यह आदमी

यह आदमी
सुधा इस अदमी से अब बुरी तरह तंग आ चुकी है। 'इस आदमी' से अर्थात अपने पति शिवनाथ से। पुराने संस्कारों के कारण वह अपने पति को नाम लेकर तो संबोधित नहीं कर सकती है, किन्तु प्रचलित परंपरा के अनुसार अपने बच्चों के नाम लेकर 'शेखर के डैडी' या 'सरो के बाबू' कहकर भी उसे अपने पति को सम्बोधित करना अच्छा नहीं लगता। पता नहीं क्योंइस तरह के सम्बोधनों से उसे ढलती उम्र या बुढापे के अरुआये-बसियाये दाम्पत्य की बू आती है। इसलिये शिवनाथ के लिये वह हमेशा 'इस आदमी' या 'यह आदमी' जैसे सर्वनामों का ही प्रयोग करती है।
शादी के बाद कुछ दिनों तक यह आदमी उसे थोङा अटपटा सा....कुछ-कुछ खक्की किस्म का जरूर लगा था, लिकिन वैसा कुछ नहीं जिसको लेकर चिन्तित हुआ जाये या इसके बारे में कुछ अन्यथा सोंचा जाय। बात बेबात खिजते कुढते रहना या छोटी-छोटी बातों पर भी उत्तेजित होकर देर तक बङबङाते- भूनभुनाते रहने जैसी इसकी हरक्तों को सुधा इस आदमी का स्वभाव ही मानकर अपने मन को तसल्ली दे दिया करती थी।
उसे विश्वास था कि उसके अनुभवी पिता अपनी बेटी की शादी किसी सिरफिरे पगलेट से नहीं कर सकते। इस आदमी के बारे में पूरी तरह जांच-पङताल करके और देखसुनक्र ही उन्होंने उसका रिशा तय किया था।
उसके पिता ने इस आदमी को दो साल तक हाई स्कूल में पढाया भी था और इसके पिता से भी उनकी पुरानी जान-पहचान थी। ऎसी स्थिति में धोखा खाने जैसी किसी बात की सम्भावना नहीं की जा सकती थी। रिश्ता तय करके जब पिता जी घर लौटे थे तो इस आदमी की तारीफ करते नहीं अघाते थे। जो कोई भी लङके और उसके घ र परिवार के बारे मेंउनसे पूंछता,वे एक ही बात पर जोर देकर सबसे कहते, "देखो भई, हमने धन-दौलत, कोठा अभारी नहीं देखी है, बस केवल लङका देखा है जो लाखों मॆं एक है। वैसा सज्जन, सच्चरित्र और मेधावी लङका आज के युग में विरले ही मिलता है। 'सिंपल लिविंग और हाई थिंकिग वाला लङका है। सरकारी नौकरी में भी लगा है। वैसे घर पर साधारण खेती-बाङी भी है। उसके पिता मिडिल स्कूल के प्राधानाध्यापक के पद से पिछले साल ही सेवानिवृत्त हुये हैं। पुरानी जान-पहचान और दोस्ती थी, इसलिये यह काम इतनी आसानी से बन गया, अन्यथा आज के जमाने में सरकाई नौकई में लगे लङकों की कीमत कितनी बढ गई है, आप सब लोग जानते ही हैं। मेरी सुधा बिटिया बङी किस्मतवाली है कि ऎसा लङका इतनी आसानी से मिल गया।"
इसलिये सुधा आश्वस्त थी कि यह आदमी दूसरे लोगों से थोङा भिन्न जरूर है, लिकिन पागल वागल तो कतई नहीं है। वैसे भी इस आदमी में सुधा को कुछ खास खराबी नहीं दिखाई देती है। पढा-लिखा है, व्यक्तित्व भी आकर्षक है, जुआ शराब, औरतबाजी या इस तरह की कोई बुरी लत भी नहीं है। और सबसे बङी बात जो यह कि शादी के पहले से ही अच्छी सरकारी नौकरी में लगा है। लोकनिर्माण विभाग में जूनियर इंजीनियर की नौकरी कोई ऎसी वैसी साधारण नौकरी तो नहीम है! इसी नौकरी में रहकर कितने लोगों ने लाखों-लाख कमाये हैं, जमीन मकान खङे कर लिये हैं....क्या-क्या न कर लिया है! अब कोई कुछ करना ही न चाहे तो इसमें पद और विभाग का क्या दोष?
सुधा जनती है कि उस जैसी एक साधारण शिक्षक की हाईस्कूल पास बेटी को इससे बढिया दूल्हा मिल भी कैसे सकता था! अपनी शिक्षा, रूप-गुण और परिवार की स्थिति की सीमाओं को देखते हुये उसने अपने पति के रूप में किसी आई.ए.एस-आई.पी.एस य बङे घराने के किसी राजकुमार का सपना भी नहीं देखा था। इसलिये शादी के स्मय शिवनाथ जैसा सुन्दर, स्वस्थ, वरित्र्वान और कमाऊ पति पाकर उसने अपने भाग्य को सराहा भी था।
लेकिन तब उसे कहां मालूम था कि यह आदमी ऎसा भी होगा। वेश-भूषा, रहन-सहन और बात-व्यवहार में इतना सीधा-सरल....एकदम सिधुआ सा, किंतु भीतर-भीतर तितलौकी सा कङवा....कच्चे कोयले की अंगीठी सा अंदर ही अंदर धुंआते-सुलगते रहने वाला. तेज आंच में पक रही बेसन की कढी सा भीतर ही भीतर खदबदाते, खौलते रहने वाला.....
कभी कभी तो वह इस आदमी की हरकतों से इतनी खीज और झल्ला उठती है कि अपने सिर पर दोहत्ती मार-मारकर अपने करम को कोसने लगती है। उसकी समझ में नहीं आता कि यह आदमी सारी दुनिया से खार खाये क्यूं बैठा रहता है! हर बात और हर आदमी से इसे शिकायत ही शिकायत क्यों र्हती है? क्या अपने देश में, अपने समाज में, आफिसों में, सरकार में कहीं भी कुछ अच्छा नही हो रहा है? क्या कहीं कुछ भी नहीं ऎसा जो इस आदमी को अच्छा लगे? जिसकी यह तारीफ कर सके?

सब लोग जनते हैं कि सरकार गरीबों की भलाई के लिये तरह-तरह की योजनायें चला रही है। लाखों लोगो को गरीबी की रेखा से ऊपर उठा दिया गया है, बेघर-बार लोगों के लिये घर बनाकर दिये जा रहे हैं। ये सारी बातें तो रोज-रोज अखबारों में भी छपती हैं रेडियो में भी सुनायी जाती हैं। क्या रेडियो और अखबार झूठ बोलते हैं? लेकिन यह आदमी मानता ही नहीं है। जब भी अखबार मॆं ऎसी कोई खबर छपती है, या रेडियो में सुनाई जाती है, इस आदमी पर बकने-बोलने के दौरे पङने लगते हैं। रेडियो और अखबार वालों को गाली देने लगता है, "साले सब के सब सरकार के दलाल बन गये हैं....पैसों पर बिक गये हैं। ये लोग देश और जनता के गद्दार हैं। झूठ बोलकर लोगों को फुसलाते -बरगलाते हैं। कहां गरीबी मिटी है? किसकी गरीबी मिटी है? लोग तो पहले से भी अधिक गरीब होते जा रहे हैं...."

बकता जायेगा...बकता रहेगा यह आदमी बिना सांस लिए। चाहें कोई सुने या नहीं, इसका भाषण जारी रहेगा। हर समय खीजे-कुढे रहना, चिङचिङाये-पिनपिनाये रहना, बङबङाते-मिनमिनाते रहना-भला यह भी कोई ढंग है! हमेशा थोबङा लटकाये रहेगा, जैसे दुनिया जहान की सारी विपत्ति इसी के सर आ पङी है। क्या तुम्हारे कुढने बङबङाने और थोबङा लटकाये रहने से कहीं कुछ बदल जायेगा? क्या देश-दुनिया से अत्याचार, अन्याय शोषण-उत्पीङन, गुंडागर्दी और रिश्वतखोरी तुम्हारे कुढने-बङबङाने से मिट जायेगी? क्क्या तुम्हारे कहने से सरकार पूंजीपतियों-उद्योगपतियों से धन छीनकर गरीबों में बांट देगी? क्या मंत्री और नेता लोग अपने सजे -सजाये विशाल बंगलों और फ्लैटों में झोपङपट्टी और फुटपाथ वालों को बुलाकर बैठा लेंगे? अगर कभी इसकी ऎसी आलतू-फाल्तू बातें सुनते-सुनते मन ऊब जाता है और कुछ बोल देती हुं, तो इसे जैसे मिर्ची लग जाती है और अधिक बौखला कर बोलने लगता है। कहता है, "जब ये बेईमान दगाबाज लोग खुद अपनी बातों पर अमल नहीं करते, तो मंच पर खङे होकर जनता के सामने ऎसा भाषण देते ही क्यों हैं? चुनाव के समय झूठे वायदे क्यों करते हैं?"

अब भला इस सिरफिरे आदमी को कौन समझाये कि मंच से भाषण देना तथा चुनाव के समय लम्बी लम्बी बातें करना दीगर बात है औ उस पर अमल करना दीगर बात। लाखों रुपये जो चुनाव में फूंकेगा, वह किसी न किसी तरह अपने रुपए निकालेगा कि नहीं? फिर उसे आगे भी तो चुनाव लङना है। कमायेगा नहीं तो अगले चुनाव में खर्च कहां से करेगा?
माना कि हर विभाग और महकमे में कुछ न कुछ गङबङी है। हर आफिस में भ्रष्टाचार है। काम ठीक ढंग से नहीं होता है। घूस-रिश्वत का बाजार है, गलत ढंग के लोगों का बोलबाला बढ गया है। लेकिन क्या तुम यह सब रोक सकते हो? क्या तुम्हारे पास इसे रोकने-बदलने की कुव्वत है? जब तुम्हारे किये कुछ होने वाला नहीं तो कुढ-खीजकर अपनी सेहत खराब करने का क्या फायदा? पहाङ से सिर टकराओगे तो तुम्हारा ही सिर फूटेगा, पहाङ का क्या बिगङेगा?
जब भी समझाने की कोशिश करती हूं, यह आदमी और भङक उठता है। लगता है चीखने-चिल्लाने और बकवास करने। मुझसे कहता है, "तुम्हारे जैसे सङे-गले बीमार दिमाग वालों के चलते ही इस देश में न सामाजिक परिवर्तन हो पा रहा है, न आर्थिक और राजनीतिक परिवर्तन। सूअर की तरह गंदगी को ही अपना स्वर्ग मानकर जैसे-तैसे अपनी जिन्दगी गुजार देने वाले लोग ही ॓सी बेहूदी बातें कर स्कते हैं। ऎसे ही लोग कह सकते हैं कि पहाङ से सिर टकराने से क्या होगा? गलत को गलत कहने से क्या होगा? करने से सब्कुछ होता है, सब कुछ हो स्कता है देवी जी! कभी न कभी तो टूटेगा ही। आदमी में बदलने और तोङने की इच्छा होनी चाहिये। दृढ संकल्प और पक्का इरादा होना चाहिये। अत्याचार अन्याय को सिर झुकाकर चुपचाप सहते रहकर जीने और उसका विरोध कर करते हुये उसे अस्वीकार करते हुये जीने में बहुत फर्क होता है...बहुत।"

इस तरह की अनाप-शनाप बातें बकता रहता है यह आदमी। पूरा पागल है पागल। मुझे सङियल दिमाग और नाबदान का कीङा कहता है। भला कोई सही दिमाग वाला आदमी अपनी पत्नी को ऎसा कहता है?

इसी पागलपन के चलते तो आज तक इनको पदोन्नति नहीं हुई। इससे जूनियर शर्मा भाई साहब अभियन्ता बन गये। जमीन खरीदकर इसी शहर में अपना दोमंजिला मकान बनवा लिया। पांच-पांच बच्चों को पब्लिक स्कूल में डाल रखा है। फ्रिज, टीवी, वीसीआर क्या नहीं है उनके घर में?इधर खुद सरकारी क्वार्टर में रहते हैं उधर हर महीने डेढ हजार रुपये अपने मकान का भाङा भी उथाते हैं। और एक यह आदमी है....सत्यवादी राजा हरिश्चन्द्र! दो ही तो बच्चे हैं, उन्हें भी नगर पालिका के स्कूल में डाला हुआ है। बच्चे छिप-छिप कर पङोसियों के घर टीवी देखने जाते हैं। मैंने कई बार कहा कि न बङा वाला तो एक छोटा वाला ही टीवी लेलो। किरानियों और चपरासियों के घर तक में टीवी आ गया है। क्या हम उनसे भी गये-गुजरे हैं? लेकिन इसके कान पर जूं तक नहीं रेंगती। एक दिन बहुत जिद करने लगी तो अलमारी में से सेविंग बैंक की पासबुक निकालकर मेरे आगे पटक दी, " लो, देख लो, तीन सौ इकत्तीस रुपये पङे हैं बैंक में। अगर इतने में टीवी मिलता हो तो जाकर आज ही खरीद लाओ बाजार से।"

भला तीन सौ इकतीस रुपये में कहीं टीवी मिलता है? टीवी फ्रिज तो गया भाङ चूल्हे में, शादी के बाद से अभी तक इस आदमी ने एक भी धंग की साङी दी है मुझे खरीदकर! कहीं आने-जाने के लिये सिल्क की एक अच्छी साङी लेने का मन कितने दिनों से कर रहा है। जब भी कहती हूं, लगता है दुनिया भर का लेक्चर झाङने कि इस महंगाई के जामाने में पेट में डालने के लिये मोटा अन्न और तन ढकने के लिये कैसा भी कपङा मिल जाये यही बहुत है। ये सिल्क और टेरेलीन बङे लोगों के चोंचले हैं। हम लोग एसा शौक नहीं पाल सकते। जानती हो इसी देश में हजारों लाखों लोग हैं जो कपङे और अन्न के अभाव में नंगे-भूंखे रहते हैं, दवा के बिना घुट-घुट कर मर रहे हैं और तुम चार-पांच सौ की एक साङी पहनना चाहती हो?
अब इस पगले को कैसे बताया जाय कि उन लाखों करोङो के अन्न-वस्त्र और दवा के बारे मॆं चिन्ता करने की जिम्मेदारी सरकार की है, तुम्हारी नहीं। काजी जी को शहर के अंदेशों से दुबला होने की जरूरत नहीं। तुम्हारे खद्दर के कुर्ता-पायजामा पहनने से सिल्क और टेरेलीन की बिक्री इस देश में रुक तो नहीं गई है!

मैं पूंछती हूं, उसी आफिस मॆं शर्मा भाईसाहब भी तो काम करते हैं, सक्सेना जी और तिवारी जी भी तो करते हैं! तुम्हारी तरह कौन अपने बङे आफिसरों और ठेकेदारों से लङता झगङता रहता है? ठीक है, तुम बङे संत महात्मा हो, तो मत लो घूस और रिश्वत, मत करो ठेकेदारों के जाली बिलों पर हस्ताक्षर, मत करो उनके गलत बिल पास, लेकिन दूसरों के पीछे लट्ठ लेकर क्यों पङे रहते हो? तुमने क्या दुनिया-जहन को सुधारने का ठेका ले रखा है? लेकिन यह आदमी मेरी कुछ सुने तब न! कभी इस आफिसर से लङाई करके बौखलाया हुआ घर लौटेगा, तो कभी उस आफिसर से डांट-फटकार खाकर घोंघा जैसा मुंह बनाये घर लौटेगा। ठेकेदार लोग धमकी देते रहते हैं। किसी दिन कोई गुंडा-बदमाश पीछॆ लगा देगा तब इसकी बात समझ में आयेगी। हड्डी -पसली तोङ कर रख देंगे सब।

मुझे तो कभी-कभी इस आदमी की हरकतों पर हंसी भी आती है और रोना भी। अब भला अखबार में छपी किसी खबर को लेकर कोई किसी से गाली-गलौज और हाथापाई करता है। अभी चार-पांच दिन पहले की ही बात है। अखबार मॆं कोई खबर छपी थी किबिहार के किसी गांव के उच्चवर्ग के लोगों ने हरिजलों के घर में आग लगा दी, जिससे सात हरिजन जिन्दा ही जलमरे। इनमें बच्चे और बूढे भी थे।
तिवारी भाई साहब भी वहीं बैठे थे। खबर पढने के बाद वे केवल इतना ही बोले थे, " ठीक किया बिहार वालों ने, इन लोगों को अप्नी औकात पर ल दिया।"

इतना सुनना था कि यह आदमी अगिया बेताल बन गया। लगा तिवारी जी से तू-तङाक करने। गुस्से मॆं आकर उन्हे गालियां बकने लगा, " देखो तिवारी, मेरे सामने ऎसी घिनौनी बातें करोगे तो ठीक नहीं होगा। तुममें और जानवर में कोई अन्तर नहीं है। तुम्हारा दिमाग सङ गया है। तुम्हारे भीतर आदमीयत नाम की चीज है ही नहीं। इतनी शर्मनाक अमानुषिक घटना घट गई और तुम कह रहे हो ठीक हुआ!
हरिजन क्या आदमी नहीं है? उन्हे क्या हमारे तुम्हारे जैसा जीने और रहने का अधिकार नहीं है? शर्म नहीं आती तुम्हे इस तरह की बातें करते हुये और सोंचते हुये?"

इस पर तिवारी जी भङक उठे थे। दोनो मॆं हाथा पाई की नौबत आ गई थी। वह तो पङिसी नन्द्लाल बाबू आकर बीच बचाव न करते तो उस दिन न जाने क्या हो जाता।

अब भला अखबार में छपी बात को लेकर कोई किसी से झगङा करता है! अखबार में तो रोज ही ऎसी रोज ही झूठी-सच्ची खबरें छपती रहती हैं। कौन उनको लेकर अपना सिर धुनता है। कल ही तो खबर छपी थी कि पुलिसवालों ने हिरासत में बन्द एक औरत के साथ जबर्दस्टी मुंह काला किया। खबर पढने के बाद घांटॊ यह आदमी बकता-झकता रहा, सरकार और पुलिसवालों को गालियां देता रहा, अपना सिर पीटता रहा, और फिर इसी चिन्ता में बिना खाये-पिये ही आफिस चला गया।

यह सब पागलपन नहीं है तो और क्या है? अपने बाल-बच्चों और घर-परिवार की चिन्ता नहीं और दुनिया जहान के बारे में सोंचकर अपना खून जलाते रहना। मुझे तो लगता है, यह आदमी कुछ ही दिनों में पूरा का पूरा पागल हो जायेगा। तीन बार नौकरी से सस्पेंड किया जा चुका है। इस बार किसी से लङ झगङ लिया तो नौकरी से ही निकाल दिया जायेगा। हे भगवान! तब क्या होगा हमारे बाल-बच्चों का?

लेकिन अचरज तो मुझे इस बात पर होता है कि आज भी मेरे पिता जी इस आदमी की तारीफ करते नहीं थकते। कहते हैं, "अगर इस देश में थोङे से नौजवान भी मेरे शिवनाथ बेटे जैसे हो जायं तो इस देश का नक्शा ही बदल जाय। आज देश को ऎसे ही युवकों की जरूरत है।"

खाक जरूरत है! ऎसे पागलों से कहीं देश का नक्शा बदलता है!
पता नहीं मेरे पिताजी के दिमाग में भी कोई गङबङी शुरु हो गई है क्या? न जाने कैसी एक हवा चली है, बहुत लोग इसी तरह के पागल हो रहे हैं। हे भगवान! मेरे शेखर और सरो को बचाना इस बीमारी से। सुनती हूं, यह बीमारी खानदानी होती है। तो क्या मेरे बच्चे भी...

-जवाहर सिंह

जवाहर सिंह

जन्म : छपरा (बिहार) के एक गा विष्णु पुरा- जलाल पुर बाजार में।

शिक्षा : एम.ए., पी.एह.डी. ।

हिन्दी के आधुनिक कथा लेखन में एक महत्वपूर्ण हस्ताक्षर। आज के बदले हुये ग्रामीण यथार्त और मध्यवर्गीय जीवन की त्रासद विसंगतियों की परख और पकङ के लिय अपने समकालीन लेखकों में एक चर्चित नाम। अब तक पांच उपन्यास और आठ कहानी संग्रह प्रकाशित। हिन्दी की प्रायः सभी स्तरीय पत्र पत्रिकाओं में पिछले बीस वर्षों से नियमित रचनायें प्रकाशित । अनेक कहानियों का विभिन्न भारतीय भाषाओं में अनुवाद।

सम्प्रति : मणिपुर विश्वविद्यालय इम्फाल के स्नातकोत्तर हिन्दी विभाग में आचार्य एव< अध्यक्ष

गोपाल दास सक्सेना 'नीरज'


गोपाल दास सक्सेना नीरज का जन्म ४ जनवरी १९२५ को उत्तर प्रदेश के जिला इटावा के गांव पुरावली में हुआ। उन्होंने सन १९५३ में प्रथम श्रेणी में एम.ए. किया। सालों तक सरकारी और गैर सरकारी संस्थानों में टाइपिसट और क्लर्क की नौकरियां की। बाद में मेरठ कालेज में हिन्दी प्राध्यापक हुये फिर अलीगढ के एक कालेज में पढाया। देश भर में कवि सम्मेलनों में हिस्सा लिया। फिल्मों में यादगार गीत लिखे। उनके व्यक्तित्व और कृतित्व पर अनेक विश्वविद्यालयों में शोध कार्य हुआ। भारत सरकार द्वारा पदम श्री के अलावा उन्हें अनेक और भी पुरस्कार और सम्मान मिले।
नीरज कहते हैं, “मेरी भाषा के प्रति लोगों की शिकायत रही है कि न तो वह हिंदी है और न उर्दू. उनकी यह शिकायत सही है और इसका कारण यह है कि मेरे काव्य का जो विषय मानव प्रेम है उसकी भाषा भी इन दोनों में से कोई नहीं है।"

अंधियार ढल कर ही रहेगा।

रोशनी पूंजी नहीं है, जो तिजोरी में समाये,
वह खिलौना भी न, जिसका दाम हर गाहक लगाये,
वह पसीने की हंसी है, वह शहीदों की उमर है,
जो नया सूरज उगाये जब तड़पकर तिलमिलाये,
उग रही लौ को न टोको,
ज्योति के रथ को न रोको,
यह सुबह का दूत हर तम को निगलकर ही रहेगा।
जल गया है दीप तो अंधियार ढल कर ही रहेगा।

दीप कैसा हो, कहीं हो, सूर्य का अवतार है वह,
धूप में कुछ भी न, तम में किन्तु पहरेदार है वह,
दूर से तो एक ही बस फूंक का वह है तमाशा,
देह से छू जाय तो फिर विप्लवी अंगार है वह,
व्यर्थ है दीवार गढना,
लाख लाख किवाड़ जड़ना,
मृतिका के हांथ में अमरित मचलकर ही रहेगा।
जल गया है दीप तो अंधियार ढल कर ही रहेगा।

है जवानी तो हवा हर एक घूंघट खोलती है,
टोक दो तो आंधियों की बोलियों में बोलती है,
वह नहीं कानून जाने, वह नहीं प्रतिबन्ध माने,
वह पहाड़ों पर बदलियों सी उछलती डोलती है,
जाल चांदी का लपेटो,
खून का सौदा समेटो,
आदमी हर कैद से बाहर निकलकर ही रहेगा।
जल गया है दीप तो अंधियार ढल कर ही रहेगा।

वक्त को जिसने नहीं समझा उसे मिटना पड़ा है,
बच गया तलवार से तो फूल से कटना पड़ा है,
क्यों न कितनी ही बड़ी हो, क्यों न कितनी ही कठिन हो,
हर नदी की राह से चट्टान को हटना पड़ा है,
उस सुबह से सन्धि कर लो,
हर किरन की मांग भर लो,
है जगा इन्सान तो मौसम बदलकर ही रहेगा।
जल गया है दीप तो अंधियार ढल कर ही रहेगा।

--गोपाल दास नीरज

चौराहा

पुरानी सड़क का सबसे खूबसूरत बाजार चंदनी चौक है। जहां सदा मेला लगा रहता है। सड़क के दोनों ओर फुटपाथ पर दुकाने सजी हुई हैं। रंग-बिरंगे खिलौने। भालू, बंदर, गाय, बत्तख और न जाने कैसे कैसे खिलौने थे जिन्हें देखकर किसका मन न ललचाये। एक दुकान पर कुछ लड़कियां चूड़ियां खरीद रही थीं। १० वर्षीय रीना दूर से खड़ी चूड़ियों की दुकान को देख रही थी। फिर कुछ सोंचकर दुकान पर आई और दुकानदार से पूंछा, "ये हरी-हरी चूड़ियां कैसी दीं?" "२४ रुपये दर्जन"। "२ चूड़ियां देना।" दुकानदार ने उसे दो चूड़ियां दीं। वह एक एक चूड़ी दोनों हांथों में पहनकर बहुत खुश हुई। फिर उसे ध्यान आया कि उसके पास तो पैसे भी नहीं हैं। घर में पैसे नहीं हैं यह बात वह बहुत अच्छे से जानती थी। पिता बीमार रहते थे। मां लोगों के घर बर्तन साफ करती थी। जैसे तैसे घर का खर्चा चल रहा था। रीना पिता की देखभाल व घर का चूल्हा चौका करती। उसने भी कुछ काम करके पैसे कमाने की सोंची। फिर वह काम मांगने इधर उधर जाने लगी। पर सब उसे बच्ची कहकर भगा देते। तभी उसे विचार आया कि वह चौराहे पर जाकर अपने लिये कोई काम देखे। अक्सर उसके सोनू भईया वहां अखबार बेचते और राधा गजक बेचती। यह सब देखकर रीना ने सोंचा कि वह भी कुछ काम करेगी। कभी कभी रीना सोंचती वह भीख मांगेगी पर लोग क्या कहेंगे। वह यह जानती थी कि भीक मांगना अच्छी बात नहीं है। चोरी करना भी पाप है। पर नाटक तो किया ही जा सकता है। उसने कुछ सोंचकर अपना एक हांथ फ्राक में छुपा लिया और भीक मांगने लगी। "बाबू जी पैसे दे दो। एक नहीं तो दो दे दो!" ऎसे कभी उसे पैसे मिलते कभी दुत्कार। एक बार रीना चौराहे पर भीक मांग रही थी। लाल बत्ती हुई तो एक तिपहिया आकर रुका। रीना ने उससे पैसे मांगे। तिपहिये में बैठे व्यक्ति ने उससे पूंछा, "बिटिया तुम भीख क्यों मांग रही हो? तुम्हारी क्या मजबूरी है?" "मुझे हरी हरी चूड़ियां खरीदनी हैं अंकल जी। मैं आपसे भीक नहीं मांग रही बल्कि अपना अभिनय दिखा रही हूं।" "पर तुम्हारा तो एक ही हांथ है फिर २ चूड़ियां क्या करोगी?" "नहीं अंकल जी मेरा हांथ टूटा नहीं है बल्कि मैं अपाहिज होने का नाटक कर रही हूं।" कहते हुये उसने अपना हांथ फ्राक से बाहर निकाल दिया। "तुम एक दिन महान अभिनेत्री बनोगी।" कहते हुये उस व्यक्ति ने रीना के हांथ में बीस रुपये पकड़ा दिये। "पर अकंल इतने पैसे.." बत्ती हरी हो चुकी थी। अंकल जी का तिपहिया जा चुका था। लाल से हरी व संतरी होती बत्तियों को देखते हुये रीना सोंच रही थी कि क्या वह कभी बड़ी अभिनेत्री बन सकेगी।
--शरद आलोक

श्री शरद आलोक



श्री शरद आलोक जी का वास्तविक नाम सुरेश चन्द्र शुक्ल है। वे गत २१ वर्षों से नार्वे में हिन्दी की पत्रिकाओं 'परिचय' और 'स्पाइल' का संपादन कर रहे हैं।वे हिन्दी के सुपरिचित कवि, लेखक, और पत्र कार हैं।
डा. शुक्ल अनेक भाषाओं में लिखते रहे हैं। हिन्दी में आपके सात कविता संग्रह और एक कहानी संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं। उर्दू में एक कहानी संग्रह और नार्वेजियन भाषा में एक कविता संग्रह प्रकाशित हो चुका है।

सोनांचल साहित्यकार संस्थान, सोनभद्र आपके नाम पर देश-विदेश के चुने हुये साहित्यकारों को सुरेशचन्द्र शुक्ल नामित राष्ट्र भाषा प्रचार पुरस्कार प्रदान करता है

यशपाल


यशपाल हिन्दी के उन प्रमुख कथाकारों में से हैं, जिन्होंने प्रेमचन्द की प्रगतिशील परम्पराओं को आगे बढाते हुये कथा साहित्य को जीवन की कथोर वास्तविकताओं से जोड़ा। अपनी प्रत्येक कहानी में वे किसी न किसी पारिवारिक, सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक स्तर पर हो रहे शोषण और अत्याचार के विरुद्व वे आवाज उठात हैं।
यशपाल मार्क्सवादी जीवन दर्शन से प्रभावित हैं। साहित्य और राजनीति में एक साथ और समान रूप से सक्रिय हस्तक्षेप करने वाले यशपाल जी का वैयक्तिक जीवन घटनाओं और दुर्घटनाओं का लम्बा और प्रेरक दस्तावेज है।
सन १९०३ में फिरोजपुर छावनी में जन्म लेने वाले यशपाल जी प्रारम्भ से ही पर्याप्त साहसी और निडर थे। आगे चलकर जब ये कालेज जीवन में प्रविष्ट हुये तो देश की राजनीति में इनकी गहरी दिलचस्पी हुई। इस दिलचस्पी ने ही इन्हें विद्रोही बनाया। फलतः ये चन्द्रशेखर आजाद और भगत सिंह के विद्रोही दल से जा मिले।
केवल कहानीकार ही नहीं, एक सफल उपन्यासकार और सधे व्यंग्यकार के रूप में भी यशपाल हिन्दी जगत में विख्यात रहे हैं। इनकी कहानियों की लोकप्रियता का मूलकारण टेकनीक या भाषा न होकर कथा वस्तु है।

यशपाल की रचनायें

कहानी सांग्रह
लैम्प शेड, धर्मयुद्व, ओ भैरवी, उत्तराधिकारी, चित्र का शीर्षक, अभिशप्त, वो दुनिया, ज्ञान दान, पिंजड़े की उड़ान, तर्क का तूफान, फूलों का कुत्ता, भस्मावृत चिंगारी, भूख के तीन दिन।
[यशपाल की सम्पूर्ण कहानियां चार खन्डों में]
उपन्यास
झूठा सच, मेरी तेरी उसकी बात, देशद्रोही, दादा कामरेड,गीता पार्टी कामरेड, मनुष्य के रूप, पक्का कदम, दिव्या, अमिता, बारह घन्टे, जुलैखां, अप्सरा का शाप।
यात्रा विवरण
लोहे की दीवार के दोनो ओर, राहबीती, स्वर्गयोद्यान बिना सांप।
संस्मरण
सिंहावलोकन [चार भागों में]
निबन्ध
रामराज्य की कथा, गांधीवाद की शव परीक्षा, मार्क्सवाद, देखा सोंचा समझा, चक्कर क्लब, बात-बात में बात, न्याय का संघर्ष, जग का मुजरा, [सम्पूर्ण निबन्ध दो खंडो में विभाजित
नाटक
नशे-नशे की बात

करवा का व्रत - यशपाल

कन्हैया लाल अपने दफ्तर के हमजोलियों और मित्रों से दो-तीन बरस बड़ा ही था, परन्तु ब्याह उसका उन लोगों के बाद ही हुआ था। उसके बहुत अनुरोध करने पर भी साहब ने उसे ब्याह के लिये सप्ताह भर से अधिक छुट्टी न दी थी। लौटा तो उसके अन्तरंग मित्रों ने भी उससे वही प्रश्न पूंछे जो प्रायः ऎसे अवसरों पर पूंछॆ जाए हैं और फिर वही परामर्श उसे दिये जो अनुभवी लोग नव-विवाहितों को दिया करते हैं।

हेमराज को कन्हैया लाल समझदार मानता था। हेमराज ने समझाया- बहू को प्यार तो करना ही चाहिये , पर प्यार में उसे बिगाड़ लेना या सर चढा लेना भी ठीक नहीं है। औरत सरकश हो जाती है, तो आदमी को उम्र भर जोरू का गुलाम ही बना रहना पड़ता है। उसकी जरूरतें पूरी करो पर रखो अपने काबू में। मार-पीट बुरी बात है पर यह भी नहीं कि औरत को मर्द का डर ही न रहे। डर उसे रहना ही चाहिये....मारे नहीं तो कम से कम गुर्रा तो जरूर दे। तीन बात उसकी मानो तो एक बात में न भी कर दो। यह न समझ ले कि जो चाहे कर या करा सकती है। उसे तुम्हारी खुशी या नाराजगी की परवाह रहे। हमारे साहब जैसा हाल न हो जाय।.....मैं तो देखकर हैरान रह गया। एम्पोरियम से कुछ चीजें लेने के लिये जा रहे थे तो घरवाली को पुकार कर पैसे लिये। बीवी ने कह दिया - 'कालीन इस महीने रहने दो। अगले महीने सही', तो भीगी बिल्ली की तरह बोले- 'अच्छा!' मर्द को रुपया पैसा अपने हांथ में रखना चाहिये। मालिक तो मर्द है।

कन्हैया के विवाह के समय नक्षत्रों का योग ऎसा था कि ससुराल वाले लड़की की विदाई कराने के लिये किसी तरह तैयार न हुये। अधिक छुट्टी नहीं थी इसलिये गौने की बात 'फिर पर ही टल गई थी। एक तरह से अच्छा ही हुआ। हेमराज ने कन्हैया को लिखा पढा दिया कि पहले तुम ऎसा मत करना कि वह समझे कि तुम उसके बिना रह नहीं सकते, या बहुत खुशामद करने लगो। .....अपनी मर्जी रखना समझे। औरत और बिल्ली की जात एक। पहले दिन के व्यवहार का असर उस पर सदा रहता है। तभी तो कहते हैं कि 'गुर्बारा वररोज़े अव्वल कुश्तन'- बिल्ली के आते ही पहले दिन हाथ लगा दे तो फिर रास्ता नहीं पकड़ती। ....तुम कहते हो, पढी लिखी है, तो तुम्हें और भी चौकस रहना चाहिये। पढी लिखी यों भी मिजाज दिखाती हैं।

निःस्वार्थ भाव से हेमराज की दी हुई सीख कन्हैया ने पल्ले बांध ली थी। सोंचा मुझे बाजार होटल में खाना पड़े या खुद चौका बर्तन करना पड़े तो शादी का लाभ क्या? इसलिये वह लाजो को दिल्ली ले आया था। दिल्ली में सबसे बड़ी दिक्कत मकान की होती है। रेलवे में काम करने वाले, कन्हैया के जिले के बाबू ने उसे अपने क्वार्टर का एक कमरा और रसोई की जगह सस्ते किराये पर दे दी थी। सो सवा साल से मजे में चल रहा था।

लाजवन्ती अलीगढ में आठवी जमात तक पढी थी। बहुत सी चीज़ों के शौक थे। कई ऎसी चीज़ों के भी जिन्हें दूसरे घरों की लड़कियों या नई ब्याही बहुओं को करते देखकर मन मसोस कर रह जाना पड़ता था। उसके पिता और भाई पुराने खयाल के थे। सोंचती थी, ब्याह के बाद सही। उन चीज़ों के लिये कन्हैया से कहती। लाजो के कहने का ढंग ऎसा था कि कन्हैया का दिल इन्कार करने को न करता, पर इस ख्याल से कि वह बहुत सरकश न हो जाय, दो बातें मानकर तीसरी पर इन्कार भी कर देता। लाजो मुंह फुलाती तो सोंचती कि मनायेंगे तो मान जाऊंगी, आखिर तो मनायेंगे ही। पर कन्हैया मनाने की अपेक्षा डांट ही देता। एक-आध बार उसने थप्पड़ भी चला दिया। मनौती की प्रतीक्षा में जब थप्पड़ पड़ जाता तो दिल कटकर रह जाता और लाजो अकेले में फूट फूट कर रोती। फिर उसने सोंच लिया- 'चलो, किस्मत में यही है तो क्या हो सकता है?' वह हार मानकर खुद ही बोल पड़ती।

कन्हैया का हांथ पहली दो बार तो क्रोध की बेबसी में ही चला था, जब चल गया, तो उसे अपने अधिकार और शक्ति का सन्तोष अनुभव होने लगा। अपनी शक्ति अनुभव करने के नशे से बड़ा नशा और दूसरा कौन सा होगा? इस नशे में राजा देश पर दॆश समेटते जाते थे, जमींदार गांव पर गांव और सेठ बैंक और मिल खरीदते जाते हैं।इस नशे की सीमा नहीं। यह चस्का पड़ा तो कन्हैया लाल के हांथ उतना क्रोध आने की प्रतीक्षा किये बिना भी चल जाते।

मार से लाजो को शारीरिक पीड़ा तो होती ही थी, पर उससे अधिक होती थी अपमान की पीड़ा। ऎसा होने पर वह कई दिन के लिये उदास हो जाती थी। घर का सब काम करती। बुलाने पर उत्तर भी दे देती। इच्छा न होने पर भी कन्हैया की इच्छा का विरोध नहीं करती, पर मन ही मन सोंचती रहती, इससे तो अच्छा है मर जाऊं। और फिर समय पीड़ा को कम कर देता। जीवन था तो हंसने और खुश होने की इच्छा भी फूट ही पड़ती और लाजो हंसने लगती। सोंच यह लिया था, 'मेरा पति है, जैसा भी है मेरे लिये तो यही सब कुछ है। जैसे वह चाहता है वैसे ही मैं चलूं।' लाजो के सब तरह आधीन हो जाने पर भी कन्हैया की तेजी बढती ही जा रही थी। वह जितनी अधिक बेपरवाही और स्वच्छन्दता लाजो के प्रति दिखा सकता, अपने मन में उसे उतना ही अधिक अपनी समझने और प्यार का सन्तोष पाता।

क्वांर के अन्त में पड़ोस की स्त्रियां करवा चौथ के व्रत की बात करने लगीं। एक-दूसरे को बता रही थी उनके मायके से करवे में क्या आया। पहले बरस लाजो का भाई आकर करवा दे गया था। इस बरस भी वह प्रतीक्षा में थी। जिनके मायके शहर से दूर थे, उनके यहां मायके से रुपये आ गये थे। कन्हैया अपनी चिट्ठी-पत्री दफ्तर के पते से ही मंगाता था। दफ्तर से आकर उसने बताया, 'तुम्हारे भाई ने करवे के दो रुपये भेजे हैं।'

करवे के रुपये आ जाने से लाजो को सन्तोष हो गया। सोंचा भईया इतनी दूर कैसे आते? कन्हैया दफ्तर जा रहा था तो उसने अभिमान से गर्दन कन्धे पर टेढी कर और लाढ के स्वर में याद दिलाया--'हमारे लिये सरघी में क्या-क्या लाओगे....?' और लाजो ने ऎसे अवसर पर लायी जाने वाली चीजे याद दिला दीं। लाजो पड़ोस में कह आई कि उसने भी सरघी का सामान मंगाया है। करवा चौथ का व्रत भला कौन हिन्दू स्त्री नहीं करती? जनम जनम यही पति मिले, इस्लिये दूसरे व्रतों की परवाह न करने वाली पढी लिखी स्त्रियां भी इस व्रत की उपेक्षा नहीं कर सकतीं।

अवसर की बात, उस दिन कन्हैया ने लंच की छुट्टी में साथियों के साथ ऎसे काबू में आ गया कि सवा तीन रुपये खर्च हो गये। उसने लाजो को बताया कि सरघी का सामान घर नहीं ला सका। कन्हैया खाली हांथ घर लौटा तो लाजो का मन बुझ गया। उसने गम खाना सीखकर रूठना छोड़ दिया था, परन्तु उस सांझ मुंह लटक ही गया। आंसू पोंछ लिये और बिना बोले चौके बर्तन के काम में लग गई। रात के भोजन के समय कन्हैया ने देखा कि लाजो मुंह सुजाये है, बोल नहीं रही है, तो अपनी भूल कबूल कर उसे मनाने या कोई और प्रबन्ध करने का आश्वासन देने के बजाय उसने उसे डांट दिया।

लाजो का मन और भी बिंध गया। कुछ ऎसा ख्याल आने लगा--इन्हीं के लिये तो व्रत कर रही हूं और यही ऎसी रुखाई दिखा रहे हैं।.....मैं व्रत कर रही हूं कि अगले जनम में भी इनसे ही ब्याह हो और इन्हें मैं सुहा ही नहीं रही हूं...। अपनी उपेक्षा और निरादर से भी रोना आ गया। कुछ खाते न बना। ऎसे ही सो गई।

तड़के पड़ोस में रोज की अपेक्षा जल्दी ही बर्तन भांडे खड़कने की आवाज आने लगी। लाजो को याद आने लगा--शान्ति बता रही थी कि उसके बाबू सरघी के लिये फेनियां लाये हैं, तार वाले बाबू की घरवाली ने बताया कि खोये की मिठाई लाये हैं। लाजो ने सोंचा, उन मर्दों को ख्याल है कि हमारी बहू हमारे लिये व्रत कर रही है; इन्हें जरा भी ख्याल नहीं है।

लाजो का मन इतना खिन्न हो गया कि उसने सरघी में कुछ भी न खाया। न खाने पर पति के नाम पर व्रत कैसे न रखती! सुबह सुबह पड़ोस की स्त्रियों के साथ उसने भी करवे का व्रत रखने वाली रानी और करवे का व्रत रखने वाली राजा की प्रेयसी दासी की कथा सुनने और व्रत के दूसर उपचार निबाहे। खाना बनाकर कन्हैयालाल को दफ्तर जाने के समय खिला दिया। कन्हैया ने दफ्तर जाते समय देखा कि लाजो मुंह सुजाये है। उसने फिर डांटा--'मालूम होता है दो चार खाये बिना तुम सीधी नहीं होगी।'

लाजो को और भी रुलाई आ गई। कन्हैया दफ्तर चला गया तो वह अकेली बैठी कुछ देर रोती रही। क्या जुल्म है! इन्हीं के लिये व्रत कर रही हूं और इन्हीं को गुस्सा आ रहा है।...जन्म जन्म में ये ही मिलें इसी लिये मैं भूखी मर रही हूं।....बड़ा सुख मिल रहा है न ! ....अगले जन्म में और बड़ा सुख दॆंगे!....ये ही जन्म निबाहना मुश्किल हो रहा है। इस जन्म में तो इस मुसीबत से मर जाना अच्छा लगता है, दूसरे जन्म के लिये वही मुसीबत पक्की कर रही हूं।...

लाजो पिछली रात भूखी थी, बल्कि पिछली दोपहर से पहले ही खाया हुआ था। भूंख के मारे आंते कुड़मुड़ा रही थीं और उस पर पति का निर्दयी व्यवहार। जन्म जन्म, कितने जन्म तक उसे यह व्यवहार सहना पड़ेगा! सोंचकर लाजो का मन डूबने लगा। सिर में दर्द होने लगा तो वह धोती के आंचल से सिर बांधकर खाट पर लेटने लगी तो झिझक गई--करवे के दिन बान पर नहीं लेटा या बैठा जाता। वह दीवार के साथ फर्श पर ही लेट रही।

लाजो को पड़ोसनों की पुकार सुनाई दी। वे उसे बुलाने आईं थी। करवा चौथ का व्रत होने के कारण सभी स्त्रियां उपवास करने पर भी प्रसन्न थीं। आज करवे के कारण नित्य की तरह दोपहर के समय सीने-पिरोने का काम नहीं किया जा सकता था; करवे के दिन सुई, सलाई और चरखा छुआ नहीं जाता था। काज से छुट्टी थी और विनोद के लिये ताश या जुऎ की बैठक जमाने का उपक्रम हो रहा था। वे लाजो को भी इसी के लिये बुलाने आईं थीं। सिर-दर्द और बदन टूटने की बात कहकर वह टाल गई और फिर सोंचने लगी--ये सब तो सुबह सरघी खाये हुये हैं। जान तो मेरी ही निकल रही है। ...फिर अपने दुखी जीवन के कारण मर जाने का ख्याल आया और कल्पना करने लगी कि करवा चौथ के दिन उपवास किये हुये मर जाये, तो इस पुण्य से जरूर अगले जन्म में यही पति मिले....

लाजो की कल्पना बावली हो उठी। वह सोंचने लगी--मैं मर जाऊं तो इनका क्या है, और ब्याह कर लेंगे। जो आयेगी वह भी करवा चौथ का व्रत करेगी। अगले जनम में दोंनो का ब्याह इन्हीं से होगा, हम सौतें बनेंगी। सौत का ख्याल उसे और भी बुरा लगा। फिर अपने आप समाधान हो गया--नहीं पहले मुझसे ब्याह होगा, मैं मर जाऊंगी तो दूसरी से होगा। अपने उपवास के इतने भयंकर परिणाम से मन अधीर हो गया। भूख अलग व्याकुल किये थी। उसने सोंचा--क्यों मैं अपना अगला जनम बरबाद करूं? भूख के कारण शरीर निढाल होने पर भी खाने का मन नहीं हो रहा था, परन्तु उपवास के परिणाम की कल्पना से मन क्रोध से जल उठा; वह उठ खड़ी हुई।

कन्हैया लाल के लिये उसने जो सुबह खाना बनाया था उसमें से बची दो रोटियां कटोरदान में पड़ी थीं। लाजो उठी और उपवास के फल से बचने के लिये उसने मन को वश में करके एक रोटी रूखी ही खा ली और एक गिलास पानी पीकर फिर लेट गई। मन बहुत खिन्न था। कभी सोंचती -- यह मैंने क्या किया! ....व्रत तोड़ दिया। कभी सोंचती ठीक ही तो किया, अपना अगला जन्म क्यों बरबाद करूं? ऎसे पड़े पड़े झपकी आ गई।

कमरे के किवाड़ पर धम-धम सुनकर लाजो ने देखा, रोशन दान से रोशनी की जगह अन्धकार भीतर आ रहा है। समझ गई दफ्तर से लौटे हैं। उसने किवाड़ खोले और चुपचाप एक ओर हट गई।

कन्हैया लाल ने क्रोध से उसकी ओर देखा-'अभी तक पारा नहीं उतरा! मालूम होता है झाड़े बिना नहीं उतरेगा।'
लाजो के दुखे दिल पर और चोट लगी और पीड़ा क्रोध में बदल गई। कुछ उत्तर न दे वह घूमकर फिर दीवार के सहारे फर्श पर बैठ गई।
कन्हैया लाल का गुस्सा भी उबल पड़ा-'यह अकड़ है!....आज तुझे ठीक ही कर दूं।' उसने कहा और लाजो को बांह से पकड़, खींचकर गिराते हुये दो थप्पड़ पूरे हांथ के जोर से ताबड़तोड़ जड़ दिये और हांफते हुये लात उठाकर कहा, 'और मिजाज दिखा?.. खड़ी हो सीधी।'

लाजो का क्रोध भी सीमा पार कर चुका था। खींची जाने पर भी फर्श से नहीं उठी। और मार खाने के लिये तैयार होकर उसने चिल्लाकर कहा, 'मार ले मार ले! जान से मार डाल! पीछा छूटे! आज ही तो मारेगा! मैंने कौन सा व्रत रखा है तेरे लिये जो जनम जनम मार खाऊंगी। मार, मार डाल!'

कन्हैया लाल का लात मारने के लिये उठा पांव अधर में ही रुक गया। लाजो का हांथ उसके हांथ से छूट गया। वह स्तब्ध रह गया। मुंह में आई गाली भी मुंह में रह गी। ऎसे जान पड़ा कि अंधेरे में कुत्ते के धोखे से जिस जानवर को मार बैठा था उसकी गुर्राहट से जाना कि वह शेर था; या लाजो को डांट या मार सकने का अधिकार एक भ्रम ही था। कुछ क्षण वह हांफता हुआ खड़ा सोंचता रहा फिर खाट पर बैठकर चिन्ता में डूब गया। लाजो फर्श पर पड़ी रो रही थी। उस ओर देखने का साहस कन्हैया लाल को न हो रहा था। वह उठा और बाहर चला गया।

लाजो फर्श पर पड़ी फूट-फूटकर रोती रही। जब घन्टे भर रो चुकी तो उठी। चूल्हा जला कर कम से कम कन्हैया के लिये तो खाना बनाना ही था। बड़े बेमन से उसने खाना बनाया। बना चुकी तब भी कन्हैया लाल लौटा नहीं था। लाजो ने खाना ढक दिया और कमरे के किवाड़ उढकाकर फिर फर्श पर लेट गई। यही सोंच रही थी, क्या मुसीबत है ये ज़िन्दगी। यही झेलना था तो पैदा ही क्यों हुई थी? मैंने क्या किया था जो मारने लगे।

किवाड़ों के खुलने का शब्द सुनाई दिया। वह उठने के लिये आंसुओं से भीगे चेहरे को आंचल से पोंछने लगी। कन्हैया लाल ने आते ही एक नज़र उसकी ओर डाली। उसे पुकारे बिना ही वह दीवार के साथ बिछी चटाई पर चुपचाप बैठ गया। कन्हैया लाल का ऎसे चुप बैठ जाना एक नई बात थी, पर लाजो गुस्से में कुछ न बोल रसोई की ओर चली गई। आसन डाल थाली कटोरी रख खाना परोस दिया और लोटे मॆं पानी लेकर हांथ धुलाने के लिये खड़ी थी। जब पांच मिनट हो गये कन्हैया लाल नहीं आया तो उसे पुकारना ही पड़ा, 'खाना परस दिया है।'

कन्हैया लाल आया तो हांथ नल से धोकर झाड़ते हुये भीतर आया। अब तक हांथ धुलाने के लिये लाजो ही उठकर पानी देती थी। कन्हैया लाल दो ही रोटी खाकर उठ गया। लाजो और देने लगी तो उसने कह दिया , 'बस हो गया, और नहीं चाहिये।' कन्हैया लाल खाकर उठा तो रोज की तरह हांथ धुलाने को न कहकर नल की ओर चला गया।

लाजो मन मारकर स्वयं खाने बैठी तो देखा कद्दू की तरकारी बिल्कुल कड़वी हो रही थी। मन की अवस्था ठीक न होने से हल्दी नमक दो बार पड़ गया था। बड़ी लज्जा अनुभव हुई, 'हाय इन्होंने कुछ कहा भी नहीं! यह तो जरा कम ज्यादा होने पर डांट देते थे।'

लाजो से दुःख में खाया नहीं गया। यों ही कुल्ला कर, हांथ धोकर इधर आई कि बिस्तर ठीक कर दे, चौका फिर समेट देगी। देखा तो कन्हैया लाल स्वयं बिस्तर झाड़ कर बिछा रहा था। लाजो जिस दिन से इस घर में थी ऎसा कभी नहीं हुआ था।

लाजो ने शर्मा कर कहा, 'मैं आ गई रहने दो। किये देती हूं।' और पति के हांथ से दरी चादर पकड़ ली। लाजो बिस्तर ठीक करने लगी तो कन्हैया लाल दूसरी तरफ से मदद करता रहा। फिर लाजो को सम्बोधन किया, तुमने कुछ खाया नहीं। कद्दू में नमक ज्यादा हो गया है। सुबह और पिछली रात भी तुमने कुछ नहीं खाया था। ठहरो मैं तुम्हारे लिये दूध ले आऊं।'

लाजो के प्रति इतनी चिन्ता कन्हैया लाल ने कभी नहीं दिखाई थी। जरूरत भी नहीं समझी थी। लाजो को उसने अपनी चीज़ समझा था। आज वह ऎसे बात कर रहा था जैसे लाजो भी इन्सान हो; उसका भी ख्याल किया जाना चाहिये। लाजो को शर्म तो आ रही थी अच्छा भी लग रहा था। उसी रात से कन्हैया लाल के व्यवहार में एक नर्मी सी आ गई। कड़े बोल की तो बात ही क्या, बल्कि एक झिझक सी हर बात में, जैसे लाजो के किसी बात के बुरा मान जाने की या नाराज हो जाने की आशंका हो। कोई काम अधूरा देखता तो स्वयं करने लगता। लाजो को मलेरिया बुखार आ गया तो उसने उसे चौके के समीप नहीं जाने दिया। बर्तन भी खुद साफ कर दिये। कई दिन तो लाजो को बड़ी उलझन और शर्म मालूम हुई, पर फिर पति पर और अधिक प्यार आने लगा। जहां तक बन पड़ता, घर का काम उसे नहीं करने देती। प्यार से डांट देती, 'यह काम करते मर्द अच्छे नहीं लगते....।'

उन लोगों का जीवन कुछ दूसरी ही तरह का हो गया। लाजो खाने के लिये पुकारती तो कन्हैया जिद करता, 'तुम सब बना लो, फिर एक साथ बैठकर खायेंगे।' कन्हैया पहले कोई पुस्तक या पत्रिका लाता था तो अकेला मन ही मन पढा करता था। अब लाजो को सुनाकर पढता या खुद सुन लेता। यह भी पूंछ लेता 'तुम्हें नींद तो नहीं आ रही है?'

साल बीतते मालूम न पड़ा। फिर करवा चौथ का व्रत आ गया। जाने क्यों लाजो के भाई का मनी आर्डर करवे के लिये न पहुंचा था। करवा चौथ से पहले दिन कन्हैया लाल द्फ्तर जा रहा था। लाजो ने खिन्नता और लज्जा से कहा, 'भैया करवा भेजना शायद भूल गये।'

क्न्हैया लाल ने सांत्वना के स्वर में कहा, 'तो क्या हुआ? उन्होंने जरूर भेजा होगा। डाकखाने का हाल आजकल बुरा है। शायद आज आ जाये या और दो दिन बाद आये। तुम व्रत उपवास के झगड़े में न पड़ना। तबीयत खराब हो जाती है। यों कुछ मगाना ही है तो बता दो । लेते आयेंगे। पर व्रत उपवास से होता क्या है। सब ढकोसले हैं।'

'वाह, यह कैसे हो सकता है! हम तो जरूर रखेंगे व्रत। भैया ने करवा न भेजा तो न सही। बात तो व्रत की है, करवे की थोड़ी है।' लाजो ने बेपरवाही से कहा।

सन्धया-समय कन्हैया लाल आया तो रूमाल में बंधी छोटी गांठ लाजो को थमाकर बोला, 'लो, फेनी तो मैं ले आया हूं, पर व्रत-व्रत के झगड़े में न पड़ना।' लाजो ने मुस्कुराकर रुमाल लेकर अलमारी में रख दिया। अगले दिन लाजो ने समय पर खाना तैयार करके कन्हैया को रसोई में पुकारा, 'आओ, खाना परस दिया है।
कन्हैया ने जाकर देखा, खाना एक ही आदमी का परोसा था- 'और तुम?' उसने लाजो की ओर देखा।

'वाह मेरा तो व्रत है! सुबह सरघी भी खा ली। तुम अभी सो ही रहे थे।' लाजो ने मुस्कुराकर प्यार से बताया।
'यह बात....! तो हमारा भी व्रत रहा।' आसन से उठते हुये कन्हैया लाल ने कहा।
लाजो ने पति का हांथ पकड़कर समझाया, 'क्या पागल हो, कहीं मर्द भी करवा चौथ का व्रत करते हैं! ....तुमने सरघी कहां खाई?' नहीं, नहीं यह कैसे हो सकता है!' कन्हैया नहीं माना, 'तुम्हें अगले जन्म में मेरी जरूरत है तो क्या मुझे तुम्हारी नहीं है? या तुम भी व्रत न रखो आज!'
लाजो पति की ओर कातर आंखो से देखती हार मान गई। पति के उपासे दफ्तर जाने पर उसका हृदय गर्व से फूला नहीं समा रहा था|
--यशपाल

प्लीज मम्मी डोन्ट गो....।

अपने एक मित्र के साथ उनके एक ब्रिगेडियर दोस्त के घर जाने का मौका मिला।
ब्रिगेडियर दोस्त की नियुक्ति कहीं बाहर है और उनकी पत्नी अपने बच्चों के
साथ इसी शहर में अकेले रहती हैं।
जब उनके घर पहुंचा उस समय ब्रिगेडियर की पत्नी कहीं जाने की जल्दी में
थीं और तैयार होकर बस निकलने ही वालीं थीं। बाल संवारना, पफ करना, नौकर
को हिदायत देना, उतरे हुये कपड़े इधर उधर फेंकना, तीन साल की बच्ची पिंकी
को नाश्ता वक्त पर करने का निर्देश देना, आठ साल के बेटे सुदर्शन के
स्कूल से लौटने पर उसे क्या नाश्ता देना है इसके बारे में नौकर को
समझाना, ढेर सारी कापी किताबों को समेटना, टामी को गोदी में लेकर
दुलराना, हमारा हाल-चाल पूंछना और कोल्ड ड्रिंक्स लाने के लिये नौकर को
पुकारना। बिजली के बिल, कार में आयी खराबी और टुल्लू के जल जाने से
हिन्दी के एक समाचार पत्र के सम्पादक के साथ हुई भेंट का जिक्र करना और
खुशवंत सिंह के स्तम्भ "सरदार इन बल्व" की प्रशंसा करना आदि सब-कुछ एक
साथ चल रहा था। ऎसा लग रहा था कि घर मॆं फुल वाल्यूम में टेलीविजन चल रहा
है, रेडियो बज रहा है, टेपरिकार्डर भी चल रहा है, कूलर के साथ एयर
कन्डीशनर भी चल रहा है और पंखे भी जोर-जोर से घड़घड़ा रहे हैं। इतनी ढेर
सारी आवाज़ों के बीच लगता था जैसे घर के सारे नल भी खुले हों और बाल्टियों
में पानी गिरने की आवाज के साथ टेलीफ़ोन पर जोर-जोर से बात करने की आवाज़
भी उसी में घुसी जा रही हो। हे भगवान! रसोई से आमलेट जलने की गन्ध मिलना
बाकी रह गया था।
शटल काक की तरह एक कमरे से दूसरे कमरे में नाचती हुई अंततः जब वह कन्धे
पर पर्स डाले और हांथ में कापियों का ढेर उठाये और पैर में सैन्डल डालने
की बार-बार कोशिश करती हुई सामने स्थिर हो गयीं तो लगा जैसे भूकम्प की
तबाही के बाद की शान्ति हो। मित्र ने पूंछा, "भाभी जी कहीं जा रहीं हैं
क्या...कहीं यूनीवर्सिटी में रिसर्च तो शुरु नहीं कर दिया है?"
"नहीं आई एम नाट सो लकी। मन तो बहौत करता है बट यू नो, देयर इज़ नो टाइम।
गर की रिस्पान्सिबिलिटी से फ़्री हों तो कुछ करें भी। सारी लाइफ स्पाइल हो
गयी। बस एक स्कूल ज्वाइन किया है, वहीं पढ़ाने जा रही हूं।"
"स्कूल में पढ़ाना तो फुल टाइम जाब है, कैसे मैनेज करती हैं? इंटर सेक्शन
में हैं कि हाईस्कूल में?"
"अरे कहां हाईस्कूल और इंटर मीडीयेट? पास ही में बच्चों की एक नर्सरी है,
उसी में टाइम पास करती हूं।"
नर्सरी स्कूल में पढ़ाती हैं आप? कितने पैसे देते होंगे? सात-आठ सौ रुपये बस?"
"नहीं यार ,इतने भी नहीं। बट यू नो, मनी इज़ नो कन्सीडरेशन फॉर मी...।
हसबेंड को ही फाइव फिगर मिल जाता है। पैसे की भूख नहीं है...आय एम नाट
रनिंग आफ्टर मनी...आय वान्ट टु वर्क फॉर माय सैटिस्फैक्शन, फॉर सम
काज़...।बच्चों को हेल्प हो जाती है और मेरा भी टाइम पास हो जाता है। आखिर
एक इंसान को जिस्मानी जरूरतों के अलावा अपनी मानसिक खुराक के बारे में भी
तो सोचना चाहिये। अदरवाइज़, व्हाट इज़ डिफरेंस बिटवीन अ मैन एण्ड एन
ऎनीमल..? स्कूल में तो अच्छा खासा टाइम पास हो जाता है... यू नो, पढ़ाने
का पढ़ाना और आउटिंग की आउटिंग...। घर के मोनोटोनस एंड डिप्रेसिंग
एटमास्फियर से कुछ देर के लिये छुट्टी मिल जाती है। घर में बैठे-बैठे बोर
हो जाते हैं। सारी एजूकेशन बेकार हो गयी। यू नो, वन शुड डू समथिंग
क्रियेटिव। स्कूल में, दीज़ लोअर क्लास टीचर्स से भी इन्टरेक्शन हो जाता
है। दे आर वेरी क्रियेटिव एण्ड इमोशनल। दे मिस देयर फेमिली व्हेन दे आर
वर्किंग आउटसाइड। एक्चूअली, इन्स्पाइट आफ फाइनेंशियल क्राइसेस एंड हैविंग
गुड नालिज, दे डोन्ट वान्ट टु वर्क.....बट आयरनी इज़ दैट, दे आर फोर्स्ड
टु वर्क... आय रियली इन्जाय देयर कम्पनी। इट्स क्वाइट थ्रिलिंग फार मी टु
शेयर देयर एक्सपीरियंस। मेरे क्लास की और लेडीज़ तो दिन भर किटी पार्टीज़
में लगी रहती हैं...आय हेट किटी पार्टीज़। बस साड़ी गहनों की बात करो। आय
एम फेड अप विद दीज़ थिंग्ज़।"
"कितने दिनों से पढ़ा रही हैं?"
"अभी तो तीन महीने ही हुये हैं और यू नो, पूरे स्कूल के बच्चे मेरे पास
आते हैं और कहते हैं कि मैडम आपकी क्लास में ही पढूंगा..। सारे बच्चे
मुझसे ही कापी करेक्ट कराने आते हैं । एक दिन मैनेजर से झगड़ा हो गया।
मैंने तो कह दिया मैं काम नहीं करूंगी। बट यू नो, व्हाट हैपेन्ड? सारे
बच्चों ने मुझे कार्ड्स लिखकर दिये..प्लीज़ मैम, डोन्ट लीव अस...।आय
स्टार्टेड क्राइंग। बच्चे लव्ज़ मी वेरी मच। मैनेजर ने भी मुझे तीन
क्लासेज़ दे रखी हैं। मैं तो काम के मारे मरी जा रही हूं। घर पर लाकर
कापियां करेक्ट करनी पड़ती हैं रात-रात भर जागकर। लाइफ हैज़ बिकम हैल। अदर
टीचर्स तो दिन में चार पांच पीरीयड ही पढाती हैं, नोबडी गिव्ज़ देम
कार्ड्स...दे आर नाट पापुलर एमंग्स चिल्ड्रेन।"
इसी बीच पिंकी आकर मैडम की साड़ी पकड़कर खड़ी हो गयी और रह रह कर साड़ी
अपनी ओर खींचती जा रही थी। मैडम बात करने में इतनी मशगूल थीं कि पिंकी की
रुंआसी आवाज़ मम्मी के कानों तक नहीं पहुंच पा रही थी, मम्मी, प्लीज़ मम्मी
डोन्ट गो...प्लीज़ डोन्ट गो मम्मी..।"
मैडम को अचानक अहसास हुआ कि पिंकी उनकी साड़ी से लपटी खङी है। उन्होंने
पिंकी की करुण पुकार को अनसुना करतेहुये झाड़ लगायी "पिंकी...गो टु योर
बेड,..आय सेड गो टु योर बेड।" मम्मी की घूरती आंखो को देखकर वह सहमकर
अपने कमरे में चली गयी।
"यू नो शी इज़ पिंकी...माय पूअर चाइल्ड, शीहैज़ गाट फीवर...परसों से चढ़ा
है। १०२, १०३ डिग्री है, उतरता ही नहीं। अरे हां! याद आया वुड यू प्लीज़
हेल्प मी...? आय हैव रिटेन सम पोयम्स...गुड पोयम्स...आय वान्ट देम टु बी
पब्लिस्ड इन सम पेपर...। कैन यू ट्राय फार योर पेपर..।
"आप इंग्लिस में लिखती हैं और हमारा पेपर हिन्दी में निकलता है\ किसी
अंग्रेजी पत्रिका में कोशिश करिये।"
"अरे नहीं, यू मिस अन्डरस्टुड मी...आय राइट इन हिन्दी। हिन्दी इज़ माय मदर
टन्ग। मेरा पूरा एक्स्प्रेशन हिन्दी में ही है। आय लव टु एक्स्प्रेस माय
सेल्फ़ इन हिन्दी..। आय आलसो फ़ील फ़ुल कान्फीडेन्स व्हाइल राइटिंग इन
हिन्दी...। मेरी पोयम्स का कलेक्शन बुक फार्म में निकलने जा रहा है। उससे
पहले आय मीन, इन द मीन टाइम मैं चाहती हूं कि कुछ पोयम्स पेपर में निकल
जाय तो अच्छा रहेगा।..."
"आपने अपने सम्पादक मित्र से अनुरोध नहीं किया?"
"आय हैव ट्राइड हिम, ही विल डेफिनेटली गिव, बट आपके पेपर में भी निकल जाय
तो यू नो स्टेटस पर फर्क पड़ता है न...है न।"
"सो तो है।"
"प्लीज़ डू ट्राय...। आपकी डाटर किस स्कूल में पढ़ती
है?"
"ग्रीन लाइन्स नर्सरी में।"
"ओह, कैसी रेफुटेशन है स्कूल की?"
"अच्छी है। क्या पिंकी का एड्मिशन कराना है?"
अरे नहीं, इन सड़ियल स्कूलों में पिंकी को नहीं डालूंगी, दे आर
राटेन...कैसे-कैसे गन्दले बच्चे आते हैं...कैसी-कैसी फूहड़ टीचर्स आती
हैं। घर में पकायेंगी रोटी, करेंगी झाड़ू पोंछा और चली जायेंगी स्कूल में
पढ़ाने...आय हेट देम..।
"फिर किस लिये पूंछ रही हैं ग्रीन लाइन नर्सरी के बारे में?"
"बुलाया है मुझे...एक्चुअली दे आर आफरिंग मी नाइन हन्ड्रेड रुपीज़...।
मैंने भी कहला दिया कि राउन्ड फिगर की बात करो...वन थाउज़ेन्ड। बट यू नो?
मनी इज़ नाट मैटर। द ओनली थिंग इज़ इट्स एन अपार्च्यूनिटी। मुझे तीन महीने
ही हुये हैं पढाना शुरु किये हुये और आय एम गैटिंग आफर्ज़...कितने सालों
से पढाने वाली टीचर्स भी हैं..बट दे नेवर गाट ऎनी आफर फ्राम ऎनी व्हेयर।
आय वान्ट टु अवेल दिस अपार्च्यूनिटी...बट यू नो चिल्ड्रेन विल डेफिनेटली
मिस मी... आय एम वेरी इमोशनल...आय कान्ट हर्ट देम। प्लीज़ टेल मी कि मैं
क्या करूं... मेरी समझ में नहीं आ रहा है कि व्हाट टु डू... प्लीज़ हेल्प
मी...।"
--स्नेह मधुर

स्नेह मधुर


स्नेह मधुर

इलाहाबाद विश्वविध्यालय से विधि स्नातक।
विगत लगभग दो दशकों से लेखन व पत्रिकारिता में सक्रिय। रचनात्मक लेखन में विशेष रुचि।
फिल्मों में अभिनय सहित निर्माण और पटकथा लेखन में भागीदारी।
सीरिया के स्वतन्त्रता दिवस पर भारत के सांस्कृतिक प्रतिनिध के रूप में वर्ष १९९८ में सीरिया की यात्रा।
भारतेन्दु हरिश्चन्द्र पत्रकारिता पुरस्कार के निर्णायक मण्डल के सदस्य भी रहे।
काव्य संग्रह 'पहाङ खामोश है' प्रकाशित। कविता व व्यंग्य के अतिरिक्त इन दिनों एक उपन्यास लिखने में व्यस्त|
सम्प्रति : हिन्दुस्तान के सम्पादकीय विभाग से सम्बद्व।

सम्पर्क : ए-११ पत्रकार कालोनी,
अशोक नगर
इलाहाबाद. २११००१

भारतेन्दु 'विमल'

भारतेन्दु 'विमल' का जन्म पंजाब के अमृतसर शहर में हुआ था। आपने गुरुकुल, एटा और महाविद्यालय से स्नातक की उपाधियां लीं तथा डी.ए.वी. कालेज कानपुर से संस्कृत में एम.ए. किया। मुम्बई में पांच वर्षों तक अध्यापन करने के उपरान्त आप केन्या, पूर्वी अफ़्रीका आ गये जहां आप सामाजिक एवं सांस्कृतिक कार्यों में लग गये। पिछले पन्द्रह वर्षों से भारतेन्दु 'विमल' जी लंदन में बी.बी.सी. की हिन्दी सेवा से सम्बद्व हैं तथा मुख्यतः स्वतन्त्र प्रसारक और पत्रकार हैं।

आपके पांच उपन्यास प्रकाशन के लिये तैयार हैं। प्रस्तुत कहानी ;विमल; जी के बहुचर्चित उपन्यास 'सोनमछली' के एक पात्र पर आधारित है।

प्रकाशित कृतियां : 'मैं किसका और कौन मेरा' (उपन्यास); 'अभिव्यक्ति' (कविता-संकलन)।

चांदनी--भारतेन्दु विमल


जीवन में पहली बार चन्दन ने मुम्बई के एक लेडीज़ बीयर बार में कदम रखे थे। 'सनलाइट' बार एण्ड रेस्टोरेंट ' की स्टेज पर बीस-पच्चीस लङकियां फिल्मी गानों पर डांस कर रही थीं। डिस्को हाल मॆं लगभग डेढ सौ कस्टमर जरूर रहे होंगे। लाल परी की लाली चन्दर की आंखों में छप गयी थी।
डांस करते हुये डॉली की नीली साङी का पल्लू सरक गया। फ़र्श को छूने लगा तो चन्दर को कालिदास याद आने लगे। " नदी किनारे सरकण्डों के पेङ। तेज धारा ने किनारे की जमीन काटी। सरकण्डों की जङें उखङ गयीं। डाली नीचे झुककर नदी की धार छूने लगी, मानो कोई अल्हङ नवयौवना साङी के खिसके पल्लू को जमीन तक झुककर उठाने की कोशिश कर रही थी।" वह नदी का किनारा रहा होगा। यह बीसवीं सदी में मुम्बई के बीयर-बार के फ़र्श पर बिछा नीले रंग का कालीन था।
डॉली से नज़र हटी तो रज्जो, सायराकी पीठ पर उसकी चोली के फ़ीते कस रही थी। चन्दर को याद आया-दुष्यन्त वाली शकुन्तला ने, उसका साज-सिंगार करती उन सहेलियों से शिकायत की थी, जो उसकी चोली कस रहीं थी। सहेलियों ने खिलखिला कर जवाब दिया था, "चोली को मत कोस, हमें दोष मत दे, अपनी जवानी क उभार को सम्भाल।"
....और अब, चन्दर के बिल्कुल सामने, स्टेज पर, गीता की फैलती सिकुङती जांघे, आधुनिक गीत-संगीत की तरह बिखरी-पसरी दिखाई दे रहीं थी। उसके दिमाग में कालिदास की पंक्ति बिजली की तरह कौंधी- 'ज्ञातास्वादो विवृत जघनां को विहातुं समर्थः'...खुली जांघे देख... कौन छोङ सकता है। 'जय कालिदास', चन्दर बुदबुदाया...'मैं चला घर।'
सनलाइट से बाहर निकलकर, चन्दर नुक्कङ वाली पान की दुकान पर खङा था। सनलाइट की रोप-लाइट एक सिरे से दूसरे तक दौङ लगा रही थी। प्लास्टिक ट्यूब के अन्दर बन्द नन्हे-नन्हे बल्ब बिजली के करन्ट से मानो गति पाकर दौङ रहे थे। सनलाइट के अन्दर किस्मत की लकीरों के घेरे में भारत के कोने-कोने से मुम्बई आयी सुन्दरियों के पांव संगीत की धुन पर थिरक रहे थे। इन पांवों ने कितनी टेढी-मेढी राहें नापी थी, कितने कांटे झेले थे और कितने पत्थरों की ठोकरें खाईंथी - हिसाब कौन जाने...?
ग्वालियर वाली मुम्बई क्यों आई? डकैतों वाले मुरैना और भिन्ड की कन्याओं ने मुम्बई आकर घुंघरू क्यों बांधे?...कौन कानपुर का स्कूल छुङाकर मम्मी पापा ने अपनी लाङली को मुम्बई के फ़ारस रोड वाली मौसी के पास क्यों भेजा? सवाल भारी थे। चन्दर के हल्के दिमाग के पास इन भारी सवालों का कोई जवाब नहीं था।
सामने सिनेमा हाल था। नौ से बारह वाला शो छूटा था। चन्दर से पहले चांदनी और रेहाना के पान लग रहे थे। एक पुलिस वाला अपनी मूंछे मरोङते, माणीकचन्द थूकते और दायें हांथ मॆं पकङी हुई सोंटी को बायें हांथ की हथेली पर बजाते चांदनी के पास आ खङा हुआ था।
"यहां रण्डियों के बाजार में इतनी रात क्या कर रही है रे?" पुलिस वाले की बात सुनकर चन्दर का नशा रफ़ूचक्कर हो गया था।
"किसी भङुये की तलाश कर रही हूं।" चांदनी ने पान मुंह में दबाते हुये कहा, "तू करेगा मेरी दलाली?"
चांदनी की बात पर रेहाना हंसी तो पुलिस वाले ने अपनी अथॉरिटी कायम रखने के लिये अपनी सोंटी धीरे से चांदनी की कमर पर जमाई और बोला, "चल थाने।"
"नोट हैं?" चांदनी ने मजाक उङाया।
"ये ले", जेब से पांच रुपये का पुराना नोट निकालकर, पुलिस वाला खींसे निपोर रहा था।
चांदनी जोर से हंसी, "जेब में नोट छोटे और पतलून में औजार मोटे... पांच के पुराने नोट पे थाने ले जायेगा....अभी तेरे साहब ने हफ्ते का हिस्सा नहीं दिया लगता.... या बीवी के लिये नयी चड्ढियां खरीदने में पैसे खर्च कर दिये?"
तभी चांदनी की नज़र चंदर पर पङी, जो चांदनी की बातों पर मुस्कुरा रहा था।
चांदनी को न जाने क्या सूझी। उसने पान वाले से चन्दर का पान अपने हांथों में ले लिया और चन्दर को देते हुये पुलिस वाले से कहने लगी, "अपना दोस्त है, मुलुक से आया है, सिनेमा दिखाया...पान खिलाने लायी हूं...समझा क्या?"
"समझा... खूब सम्झा। गिराहक फ़ंसा कर ले जा रही है और मुलुक वाला बोलती है।"
"अरे जा भङुये। तुम लोग तो रण्डीखाने के दलालों से भी गये-गुज़रे हो",चांदनी ने पान चबाते हुये पुलिस वाले से कहा और अचानक चन्दर का हांथ पकङकर बोली, "चल चन्दा, अपन इनके मुंह नही लगते।"...और चांदनी हांथ पकङकर चन्दर को खींचे लिये जा रही थी। रेहाना पीछे थी। चन्दर ने मुङकर पीछॆ देखा तो पुलिसवाला मूंछॊ पर ताव देकर माणीकचन्द की पीक मार रहा था....सङक पर। चन्दर खिंचा चला गया...पास वाली तंग गली में। गली में अंधेरा था...अंधेरे में कालिदास की काल्पनिक छवि थी...चन्दर को याद आया...'ज्ञातास्वादः'...गीता याद आयी...विवृत जघनां'...अंधेरे का इशारा था, शर्मिन्दगीपर पङे काले पर्दे की ओर। गली के दायें बांये नालियां.. सैकङों कुकर्म घुले पानी की सङांध... आखिर मॆं मद्विम सी रोशनी... सीढियां....खुले दरवाजे के पास हॉल में सोफ़े पर पालथी मारकर पान चबाती दीदी और बाल्टी भर पानी लिये चांदनी के पिंजरे नुमा कमरे की ओर जाती हुई मेहरी।
चांदनी चंदर को खींचकर अन्दर ले गई। दीदी मुस्कुरा रहीं थीं। चन्दर की झिझक देखकर सोंच रहीं थी-कोई नया परिन्दा है। भटककर इस डाल पर आ बैठा है। चांदनी मुर्गा लाई है। हलाल करने के लिये।
गलियारे के दूसरे छोर पर चांदनी का कमरा था। एक पलंग... एक मोरी..पलंग पर बिछी मैली सी चादर...बीच में पाप के चकत्ते...लिज़लिज़े। चन्दर की उबकाई चांदनी के खिले चेहरे को देखकर रुकी रही। चांदनी के चेहरे पर मासूमियत थी...शरारत का पुट था...मजबूरी के निशान थे। लेकिन साथ ही चन्दर के लिये किसी कोमल भाव से भीगा आमन्त्रण था।
"बैठो", चांदनी ने चन्दर का हाथ पकङकर पलंग पर बैथने का इशारा किया।
"चादर मैली है।" चन्दर सहमा हुआ था।
"अपनी ज़िन्दगी ही मैली है, चादर की परवाह कौन करे?" चांदनी ने जवाब के साथ चन्दर की कमर पर दोनों हांथ टिकाकर उसे एक ओर खिसकाया...बक्सा खोला, नयी चादर निकालकर बिछायी और बोली, "अब तुम मैले नहीं होगे।"...और वह कहती गई..."हम तो इतने मैले हो चुके हैं...क्या नाम बताया था तुमने?...हां चन्दर...तुम जनम-जनम घिस कर हमें धोते रहो तो भी साफ नहीं होंगे। छॊङो ये बातें। मेरी कहानी की भूल-भुलैया में न फ़ंसना, पछताओगे। चलो निकालो दो सौ रुपये ...शार्ट टाइम के। अगर एक घन्टे बैठना है तो चार सौ रुपये... और बीस रुपये मेहरी के।"
चन्दर मुस्कुराया...चार सौ रुपये चांदनी के हवाले किये और नयी चादर की इज्जत में औंधा लेट गया। चांदनी ने बत्ती बुझा दी थी। बस, लाल रंग का एक बल्ब जल रहा था-हल्की रौशनी के लिये। चन्दर ने कनखियों से देखा था। चांदनी का घाघरा कमर से सरककर हौले-हौले फ़र्श पर गिरा था और तभी उस तंग से पलंग पर बैठने की कोशिश में चांदनी ने अपने कूल्हे से चन्दर को हल्का सा धकिया दिया था। चांदनी के हांथ चोली के फीते पर थे गांठ ढूंढते हुये पीठ पर पहुंचे थे कि चांदनी का स्पर्श पाकर करवट बदले चन्दर ने हांथो से चांदनी के हांथों को वहीं रोक लिया। चारों हांथ कुछ पल के लिये वहीं रुके रहे। वक्त ठहर गया था और चन्दर को कालिदास फ़िर याद आ रहे थे। उसे लगा-कालिदास की 'विवृत जघनां' आज उसके सामने थी।...'को विहातुम समर्थः'-कौन छोङ सकता है? चुनौती थी।
चन्दर के हांथ पीठ से सरककर बांहों पर ...और बांहो से कन्धों पर पहुंचकर टिके। चन्दर ने हल्के से चांदनी को अपनी ओर खींचा तो जाने -अनजाने चांदनी का सिर चन्दर की बांह पर आ टिका...बांह नई चादर से ढके पुराने तकिये पर।
"कुछ बात करो ", चन्दर ने कहा।
"बात करने के पैसे दिये हैं?" चांदनी ने उलाहना दिया।
"यही समझ लो।" जवाब दिया चन्दर ने।
चांदनी से हुई बातों से उसकी कहानी मिली-चन्दर को। चांदनी कलकत्ता से घः महीने पहले बम्बई आई थी। घर मॆं एक बीमार मां थी और एक छोटा भाई। शराब पीकर ट्रक चलाते हुये बाप, एक्सीडेंट में मर गया था। इन्श्योरेंस का पैसा भी नहीं मिला था। चांदनी नर्सिंग की ट्रेनिम्ग कर रही थी, एक साल बाकी था। ट्रेनिंग पूरी करने के लिये पैसे नहीम थे।
"कोई नौकरी नहीं मिली?" चन्दर ने पूंछा था।
"नौकरी के लिये ही तो यहां आई थी।" चांदनी की कहानी के कुछ और पन्ने खुले-"रिस्ते में मौसी लगती थी वह, जो मुझे नौकरी का वादा करके यहां लाई थी। बेच दिया उसने मुझे, बाहर जो दीदी बैथी है न उसी का आदमी यहां सेठ है। कहता है, धन्धा करके पच्चीस हजार चुका दे और वापस चली जा। छः महीने में खा-पी कर, घर भेज कर, सिर्फ दस हजार कर्जा चुकाया है। पन्द्रह हजार बाकी है। उसके बाद धन्धे में बीस हजार जमा करूंगी ताकि बाकी ट्रेनिंग पूरी कर सकूं।"
चांदनी की कहानी सुनते-सुनते चंदर को झपकी आने लगी थी। चांदनी ने ताङ लिया था। एक घन्टा पूरा होने में बीस मिनट बाकी थे।
"सो रहे हो बैठोगे नहीं?" चांदनी ने चन्दर को हिलाया।
"आज मेरी कमर में दर्द है?" चन्दर ने जवाब दिया और मुंह दीवार की ओर फेर लिया।
"तो फिर औंधे हो जाओ। लाओ मसाज कर दूं। कहा न, साल भर नर्सिंग सीखी थी-फ़िज़ियोथेरेपी के साथ।"
चन्दर कुछ कह पाता उससे पहले ही चांदनी ने उसे औंधा पलट दिया। चन्दर की कमर की दोनों ओर घुटने टिका कर उसके ऊपर बैठ गई। उसके नर्म हांथों ने चन्दर की गर्दन से सरकते हुये कन्धों की मसाज शुरु कर दी। चन्दर की आंखों में अब भी खुमार था। कब आंखे झपकी, पता ही नहीं चला। चांदनी ने हल्की-हल्की मसाज करते हुये अपना बदन चन्दर की पीथ पर टिका, कान वन्दर के मुंह के नज़दीक लेजाकर, उसे बुदबुदाते हुये सुना था-'विवृत जघनां को विहातुं समर्थः'-'विवॄत जघनां-चुनौती ...हा-हा-हा'और बस, एकदम चुप्पी छा गई थी। चन्दर को सोता छोङ, चांदनी ने कपङे पहने, अपना बक्सा खोलकर छः सौ रुपये और निकाले और चन्दर के दिये चार सौ जोङकर पूरे एक हजार दीदी के हांथो में रख दिये जाकर। चन्दर के पूरी रात वहां रुकने के लिये। गलियारे के दूसरे छोर पर मछली का मसाला भुन रहा था। तीन बजे सब लङकियों के साथ खाना खा कर वह भी सो जायेगी। आज सोने से पहले उसे नहाने की जरूरत नहीं थी। आज चादर मैली नहीं थी।
सुबह सात बजे नहा-धोकर पूजा करने के बाद चाय की प्याली हांथ मॆं लिये चांदनी अपने कमरे में पहुंची तो चन्दर जूते पहन रहा था।
"चाय पी लो-फिर जाना", चांदनी ने चाय देते हुये पूंछ भी लिया, "फिर कब आओगे?"
"जब तुम बुलाओगी", चन्दर ने कहा, "लेकिन यहां कभी नहीं।"
"मतलब?"
"समझाता हूं", चन्दर ने अपनी पतलून की पेटी ढीली करके अन्दर की जेब से पांच-पांच सौ सुपये की मोटी गड्डी निकाली। दस हजार के नोट गिनकर वापस अपनी जेब में रखे और बाकी चांदनी को देते हुये बोला, "लंदन से सोंचकर आया था कि इस बार की छुटिट्यों कलकत्ता और मौका लगा तो दार्जीलिंग में काटूंगा। आज या कल की फ्लाइट पकङने का इरादा था। उसके लिये कल एक हजार पाउन्ड के रुपये लिये थे बैंक से। मेरा कलकत्ता जाना इतना जरूरी नहीं है जितना तुम्हारा कलकत्ता लौट्ना।...पूर चालीस हजार हैं। पन्द्रह हजार कर्जा चुकाने के...बीस हजार एक साल की ट्रेनिंग का खर्चा, पांच हजार हांथ खर्च और टिकट के।...और ये है मेरा टेलीफोन नम्बर और पता।"
चांदनी ने नोटो की गड्डी पलंग पर पटकी और चन्दर की गर्दन पर झूल गई।
"हटॊ मुझे जाना है।" चन्दर ने चांदनी की बाहों के हार से अपनी गर्दन छुङाते हुये कहा।
"और मुझे भी....आज शाम की गाङी से", चांदनी ने जवाब दिया।
"कलकत्ता आओगे?" चांदनी ने पूंछ भी लिया।
"घुमाओगी?... और दार्जीलिंग?"
"वादा रहा-और कर्जा चुकाने का भी।"
दोनो ने हांथ मिलाये। और फिर चन्दर सीढियां उतरने लगा था। चांदनी, रेहाना का हांथ पकङकर उसे बालकनी मॆं खींच लाई थी। मुंडेर पर टिककर, तंग गली से बाहर निकलते हुये चन्दर को हांथ हिलाकर , उस दिन की की विदाई देने के लिये।

(यह कहानी भारतेन्दु विमल के बहुचर्चित उपन्यास 'सोनमछली' के एक पात्र पर आधारित है।)

तुम मुझमें प्रिय!

तुम मुझमें प्रिय! फिर परिचय क्या
तारक में छवि, प्राणों में स्म्रति.
पलकों में नीरव पद की गति
लघु उर में पुलकों की संस्रति,
भर लायी हूं, तेरी चंचल
और करूं जग में संचय क्या!

तेरा मुख सहास अरुणोदय,
परछायी रजनी विषादमय,
वह जाग्रति वह नींद स्वप्न्मय,
खेल-खेल थक-थक सोने दे
मैं समझूंगी स्रष्टि प्रलय क्या!

तेरा अधर विचुम्बित प्याला
तेरी ही स्मित मिश्रित हाला,
तेरा ही मानस मधुशाला,
फिर पूछूं क्या मेरे साकी!
देते हो मधुमय विष्मय क्या?
रोम रोम में नंदन पुलकित,
सांस- सांस में जीवन श्त-शत,
स्वप्न-स्वप्न में विश्व अपरिचित,
मुझमें नित बनते मिटते प्रिय!
स्वर्ग मुझे क्या निष्क्रिय लय क्या?

हारूं तो खोऊं अपनापन
पाऊं प्रियतम में निर्वासन,
जीत बनूं तेरा ही बन्धन
भर लाऊं सीपी में गागर
प्रिय मेरी अब हार विजय क्या?

चित्रित तू मैं हूं रेखाक्रम,
मधुर राग तू मैं स्वर संगम,
तू असीम मैं सीमा का भ्रम,
काया छाया में रहस्यमय.
प्रेयसि प्रियतम का अभिनय क्या
तुम मुझमें प्रिय! फिर परिचय क्या

--महादेवी वर्मा

सब बुझे दीपक जला लूं

सब बुझे दीपक जला लूं
घिर रहा तम आज दीपक रागिनी जगा लूं
क्षितिज कारा तोडकर अब
गा उठी उन्मत आंधी,
अब घटाओं में न रुकती
लास तनमय तडित बांधी,
धूल की इस वीणा पर मैं तार हर त्रण का मिला लूं!
भीत तारक मंदते द्रग

भ्रान्त मारुत पथ न पाता,
छोड उल्का अम्क नभ में
ध्वंस आता हरहराता
उंगलियों की ओट में सुकुमार सब सपने बचा लूं!
लय बनी म्रदु वर्तिका
हर स्वर बना बन लौ सजीली,
फैलती आलोक सी
झंकार मेरी स्नेह गीली
इस मरण के पर्व को मैं आज दीवाली बना लूं!
देखकर कोमल व्यथा को
आंसुओं के सजल रथ में,
मोम सी सांधे बिछा दीं
थीं इसी अम्गार पथ में
स्वर्ण हैं वे मत कहो अब क्षार मैं उनको सुला लूं!
अब तरी पतवार लाकर
तुम दिखा मत पार देना,
आज गर्जन में मुझे बस
एक बार पुकार लेना
ज्वार की तरिणी बना मैं इस प्रलय को पार पा लूं!
आज दीपक राग गा लूं!

--महादेवी वर्मा


वे मुस्काते फूल नहीं

वे मुस्काते फूल नहीं
जिनको आता है मुर्झाना,
वे तारो के दीप नहीं
जिनको भाता है बुझ जाना
वे सूनो सो नयन,नहीं
जिनमें बनते आंसू मोती,
वह प्राणों की सेज,नही
जिसमें बेसुध पीडा, सोती
वे नीलम के मेघ नही
जिनको है घुल जाने की चाह
वह अनन्त रितुराज,नही
जिसनो देखी जाने की राह
ऎसा तेरा लोक, वेदना
नही,नहीं जिसमें अवसाद,
जलना जाना नहीं नहीं
जिसने जाना मिट्ने का स्वाद
क्या अमरों का लोक मिलेगा
तेरी करुणा का उपहार
रहने दो हे देव अरे
यह मेरे मिटने क अधिकार
--महादेवी वर्मा

मधुरिम के मधु के अवतार

मधुरिम के मधु के अवतार
सुधा से सुषमा से छविमान
आंसुओं में सहमे अभिराम
तारकों से हे मूक अजान!
सीख कर मुस्काने की बान
कहां आऎ हो कोमल प्राण!

स्निग्ध रजनी से लेकर हास
रूप से भर कर सारे अंग
नये पल्लव का घूंघट डाल
अछूता ले अपना मकरंद
ढूढं पाया कैसे यह देश
स्वर्ग के हे मोहक संदेश!

रजत किरणों से नैन पखार
अनोखा ले सौरभ का भार
छ्लकता लेकर मधु का कोष
चले आऎ एकाकी पार
कहो क्या आऎ हो पथ भूल
मंजु छोटे मुस्काते फूल!

उषा के छू आरक्त कपोल
किलक पडता तेरा उन्माद
देख तारों के बुझते प्राण
न जाने क्या आ जाता याद
हेरती है सौरभ की हाट
कहो किस निर्मोही की बाट!

चांदनी का श्रंगार समेट
अधखुली आंखों की यह कोर
लुटा अपना यौवन अनमोल
ताकती किस अतीत की ओर
जानते हो यह अभिनव प्यार
किसी दिन होगा कारगार!

कौन है वह सम्मोहन राग
खींच लाया तुमको सुकुमार
तुम्हें भेजा जिसने इस देश
कौन वह है निष्ठुर कर्तार
हंसो पहनो कांटों के हार
मधुर भोलेपन का संसार!

--महादेवी वर्मा


मैं नीर भरी दु:ख की बदली!

मैं नीर भरी दु:ख की बदली!
स्पंदन में चिर निस्पंद बसा,
क्रन्दन में आहत विश्व हंसा,
नयनों में दीपक से जलते,
पलकों में निर्झर्णी मचली!

मेरा पग पग संगीत भरा,
श्वासों में स्वप्न पराग झरा,
नभ के नव रंग बुनते दुकूल,
छाया में मलय बयार पली,

मैं क्षितिज भ्रकुटि पर घिर धूमिल,
चिंता का भार बनी आविरल,
रज-कण पर जल-कण हो बरसी,
नव जीवन अंकुर बन निकली!

पथ न मलिन करता आना,
पद चिन्ह न दे जाता जाना,
सुधि मेरे आगम की जग में,
सुख की सिहरन हो अंत खिली!

विस्त्रत नभ का कोई कोना,
मेरा न कभी अपना होना,
परिचय इतना इतिहास यही
उमडी कल थी मिट आज चली!

--महादेवी वर्मा

मैं बनी मधुमास आली!

मैं बनी मधुमास आली!
आज मधुर विशाद की घिर करुण आई यामिनी
बरस सुधि के इन्दु से छिट्की पुलक की चांदनी
उमड, आई री, द्रगों में
सजनि, कालिन्दी निराली!
रजत स्वप्नों में उदित अपलक विरल तरावली,
जाग सुक-पिक ने अचानक मदिर पन्चम तान ली;
बह चली निशःवास की म्रदु
बात मलय-निकुन्ज वाली!
सजल रोमो में बिछी है पांवडे मधुस्नात से,
आज जीवन के निमिष भी दूत हैं अग्यात से
क्या न अब प्रिय की बजेगी
मुरलिक मधुराग वाली?
मैं बनी मधुमास आली!
--महादेवी वर्मा

महादेवी वर्मा


महादेवी जी का जन्म सन १९०७ में फ़रूखाबाद में हुआ था. उनके पिता श्री गोविन्द प्रसाद वर्मा जो एक वकील थे और माता श्रीमती हेमरानी देवी दोनो ही शिक्षा के अनन्य प्रेमी थे. उनकी शिक्षा दीक्षा मध्य प्रदेश के जबलपुर शहर में हुयी. उन दिनों के प्रचलन के अनुसार उनका विवाह छोटी उम्र में ही हो गया था परन्तु महादेवी जी को सांसारिकता से कोई लगाव नहीं था अपितु वे तो बौध धर्म से बहुत प्रभवित थीं और स्वयं भी एक बौध भिक्षुणी बनना चाह्तीं थीं. विवाह के बाद भी उन्होंने अपनी शिक्षा जारी रखी और सन १९३३ में इलाहबाद विश्वविध्यालय से संस्कृत में परा स्नातक की उपाधि हासिल की. प्रयाग महिला विध्यापीठ में प्रधानाचार्य के पद पर कार्य करने के बाद वे वहीं कुलपित भी नियुक्त हुयीं. सुप्रसिध हिन्दी पत्रिका 'चांद' की संपदक के रूप में भी उन्होंने कार्य किया. उनकी काव्य प्रतिभा के लिये उन्हे सेक्सरिया सम्मान से विभूषित किया गया. वे राष्ट्रपति द्वारा पदमविभूषण से भी सम्मानित की गयीं. ११ सितम्बर १९८७ को उनकी जीवन लीला सामप्त हो गयी.

हिन्दी साहित्य के छयावादी काल के चार प्रमुख स्तंभों में सुमित्रानन्दन पन्त,जयशंकर प्रसाद और सूर्यकान्त त्रिपाठी निराला के साथ महादेवी जी की गिनती की जाती है.
शिक्षा और साहित्य प्रेम महदेवी जी को एक तरह से विरासत में मिला था. महादेवी जी में काव्यरचना के बीज बचपन से ही विधमान थे. छ: सात वर्ष की अवस्था में भगवान की पूजा करती हुयी मां पर उनकी तुक्बन्दी :
ठंडे पानी से नहलाती
ठंडा चन्दन उन्हे लगाती
उनका भोग हमें दे जाती
तब भी कभी न बोले हैं
मां के ठाकुर जी भोले हैं.
वे हिन्दी के भक्त कवियों की रचनाओं और भगवान बौध के चरित्र से अत्यन्त प्रभावित थीं. उनके गीतों में प्रवाहित करुणा के अनन्त स्त्रोत को इसी कोण से समझा जा सकता है. वेदना और करुणा उनके गीतों की मुख्य प्रवत्ति है. असीम दु:ख के भाव में से ही उनके गीतों का उदय और अन्त दोनो होता है.
उनकी कुछ प्रमुख रचनायें हैं-
स्म्रति की रेखायें ,दीप शिखा, निहार,रश्मि,नीरजा, सान्ध्य गीत
इसके अतिरिक्त श्रन्खला की कडियां, और अतीत के चलचित्र के नाम से उन्होने अनूठे रेखाचित्र हिन्दी को दिये.

निर्मल वर्मा

निर्मल वर्मा

जन्म : १९२९
जन्मस्थान : शिमला। बचपन पहाड़ों पर बीता।
शिक्षा : सेंट स्टीफेंसन कालेज, दिल्ली से इतिहास में एम. . कुछ वर्ष अध्यापन भी किया।

१९५९ में प्राग, चेकोस्लोवाकिया के प्राच्यविद्या संस्थान और चेकोस्लोवाकिया लेखक संघ द्वारा आमन्त्रित। सात वर्ष चेकोस्लोवाकिया में रहे और कई चेक कथाकृतियों के अनुवाद किये। कुछ वर्ष लंदन में यूरोप प्रवास के दौरान टाइम्स आफ इन्डिया के लिये वहां की सांस्कृतिक-राज्नीतिक समस्याओं पर लेख और रिपोर्ताज लिखे।
१९७२ में भारत वाप्सी। इसके बाद इन्डियन इंस्टीट्यूट आफ एड्वांस स्टडीज़ (शिमला) में फेलो रहे और मिथक चेतना पर कार्य किया। १९७७ में इंटरनेशनल राइटिंग प्रोग्राम, आयोवा(अमेरिका) में हिस्सेदारी।
उनकी 'मायादर्पण' कहानी पर फिल्म बनी जिसे १९७३ में सर्वश्रेष्ठ हिन्दी फिल्म का पुरस्कार प्राप्त हुआ।
वे निराला सृजन पीठ, भॊपाल (१९८१-८३) और यशपाल सृजन पीठ शिमला(१९८९) के अध्यक्ष भी रहे।
१९८७में इंग्लैंड के प्रकाशक रीडर्स इंटरनेशनल द्वारा निर्मल वर्मा का कहानी संग्रह ' वर्ल्ड एल्सव्हेयर' प्रकाशित किया गया। उसी अवसर पर उनके व्यक्तित्व पर बी.बी.सी चैनल४ पर एक प्रसारित इंस्टीट्यूट आफ कान्टेम्प्रेर्री आर्ट्स (आई.सीए.) द्वारा अपने वीडियो संग्रहालय के लिये उनका एक लंबा इंटरव्यू रिकार्डित किया गया।
उनकी पुस्तक क्व्वे और कालापानी को साहित्य अकादमी (१९८५)से सम्मानित किया गया।
संपूर्ण कृतित्व के लिये १९९३ का साधना सम्मान दिया गया।
.प्र. हिंदी संस्थान का सर्वोच्च राम मनोहर लोहिया अतिविशिष्ट सम्मान (१९९५) में मिला।
भारतीय ज्ञान पीठ का मूर्तिदेवी सम्मान (१९९७) में मिला।

प्रकाशित पुस्तकें:
वे दिन, लाल टीन की छत, एक चिथड़ा सुख, रात का रिपोर्टर (उपन्यास);
परिंदे, जलती झाड़ी, पिछली गर्मियों में, कव्वे और काला पानी, प्रतिनिधि कहानियां, मेरी प्रिय कहानियां, बीच बहस में, सूखा तथा अन्य कहानियां (कहानी संग्रह);
चीड़ों पर चांदनी, हर बारिश में (यात्रा संस्मरण);
शब्द और स्मृति, कला और जोखिम, ढलान से उतरते हुये, भारत और यूरोप: प्रतिश्रुति के क्षेत्र, शताब्दी के ढलते वर्षों में (निबन्ध);
तीन एकांत नाटक)
दूसरी दुनिया (संचयन)
अंग्रेजी में अनुदित :
डेज़ आफ लागिंग. डार्क डिस्पैचेज़, रैग काल्ड हैपीनैस (उपन्यास)
हिल स्टेशन, क्रोज़ आफ डिलीवरेम्स, वर्ल्ड एल्स्व्हेयर, सच बिग इयर्निंग (कहानिया)
वर्ल्ड एंद मेरी (निबन्ध)
हिन्दी में अनुदित: कुप्रीन की कहानियां

दहलीज़ - निर्मल वर्मा

पिछली रात रूनी को लगा कि इतने बरसों बाद कोई पुराना सपना धीमे कदमों से उसके पास चला आया है। वही बंगला था, अलग कोने में पत्तियों से घिरा हुआ....धीरे धीरे फाटक के भीतर घुसी है...मौन की अथाह गहराई में लान डूबा है....शुरु मार्च की वसंती हवा घास को सिहरा-सहला जाती है...बहुत बरसों के एक रिकार्ड की धुन छतरी के नीचे से आ रही है...ताश के पत्ते घांस पर बिखरे हैं....लगता है शम्मी भाई अभी खिलखिला कर हंस देंगे और आपा(बरसों पहले जिनका नाम जेली था) बंगले के पिछवाड़े क्यारियों को खोदते हुये पूंछेंगी- रूनी जरा मेरे हांथों को तो देख, कितने लाल हो गये हैं!

इतने बरसों बाद रूनी को लगा कि वह बंगले के सामने खड़ी है और सब कुछ वैसा ही है, जैसा कभी बरसों पहले, मार्च के एक दिन की तरह था...कुछ भी नहीं बदला, वही बंगला है, मार्च की खुश्क, गरम हवा सांय-सांय करती चली आ रही है, सूनी सी दोपहर को परदे के रिंग धीमे-धीमे खनखना जाते हैं-और वह घांस पर लेटी है-बस, अब अगर मैं मर जाऊं, उसने उस घड़ी सोंचा था।

लेकिन वह दोपहर ऎसी न थी कि केवल चाहने भर से कोई मर जाता। लान के कोने में तीन पेड़ों का झुरमुट था, ऊपर की फुनगियां एक दूसरे से बार-बार उलझ जातीं थीं। हवा चलने से उनके बीच के आकाश की नीली फांक कभी मुंद जाती थी कभी खुल जाती थी। बंगले की छत पर लगे एरियल पोल के तार को देखो, (देखो तो घांस पर लेटकर अधमुंदी आंखो से रूनी ऎसे ही देखती है) तो लगता है, कैसे वह हिल रहा है हौले-हौले -अनझिप आंख से देखो(पलक बिल्कुल न मूंदो, चांहे आंखों में आंसू भर जायें तो भी- रूनी ऎसे ही देखती है।) तो लगता है जैसे तार बीच में से कटता जा रहा है और दो कटे हुये तारों के बीच आकाश की नीली फांक आंसू की सतह पर हल्के-हल्के तैरने लगती है....

हर शनिवार की प्रतीक्षा हफ्ते भर की जाती है।...वह जेली को अपने स्टाम्प एल्बम के पन्ने खोल कर दिखलाती है और जेली अपनी किताब से आंखे उठाकर पूंछती है-अर्जेन्टाइना कहां है? सुमात्रा कहां है?...वह जेली के प्रश्नों के पीछे छिपे फैली हुई असीम दूरियों के धूमिल छोर पर आ खड़ी होती है।...हर रोज़ नये-नये देशों के टिकटों से एल्बम के पन्ने भरते जाते हैं, और जब शनिवार की दोपहर को शम्मी भाई होटल से आते हैं, तो जेली कुर्सी से उठ खड़ी होती है, उसकी आंखो में एक घुली-घुली सी ज्योति निखर जाती है और वह रूनी के कंधे झकझोर कर कहती है- जा, जरा भीतर से ग्रामोफोन तो ले आ।

रुनी क्षण भर रुकती है, वह जाये या वहीं खड़ी रहे? जेली उसकी बड़ी बहन है,उसके और जेली के बीच बहुत से वर्षों का सूना और लम्बा फासला है। उस फासले के दूसरे छोर पर जेली है, शम्मी भाई हैं, वह इन दोनों में से किसी को छू नहीं सकती। वे दोनों उससे अलग जीते हैं।...ग्रामोफोन महज एक बहाना है, उसे भेजकर जेली शम्मी भाई के संग अकेली रह जायेगी और तब....रूनी घांस पर अकेली भाग रही है बंगले की तरफ...पीली रोशनी में भीगी घांस के तिनको पर रेंगती हरी, गुलाबी धूप और दिल की धड़कन, हवा दूर के मटियाले पंख एरियल पोल को सहला जाते हैं सर्र सर्र, और गिरती हुई लहरों की तरह झाड़ियां झुक जाती हैं। आंखो से फिसलकर वह बूंद पलकों की छाह में कांपती है, जैसे वह दिल की धड़कन है, जो पानी में उतर आई है।

शम्मी भाई जब होटल से आते हैं, तो वे सब उस शाम लान के बीचोंबीच कैन्वास की पैराशूट्नुमा छतरी के नीचे बैठते हैं। ग्रामोफोन पुराने जमाने का है। शम्मी भाई हर रिकार्ड के बाद चाभी देते हैं, जेली सुई बदलती हैऔर वह, रूनी चुपचाप चाय पीती है। जब कभी हवा का कोई तेज झोंका आता है, तो छतरी धीरे-धीरे डॊलने लगती है, उसकी छाया चाय के बर्तनों, टिकोज़ी और जेली के सुनहरे बालों को हल्के से बुहार जाती है और रूनी को लगता है कि किसी दिन हवा का इतना जबर्दस्त झोंका आयेगा कि छतरी धड़ाम से नीचे आ गिरेगी और वे तीनों उसके नीचे दब मरेंगे।

शम्मी भाई जब अपने होस्टल की बातें बताते हैं, तो वह और जेली विस्मय और कौतुहूल से टुकुर-टुकुर उनके हिलते हुये होंठों को निहारती हैं। रिश्ते में शम्मी भाई चाहें उनके कोई न लगते हों लेकिन उनसे जान पहचान इतनी पुरानी है कि अपने पराये का अंतर कभी उनके बीच याद आया हो, याद नहीं पड़ता। होस्टल में जाने से पहले जब वह इस शहर में आये थे, तो अब्बा के कहने पर कुछ दिन उनके ही घर रहे थे। जब कभी वह शनिवार को उनके घर आते हैं, तो अपने संग जेली के लिये यूनीवर्सिटी की लायब्रेरी से अंग्रेजी उपन्यास और अपने दोस्तों से मांगकर कुछ रिकार्ड लाना नहीं भूलते।

आज इतने बरसों बाद भी जब उसे शम्मी भाई के दिये हुये अजीब-अजीब नाम याद आते हैं, तो हंसी आये बिना नहीं रहती। उनकी नौकरानी मेहरू के नाम को चार चांद लगाकर शम्मी भाई ने कब सदियों पहले की सुकुमार राजकुमारी मेहरुन्निसा बना दिया, कोई नहीं जानता। वह रेहाना से रूनी बन गई आपा पहले बेबी बनी, उसके बाद जेली आइसक्रीम और अखिर में बेचारी सिर्फ जेली बनकर रह गई। शम्मी भाई के नाम इतने बरसों बाद भी , लान की घास और बंगले की दीवारों से लिपटी बेल-लताओं की तरह, चिरन्तन और अमर है।

ग्रामोफोन के घूमते हुये तवे पर फूल पत्तियां उग आती हैं, एक आवाज़ उन्हें अपने नरम, नंगे हांथों से पकड़कर हवा में बिखेर देती है, संगीत के सुर झाडियों में हवा से खेलते हैं, घांस के नीचे सोई हुई भूरी मिट्टी पर तितली का नन्हा सा दिल धड़्कता है...मिट्टी और घांस के बीच हवा का घोंसला कांपता है...कांपता है...और ताश के पत्तों पर जेली और शम्मी भाई के सिर झुकते हैं, उठते हैं, मानो वे चार आंखो से घिरी झील में एक दूसरे की छायायें देख रहे हों।

और शम्मी भाई जो बात कहते हैं, उस पर विश्वास करना न करना कोई माने नहीं रखता। उनके सामने जैसे सब कुछ खो जाता है...और कुछ ऎसी चीज़ें हैं जो मानो चुप रहती हैं और जिन्हें जब रूनी रात को सोने से पहले सोंचती है, तो लगता है कहीं गहरा, धुंधला सा गड्ढा है, जिसके भीतर वह फिसलते-फिसलते बच जाती है, और नहीं गिरती तो मोह रह जाता है न गिरने का। ...और जेली पर रोना आता है, गुस्सा आता है। जेली में क्या कुछ है, जो शम्मी भाई जो उसमें देखते हैं , वह रूनी में नहीं देखते? और जब शम्मी भाई जेली के सांग रिकार्ड बजाते हैं, ताश खेलते हैं, ( मेज के नीचे अपना पांव उसके पांव पर रख देते हैं) तो वह अपने कमरे की खिड़्की के परदे के परे चुपचाप उन्हें देखती रहती है, जहां एक अजीब सी मायावी रहस्मयता में डूबा, झिलमिल सा सपना है और परदे को खोलकर पीछे देखना, यह क्या कभी नहीं हो पायेगा?

मेरा भी एक रहस्य है जो ये नहीं जानते, कोई नहीं जानता। रूनी ने आंखे मूंदकर सोंचा, मैं चाहूं तो कभी भी मर सकती हूं, इन तीन पेड़ों के झुरमुट के पीछे, ठन्डी गीली घांस पर, जहां से हवा में डोलता हुआ एरियल पोल दिखाई देता है।

हवा में उड़ती हुई शम्मी भाई की टाई...उनका हांथ, जिसकी हर उंगली के नीचे कोमल सफेद खाल पर लाल-लाल से गड्ढे उभर आये थे, छोटे-छोटे चांद से गड्ढे, जिन्हें अगर छुओ, मुट्ठी में भींचो, ह्ल्के-ह्ल्के से सहलाओ, तो कैसा लगेगा? सच कैसा लगेगा? किन्तु शम्मी भाई को नहीं मालूम कि वह उनके हांथों को देख रही है, हवा में उड़ती हुई उनकी टाई, उनकी झिपझिपाती आंखो को देख रही है।

ऎसा क्यों लगता है कि एक अपरिचित डर की खट्टी-खट्टी सी खुशबू अपने में धीरे-धीरे घेर रही है, उसके शरीर के एक एक अंग की गांठ खुलती जा रही है, मन रुक जाता है और लगता है कि वह लान से बाहर निकलकर धरती के अंतिम छोर तक आ गई है और उसके परे केवल दिल की धड़कन है, जिसे सुनकर उसका सिर चकराने लगता है( क्या उसके संग ही ये सब होता है या जेली के संग भी)।

-तुम्हारी ऎल्बम कहां है?- शम्मी भाई धीरे से उसके सामने आकर खड़े हो गये। उसने घबराकर शम्मी भाई की ओर देखा। वह मुस्कुरा रहे थे।
-जानती हो इसमें क्या है)- शम्मी भाई ने उसके कंधे पर हांथ रख दिया। रूनी का दिल धौकनी की तरह धड़कने लगा। शायद शम्मी भाई वही बात कहने वाले हैं, जिसे वह अकेले में, रात को सोने से पहले कई बार मन-ही-मन सोंच चुकी है। शायद इस लिफाफे के भीतर एक पत्र है, जो शम्मी भाई ने उसके लिये ,केवल उसके लिये लिखा है। उसकी गर्दन के नीचे फ्राक के भीतर से ऊपर उठती हुई कच्ची सी गोलाइयों में मीठी-मीठी सी सुईयां चुभ रही हैं, मानो शम्मी भाई की आवाज़ ने उसकी नंगी पसलियों को हौले से उमेठ दिया हो। उसे लगा, चाय की केतली की टीकोज़ी पर लाल-नीली मछलियां काढी गई हैं, वे अभी उछलकर हवा में तैरने लगेंगी और शम्मी भाई सब कुछ समझ जायेंगे-उनसे कुछ भी छिपा न रहेगा।

शम्मी भाई ने नीला लिफाफा मेज पर रख दिया और उसमें से टिकट निकालकर मेज पर बिखेर दिये।
-ये तुम्हारी एल्बम के लिये हैं....
वह एकाएक कुछ समझ नहीं सकी। उसे लगा, जैसे उसके गले में कुछ फंस गया है और उसकी पहली और दूसरी सांस के बीच एक गहरी अंधेरी खाई खुलती जा रही है....

जेली, जो माली के फावड़े से क्यारी खोदने में जुटी थी, उनके पास आकर खड़ी हो गई और अपनी हथेली हवा में फैलाकर बोली-देख रूनी, मेरे हांथ कितने लाल हो गये हैं!

रूनी ने अपना मुंह फेर लिया।...वह रोयेगी, बिल्कुल रोयेगी, चाहें जो कुछ हो जाय...

चाय खत्म हो गई थी। मेहरुन्निसा ताश और ग्रामोफोन भीतर ले गई और जाते-जाते कह गई कि अब्बा उन सबको भीतर आने के लिये कह रहे हैं। किन्तु रात होने में अभी देर थी, और शनिवार को इतनी जल्दी भीतर जाने के लिये किसी को कोई उत्साह नहीं था। शम्मी भाई ने सुझाव दिया कि वे कुछ देर के लिये वाटर रिजर्वायर तक घुमने चलें। उस प्रस्ताव पर किसी ने कोई अपत्ति नहीं थी। और वे कुछ ही मिनटों में बंगले की सीमा पार करके मैदान की ऊबड़ खाबड़ जमीन पर चलने लगे।

चारों ओर दूर-दूर तक भूरी सूखी मिट्टी के ऊंचे-नीचे टीलों और ढूहों के बीच बेरों की झाड़ियां थीं, छोटी-छोटी चट्टानों के बीच सूखी धारा उग आई थी, सड़ते हुये सीले हुये पत्तों से एक अजीब, नशीली सी, बोझिल कसैली गंध आ रही थी, धूप की मैली तहों पर बिखरी-बिखरी सी हवा थी।

शम्मी भाई सहसा चलते-चलते ठिठक गये।
-रुनी कहां है?
-अभी हमारे आगे आगे चल रही थी-जेली ने कहा। उसकी सांस ऊपर चढती है और बीच में ही टूट जाती है।
दोनों की आंखे मैदान के चारों ओर घूमती हैं... मिट्टी के ढूहों पर पीली धूल उड़ती है।...लेकिन रूनी वहां नहीं है, बेर की सूखी, मटियाली झाड़ियां हवा में सरसराती हैं, लेकिन रूनी वहां नहीं है। ...पीछे मुड़कर देखो, तो पगडन्डियों के पीछे पेड़ों के झुरमुट में बंगला छिप गया है, लान की छतरी छिप गई है...केवल उनके शिखरों के पत्ते दिखाई देते है, और दूर ऊपर फुनगियों का हरापन सफेद चांदी में पिघलने लगा है। धूप की सफेदी पत्तों से चांदी की बूंदो सी टपक रही है।

वे दोनों चुप हैं...शम्मी भाई पेड़ की टहनी से पत्थरों के इर्द गिर्द टेढी-मेढी रेखायें खींच रहे हैं। जेली एक बड़े से चौकोर पत्थर पर रुमाल बिछाकर बैठ गई है। दूर मैदान के किसी छोर से स्टोन कटर मशीन का घरघराता स्वर सफेद हवा में तिरता आता है, मुलायम रुई में ढकी हुई आवाज की तरह, जिसके नुकीले कोने झार गये हैं।

-तुम्हें यहां आना बुरा तो नहीं लगता?- शम्मी भाई ने धरती पर सिर झुकाये धीमे स्वर में पूंछा।
-तुम झूठ बोले थे। - जेली ने कहा।
-कैसा झूठ, जेली?
-तुमने बेचारी रूनी को बहकाया था, अब वह न जाने कहां हमें ढूंढ रही होगी।
-वह वाटर-रिजर्वायर की ओर गई होगी, कुछ ही देर में वापस आ जायेगी। -शम्मी भाई उसकी ओर पीठ मोड़े टहनी से धरती पर कुछ लिख रहे हैं।
जेली की आंखो पर छोटा सा बादल उमड़ आया है-क्या आज शाम कुछ नहीं होगा, क्या जिन्दगी में कभी कुछ नहीं होगा? उसका दिल रबर के छल्ले की मानिंद खिचता जा रहा है।
-शम्मी!...तुम यहां मेरे संग क्यों आये? - और वह बीच में ही रुक गई। उसकी पलकों पर रह रह कर एक नरम सी आहट होती है और वे मुंद जाती हैं, उंगलियां स्वयं-चालित सी मुट्ठी में भिंच जाती हैं, फिर अवश सी आप ही अप खुल जाती हैं।
-जेली, सुनो...
शम्मी भाई जिस टहनी से जमीन को कुरेद रहे थे, वह टहनी कांप रही थी। शम्मी भाई के इन दो शब्दों के बीच कितने पत्थर हैं, बरसों, सदियों के पुराने, खामोश पत्थर, कितनी उदास हवा है और मार्च की धूप है, जो बरसों बाद इस शाम को उनके पास आई है और फिर कभी नहीं लौटेगी। ..शम्मी भाई...! प्लीज़!..प्लीज़!..जो कुछ कहना है, अभी कह डालो, इसी क्षण कह डालो! क्या आज शाम कुछ नहीं होगा, क्या ज़िन्दगी में कभी कुछ नहीं होगा?

वे बंगले की तरफ चलने लगे- ऊबड़ खाबड़ धरती पर उनकी खामोश छायायें ढलती हुई धूप में सिलटने लगीं।...ठहरो! बेर की झाड़ियों के पीछे छिपी हुई रूनी के होठ फड़क उठे, ठहरो, एक क्षण! लाल भुरभुरे पत्तों की ओट में भूला हुआ सपना झांकता है, गुनगुनी सी सफेद हवा, मार्च की पीली धूप, बहुत दिन पहले सुने रिकार्ड की जानी-पहचानी ट्यून, जो चारों ओर फैली घांस के तिनकों पर बिछल गई है...सब कुछ इन दो शब्दों पर थिर हो गया है, जिन्हें शम्मी भाई ने टहनी से धूल कुरेदते हुये धरती पर लिख दिया था, 'जेली...लव'

जेली ने उन शब्दों को नहीं देखा। इतने सालों के बाद आज भी जेली को नहीं मालूम कि उस शाम शम्मी भाई ने कांपती टहनी से जेली के पैरों के पास क्या लिख दिया था। आज इतने लम्बे अर्से बाद समय की धूल उन शब्दों पर जम गई है। ...शम्मी भाई, वह और जेली तीनों एक दूसरे से दूर दुनिया के अलग- अलग कोनों में चले गये हैं, किन्तु आज भी रूनी को लगता है कि मार्च की उस शाम की तरह वह बेर की झाडियों के पीछे छिपी खड़ी है, (शम्मी भाई समझे थे कि वह वाटर-रिजर्वायर की तरफ चली गई थी) किन्तु वह सारे समय झाड़ियों के पीछे सांस रोके , निस्पन्द आंखो से उन्हें देखती रही थी, उस पत्थर को देखती रही थी, जिस पर कुछ देर पहले शम्मी भाई और जेली बैठे रहे थे।...आंसुओं के पीछे सब कुछ धुंधला-धुंधला सा हो जाता है...शम्मी भाई का कांपता हांथ, जेली की अध मुंदी सी आंखे, क्या वह इन दोनों की दुनिया में कभी प्रवेश नहीं कर पायेगी?

कहीं सहमा सा जल है और उसकी छाया है, उसने अपने को देखा है, और आंखे मूंद ली हैं। उस शाम की धूप के परे एक हल्का सा दर्द है, आकाश के उस नीले टुकड़े की तरह, जो आंसू के एक कतरे में ढरक आया था। इस शाम से परे बरसों तक स्मृति का उद्भ्रान्त पाखी किसी सूनी पड़ी हुई उस धूल पर मंडराता रहेगा, जहां केवल इतना भर लिखा है..'जेली ..लव'

उस रात जब उनकी नौकरानी मेहरुन्निसा छोटी बीबी के कमरे में गई, तो स्तम्भित सी खड़ी रह गई। उसने रूनी को पहले कभी ऎसा न देखा था।
-छोटी बीबी, आज अभी से सो गईं? मेहरू ने बिस्तर के पास आकर कहा।
रूनी चुपचाप आंखे मूंदे लेटी है। मेहरू और पास खिसक गई है। धीरे से उसके माथे को सहलाया- छॊटी बीबी क्या बात है?
और तब रूनी ने अपनी पलकें उठा लीं, छत की ओर एक लम्बे क्षण तक देखती रही, उसके पीले चेहरे पर एक रेखा खिंच आई...मानो वह दहलीज हो, जिसके पीछे बचपन सदा के लिये छूट गया हो...
-मेहरू ,.बत्ती बुझा दे- उसने संयत, निर्विकार स्वर में कहा- देखती नहीं, मैं मर गई हूं!

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शब्द.....
क्या हैं आखिर शब्द? अक्षरों से भरी एक उंजलि ही तो हैं,
जो बनते हैं उदगार कितने बेचैन ह्र्दयों का...
कभी गीत का रूप लेते हैं ये शब्द ,कभी नज़्म का।
कभी कहते हैं कोई कथा, कभी बयान करते हैं कोई किस्सा।
कभी मौन होकर ही कह देते हैं किन्ही अनकही बातों को।
उकेर सकते हैं ये शब्द पत्थर की किसी मूरत को...
कभी ये शब्द इन्द्रधनुषी रंग बिखेरते हैंकिसी चित्रकार की तूलिका से।
शब्दों का नहीं है कोई आदि या अन्त ...,
युगों से ये खुद ही हैं पहचान अपनी गवाह हैं इतिहास के!
इन्हीं जादुई अक्षरों से भरी ये उंजलि ...
अर्पित है ये शब्दांजलि!

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