे शरीर को भी जीत लिया है, अब उसका तिरस्कार परोक्ष अपना ही है। समाज का ध्र्म तो उसके लिये भी था-क्या फूटॆ हुये बर्तन की तरह वह भी समाज में एक तरफ निकालकर न र्ख दी जाती? क्या उसने यह सब नहीं सोंच लिया।"
"उसमें और-और तरह की भावनायें भी होंगी।"
"और-और तरह की भावनयें उसमें होंती, तो वह तुम्हारे भाई की ससुराल वालों के समर्थ मुखों पर अच्छी तरह सयाही पोत कर अब तक कहीं चली गई होती, समझॆ? वह समझदार है। और, तुम्हारे सामने जो इतना खुली है, इसका कारण काम नहीं, यथार्त ही तुम्हे उसने प्यार किया है। अच्छा उसका पता तो बताओ।"
वीरेन्द्र ने नोटबुक निकालकर पता लिख दिया। फिर विजय से कहा, "तुम मेरे मित्र हो वह मेरे मित्र की प्रेयसी है।"
दोनों एक दूसरे को देखकर हंसने लगे।

तीन
इस घटना को कई महीने बईत चुके। अब भाई की ससुराल जने की कल्पना मात्र से विजय का कलेजा कांप उठता, संकोच की सरदी तमाम अंगो को जकङ लेती, संकल्प से उसे निरस्त्र हो जाना पङता है। उसकी यह हालत देख-देख कर वीरेन्द्र मन ही मन पाश्चाताप करता, पर तब से फिर किसी प्रकार की इच्छा का दवाब उसने उस पर नहीं डाला। विजय इलाहबाद यूनीवर्सिटी मेम रिसर्च-स्कालर है। वीरेन्द्र बी.ए. पास कर लेने पश्चात वहीं अपना कारोबार देखने में रहता है। वह इटावे के प्रसिद्व रईस नागर्मल-भीखमदास फ़र्म के मालिक मंसाराम अग्रवाल का इकलौता लङका है।
महीने के लगभग हुआ, वीरेन्द्र इटावे चला गया है। चलते समय विजय से विदा होकर गया था।
इधर भी, ती-चार दिन हुए, घर से पत्र द्वारा विजय को बुलावा आया है। जिला उन्नाव, मौजा बीघापुर विजय की जन्म्भूमि है।
उसके पिता अच्छी साधारण स्थिति के मनुष्य हैं, मांझगांव के मिश्र, कुलीन कान्यकुब्ज। विवाह अधिक दहेज के लोभ से उन्होंने रोक रखा है। अब तक जितने सम्बन्ध आए थे, तीन हजार से अधिक कोई नहीं दे रहा था। अब के एक सम्बन्ध आया हुआ है, उसकी तरफ विजय के पिता का विशेष झुकाव है। ये लोग मुरादाबाद के बाशिंदे हैं। पन्द्रह दिन पहले ही विजय की जन्मपत्रिका ले कर गये थे। विवाह बनता है, इसलिये दोबारा पक्का कर लेने को कन्या-पक्ष से कोई आया हुआ है। विजय के पिता और चाचा मकान के भीतर आपस में सलाह कर रहे हैं।
"दादा, लेकिन एक पै तो है, ये साधारण ब्राह्मण हैं, ऎसा फिर न हो कि कहीं के भी न रहें।"
"तुम भी; मारो गोली; हमको रुपये से मतलब है; हमारे पास रुपया है तो भाई-बंद, जात-बिरादरी वाले सब साले आवेंगे; नहीम तो कोई लोटे भर पानी को नहीं पूंछेगा।"
"तो क्या राय है?"
"विवाह करो और क्या?"
"सात हजार से आगे नहीं बढता।"
"घर घेरे बैठा है, देखते नहीं? धीरे-धीरे दुहो; लेकिन शिकार निकल न जाय।"
"अब फंसा है तो क्या निकलेगा।"
"डर कौन-बारात में घर के चार जने चले जायेंगे। कहेंगे दू है, खर्चा नहीं मिला।"
"वही खर्चा यहां करके खिला दिया जाय-है न?"
ठीक है।"
"बस, यही ठीक है।"
विजय के पिता पं.गंगाधर मिश्र और चचा पं.कृष्णशंकर रक्तचंदन का टीका लगाये, रुद्राक्ष की माला पहने, खङाऊं खट्खटाते हुये दरवाजे चौपाल में, नेवाङ के पलंग पर, धीर-गंभीर मुद्रा मॆं, सिर झुकाये हुये, आकर बैठ गये। एक मूंज की चारपाई पर कन्या-पक्ष के पं. सत्यनरायण शर्मा मिजंई पहने, पगङी बांधे बैठे हुये थे। मिश्र जी को देखकर पूंछा, "तो क्या आज्ञा देते हैं मिश्र जी?"
पं. गंगाधर ने पं कृष्णशंकर की ओर इशारा करके कहा, "बात-चीत इनसे पक्की कीजिये। मकान-मालिक तो यह हैं।"
पं. सत्यनारायणजी ने पं. कृष्णशंकर कीओर देखा।
"बात यह है पण्डित जी कि दहेज बहुत कम मिल रहा है। आप सोंचे कि अब तक सात आठ हजार रुपया तो लङके की पढाई मॆं ही लग चुका है। लखनऊ के बाजपेयी आये थे, हमारा उनका सम्बन्ध भी है, छः हजार देते थे, पर हमने इन्कार कर दिया। अब हमको खर्च भी पूरा न मिला, तो लङके को पढाकर हमने क्या फायदा उठाया? इस संबन्ध में (इधर-उधर झांककर) हमें कुछ मिला भी नहीं, तो इतना गिरकर...।"
"अच्छा तो कहिये, क्या चाहते हैं आप।"
"पन्द्रह हजार।"
"तब तो हमारे यहां बरतन भी साबित नहीं रहेंगे।"
"अच्छा तो आप कहिये।"
"नौ हजार ले लीजिये।"
"अच्छा, बारह हजार में पक्का।"
पं. सत्यनारायण अपनी अघारी सम्भालने लगे।
"ग्यारह हजार देते हैं आप?" पं. कृष्णशंकर ने उभङ कर पूंछा।
"दस हजार सही, बताइये।"
"अच्छा पक्का; मगर पांच हजार पेशगी।"
पं. सत्यनारायण ने कागज़, स्टांप हजार-हजार के पांच नोट निकालकर कहा, "लीजिये आप दोनो इसमॆएं दस्तखत कीजिये। पहले लिखिये, पं. सत्यनाराय्ण, मुरादाबाद, की कन्या से श्रीयुत विजय कुमार मिश्र एम.ए. के विवाह संबध में, जो दस हजार में मय गवही और गौने के खर्च के पक्का हुआ है, कन्या के पिता से पांच हजार पेशगी नकद वसूल पाया, फिर स्टाम्प पर वल्दियत के साथ दस्तखत कीजिये।"
पंडित गंगाधर गदगद हो गये। लिखा-पढी हो गयी। विवाह का दिन स्थिर हो गया।
तिलक चढ गया। तिलक के पहले समय तक विजय को ज्योतिर्मयी की याद आती रही। पर नवीन विवाह के प्रसंग से मन बंट गया। फिर धीरे-धीरे, जैसा हुआ करता है, वह स्मृति भी चित्त के अतल स्पर्श को चली गयी। अब विजय को उसके चरित्र पर रह-रहकर शंका होने लगी है। सोंचता है, बुरा फंस गया था, बच गया। सच कहा है-'स्त्रीचरित्रं पुरुषस्य भाग्यं दैवो न जानाति कुतो मनुष्यः?'
अब नई कल्पनायें उसके मस्तिष्क पर उठने लगी हैं। एक अज्ञात, अपरिचित मुख को जैसे केवल कल्पना के बल से प्रत्यक्ष कर लेना चाहता है, और इस चेष्टा में सुख भी कितना। इतना कभी नहीं उसे मिला। इस अज्ञात रहस्य में ज्योतिर्मयी की अम्लान छवि एक प्रकार भूल ही गया।

चार
विजय ने विवाह के उत्सव में मिलने के लिये वीरेन्द्र को लिखा था, पर उसने उत्तर दिया, "मैं तो विजय का ही मित्र हूं, किसी पराजय का नहीं; इस विवाह में मैं शरीक न हो सकूंगा।"
जैसा पहले से निश्चय था, जल्दबाजी का बहाना कर पं. गंगाधर ने जाने-जाने रिश्तेदारों को छोङकर किसी को न बुलाया। इसी कारण ज्योतिर्मयी के यहां निमन्त्रण नहीं पहुंच सका। इधर भी जहां कहीम न्यौता गया, वहां से कुछ लोग ही आये। कारण संदेह की हवा बह चुकी थी।
बारात चली। लखनऊ में विजय की वीरेन्द्र मुलाकात हुयी। वीरेन्द्र ने पूंछा, "यार तुम तो ज्योतिर्मयी को भूल ही गये, इतने गल गये इस विवाह में!"
"बात यह है कि इस तरह की स्त्रियां समाज के काम की नहीं होतीं।"
"अरे! तुमने तो स्वर भी बदल लिया।"
"क्या किया जाय?"
"और जहां विवाह करने जा रहे हो, यही बङी सती-सावित्री निकलेगी, इसका क्या प्रमाण मिला है?"
"क्वारी और विधवा में फ़र्क है भाई"
यह मानता हूं।"
"कुछ संस्कृति का भी खयाल रखना चाहिये। संस्कृति से ही संतति अच्छी होती है।"
अरे तुम तो पूरे पं. हो गये!"
"अपने कुल का सबको ख्याल रहता है-केतहु काल कराल परै, पै मराल न ताकहिं तुच्छ तलैया।"
"अच्छा!"
"जी हां।"
"तब तो, जी चाहता है, तुम्हारे साथ मैं भी चलूं।"
"चलो, मैंने तो तुम्हे लिखा भी था, पर तुम दुनिया की वास्तविकता का विचार तो करते नहीं, विचारों की दीवारें उठाया-गिराया करते हो।"
"अच्छा भई, अब वास्तविकता का आनन्द भी ले लें। कहो कितने गिनाये?।
"दस हजार।"
"दस हजार! उसके मकान में लोटा त ओसाबुत छोङा न होगा?"
"कान्यकुब्ज-कुलीन हैं?"
"वे कोई मामूली कान्यकुब्ज होंगे?"
"बहुत मामूली नहीं, १७ बिसवे मर्यादावाले हैं।"
"हूं" वीरेन्द्र सोंचने लगा। "तुमसे घृणा हो गई है। जाओ अब नही ं जाऊंगा। तुम इतने नीच हो।"
वीरेन्द्र षर की ओर चला गया। बारात मुरादाबाद चली।
वर कन्या के लिये पं. सत्यनारायण जी ने एक सेकेण्ड क्लास कम्पार्टमेन्ट पहले से रिजर्व करा रखा था, और लोगों के लिये इण्टर क्लास अलग से।
पं. सत्यनारायण हांथ जोङकर पं.गंगाधर और कृष्णशंकर आदि से विदा हुये। कन्या से कहा, "बेटी, वहां पहुंचकर अपने समाचार जल्द देना।" गाङी छूट गई।
प्रणय से विजय का चित्त चपल हो उठा। अब तक जिस अदेश मुख पर असंख्य कल्पनायें की हैं उसने, उसे देखने का यह कितना शुभ सुन्दर अवसर मिला। उसने पिता को, ससुर को, समाज को भरे आनंद से छलकते हृदय से बार-बार धन्यवाद किया। साथ युवती बहू का घूंघट उठा चन्दमुख को देखने की चकोर-लालसा प्रबल हो उठी। डाकगाङी पूरी रफ्तार से जा रही थी।
विजय उठकर बहू के पास चलकर बैठा। सर्वांग कांप उठा। घूंघट उठाने के लिये हांथ उठाया। कलाई कांपने लगी। उस कंपन में कितना आनन्द है। रोंए-रोएं के भीतर आनन्द की गंगा बह चली।
विजय ने बहू का घूंघट उठाया, त्रस्त होकर चीख उठा, "ऎ!- तुम हो?"
'विवाह का यही सुख है!' ज्योतिर्मयी की आंखो से घृणा मध्यान्ह की ज्वाला की तरह निकल रही थी। छिः! मैंने यह क्या किया! यह वही विजय-संयत, शांत वही विजय है? ओह! कैसा परिवर्तन ! इसके साथ अब अपराधी की तरह, सिकुङकर, घर के कोने में मुझे सम्पूर्ण जीवन पार करना होगा। इससे मेरा वैधव्य शतगुण अच्छा था! वहां कितनी मधुर-मधुर कल्पनाओं में पल रही थी! वीरेन्द्र! तुम्हारे जैसा सिंह-पुरुष ऎसे सियार का भी साथ करता है? तुमने इधर डेढ महीने से मेरे लिये कितना दुःख, कितना कष्ट, मुझॆ और अपने इस अधम मित्र को सुखि करने के विचार से किया! १८ हजार खर्च किये! तुम्हारे मैनेजर-सत्यनारायण- मेरे कल्पित पिता- वह देवताओं का निर्मल परिवार। ज्योतिर्मयी मन ही मन और कितना, न जाने क्या-क्या सोंच रही थी।
विजय ने पूंछा, "तुम यहां कैसे आ गयीं?"
"विरेन्द्र से पूंछना।" ज्योतिर्मयी ने कहा।
ज्योतिर्मयी मिश्र खानदान मॆं मिल गई है पर वीरेन्द्र फिर विजय से नहीं मिला।

5 comments:

kase kahun?by kavita. said...

bahut khub ,niralaji ko shat-shat naman.

rashmi ravija said...

खास तौर से इसलिये कि मुझे उसने तैरना नहीं सिखलाया।"
"तुम्हे एक दूसरी सामाजिक शिक्षा से तैरना मालूम हो चुका है।"
"हां, होचुका है, पर केवल तैरते रहना, फिर किनारे पर लगना नहीं; सब घाट हमारे समाज द्वारा अधिकृत हैं, और केवल तैरते रहना मनुष्य के लिये असम्भव है।"
aaj bhi kitni praasangik hain ye panktiyaan....bahut kam hi himmat waale hote hain jo dhaara ke viprit tair kar bhi kinara paa lete hain.

niral ji ko shat shat naman aur aapna aabhar phir se is kahani ko padhne ka avsar pradaan karne ke liye...shukriya

rashmi ravija said...

aapka*

Udan Tashtari said...

निराला जी को नमन!!

निर्मला कपिला said...

बहुत अच्छी पोस्ट है निराला जी को शत शत नमन