Friday, February 4, 2011

कैंसर--तेजेन्द्र शर्मा

क्या हो गया है मुझे? मुझ जैसा तर्कसम्मत व्यक्ति भी किन चक्करों में फंस गया है? ....क्या प्यार मनुष्य को इतना कमजोर बना देता है?...नहीं....संभवतः प्यार के खो जाने का डर उससे कुछ भी करवा सकता है।...शायद...इसलिये इस कैंसर समूह ने मुझे इस बुरी तरह जकड़ लिया है।
कैंसर!...
"युअर वाइफ इज़ सफरिंग प्राम कार्सीनोमा आफ...."
उस समय इन शब्दों का वजन ठीक से महसूस नहीं हो पाया था। इतने भारी-भरकम नाम वाली बीमारी ने जैसे मुझे बौरा दिया था। डा. पिन्टो अपने प्रोफेशनल अंदाज में मुझे समझा रहे थे कि मेरी पत्नी को क्या बीमारी हो गई है।
"इसका मतलब क्या हुआ डाक्टर साहब?" मेई आवाज रिरियाती हुई सी निकली थी।
"वैल! सीधे साधे शब्दों में यूं कह सकते हैं कि आपकी वाइफ को कैंसर है और उनकी लैफ्ट ब्रेस्ट का आपरेशन करना होगा...यानी कि 'रैडिकल मैसेक्टमी'।
पूनम को कैसे बताऊंगा?...कल उसका जनम्दिन है....तैंतीसवा जन्मदिन। ...क्या यह समाचार उसके जन्मदिन का तोहफा है?...क्या उससे झूंठ बोल जाऊं?...पर क्या वह दूध पीती बच्ची है? ...रिपोर्ट तो मांगेगी ही...देखेगी भी..और पढेगी भी।...तो फिर? 'रैडिकल मैसेक्टमी'। मतलब कि बाईं ब्रेस्ट का काटना...यानी कि पूनम अधूरी ...यह मैं क्या सोंचने लगा?...क्या मैं पूनम को केवल छाती की गोलाइयों के कारण प्यार करता हूं? विवाह के दस वर्षों का अर्थ केवल छातियां ही हैं?...नहीं-नहीं..यह आपरेशन तो क्या दुनिया का कोई भी हादसा उसकी पूनम को अधूरा नहीं बना सकता।...पूनम तो मेरे जीवन का सरमाया है...मेरी पूंजी है। मुझे दस वर्ष चांद सी ठंडक देने वाली पूनम पर अब क्या गुजरने वाली है?...आकांक्षा तो थोड़ी समझदार हो गई है...आठ वर्ष की हो गई है...परंतु अपूर्व तो अभी केवल तीन साल का ही है।...क्या वह अभी से बिन मां का हो जायेगा?...क्या पूनम भी बस एक तस्वीर बन कर दीवार पर लटक जयेगी, जिस पर एक हार चढा होगा?
"फिर आप क्या सलाह देते हैं डाक्टर साहब", मेरी आवाज रो रही थी।
"इसमें अब सलाह जैसी कोई बात है ही नहीं मि.मेहरा! मैं तो यही कहूंगा कि आपरेशन जल्दी से जल्दी हो जाना चाहिये। अब यह आपरेशन चाहें आप टाटा से करवायें या हमारे यहां... आपरेशन है बहुत जरूरी। फिर आप तो किस्मत वाले हैं...अभी तो पहली स्टेज है टी.वन, एन.जीरो।"
"आपका मतलब है...अभी फैला नहीं है?" मेरी आवाज जैसे कमरे में चारों ओर फैल गई थी।
जब चावला आन्टी का आपरेशन हुआ था, तो जैसे मुझे कुछ भी महसूस नहीं हुआ था।...वे बेचारी रेडियेशन को बिजली और कीमोथेरेपी को बड़ा इंजेक्शन कहने वाली अनपढ आन्टी। पर आन्टी के आपरेशन को तो आठ वर्ष से ऊपर हो गये। चावला आंटी तो उस समय ही पैंतालीस से ऊपर थीं।..किंतु डा. पिन्टो तो कुछ और ही कह रहे थे, "वो क्या है मि.मेहरा आई वुड पुट इट दिस वे, कि ब्रेस्ट कैंसर में मरीज जितना जवान रहता है, इलाज उतना ही मुश्किल हो जाता है। मंथली हार्मोनल डिस्टर्वैंस इलाज में सबसे बड़ी बाधा होती है।...मेनोपाज के बाद मरीज का इलाज उतना ही ज्यादा आसान हो जाता है।
पूनम तो अभी तैंतीस भी पूरे नहीं कर पाई।...सबसे पहले दिल्ली फोन करता हूं।....पर बाऊजी तो स्वयं ही दिल के मरीज हैं। इस समाचार से पता नहीं क्या असर होगा उनकी सेहत पर? बंबई शहर में एक भी तो रिश्तेदार नहीं अपना..परेदेश जैसा देश है।..पूनम के घर वालों से बात करनी ही होगी। उनसे सलाह लिये बिना कोई भी कदम नहीं उठाना चाहिये।
पर जिसके बारे में कदम उठाना है पहले उससे तो बात कर लूं। आकांक्षा भी तो दम साधे , अपनी मम्मी की रिपोर्ट की प्रतीक्षा कर रही होगी। अपूर्व तो अपने खिलौनों में मस्त होगा।..पूनम के दिल पर यह प्रतीक्षा की घड़ियां क्या असर कर रही होंगी?..उसने कहा भी था कि अस्पताल से ही फोन कर देना...फोन करने की हिम्मत मुझमें थी कहां?..क्या कहता?
कहना तो पड़ेगा ही। सब कुछ बताना पड़ेगा। फिल्मों में लोग कितनी आसानी से मरीज से उसकी बीमारी छुपा लेते हैं।..पूनम को क्या कहूं, "पुन्नी क्योंकि तुम्हें जुकाम हो गया है, इसलिये तुम्हारी दांई ब्रेस्ट कटवाने जा रहा हूं।" ..आज समझ में आ रहा है कि पूनम क्यों सदा ही चावला आन्टी के प्रति सहानुभूति पूर्ण रवैया रखती थी।..क्यों उनकी छोटी से छोटी जिद भी पूरी करने की कोशिश करती थी।..सहज नारी प्रतिक्रिया।
प्रतिक्रिया तो व्यक्त करता है चन्द्रभान। बात बात पर बहस करने को उतारू हो जाता है। कहने को तो मेरा मित्र है, किंतु उसके पास हर मर्ज का एक ही इलाज है-विश्वास! ..देवी देवताओं में अन्ध विश्वास। वह तो यह भी पूंछ बैठेगा, "डाक्टरों के पास गये ही क्यों?" उसे डाक्टरी और शल्यक्रिया समझ में नहीं आती। वैसे अगर डाक्टर के पास न भी गये तो क्या फर्क पड़ता?...पूनम को न तो कोई दिक्कत थी और न ही कोई शिकायत।...दर्द, बुखार, थकान, कमजोरी...कुछ भी तो नहीं था। वो दिन भी कितने खुशी के दिन थे। सारा परिवार लन्दन में छुट्टियां मना रहा था। चार सप्ताह कैसे बीत गये पता ही नहीं चला था। आकांक्षा तो अभी भी वाटर पैलेस, चेज़िंगटन ज़ू, आल्टन टावर की बातें करती नहीं थकती। मैडम टुसाद संग्राहलय में तो पूनम चकित रह गई थी कि मोम के पुतले कितने असली लग सकते हैं।...किंतु पूनम का व्यवहार सदा की भांति सधा हुआ संतुलित था। अपनी खुशी और उदासी पर न जाने कैसा नियन्त्रण था उसका।
वहीं लंदन में ही एक दिन नहाकर गुसलखाने से बाहर निकली तो बाईं छाती में छोटी सी गांठ महसूस हुई थी। उस गांठ को खोलना कितना मुश्किल पड़ रहा है। पूनम का व्यवहार तो गांठ देखने के बाद भी पूरी तरह से नियन्त्रित था। नियन्त्रण! यहीं तो पूनम की विशेषता है। पर क्या आज का समाचार सुनने के बाद भी वह अपनी भावनाओं पर काबू रख पायेगी। यदि वह बेकाबू होने लगी तो मैं स्वयं क्या करूंगा?...मैंने तो अपने दस वर्षीय विवाहित जीवन में पूनम को आंदोलित होते कभी देखा ही नहीं। आज उसकी क्या प्रतिक्रिया होगी? वह तो बड़ी से बड़ी दुर्घटना को सहज रूप से ले लेती है। "मेरे मम्मी डैडी मेरी शादी की बात कहीं और चला रहे हैं।" पूनम ने बड़ी सहजता से बता दिया था। आर्ट्स फैकल्टी के बाहर बैठे कुल्चे छोले खा रहे थे। दरअसल कुल्चे छोले तो पूनम को खाने पडते थे। मैं तो उसका टिफिन ही खाया करता था।...अगला कौर हांथ में ही रह गया था। इतनी बड़ी बात और पूनम आराम से कुलेचे खा रही थी।"...तो फिर क्या करें?" मैं घबरा गया था।
"मैं अपने जीजा जी से बात करूंगी। अगर वे मान गये तो मम्मी डैडी को मना लेंगे।"
जीजा जी, भाईजी, मम्मी-डैडी और बहनें सभी मान गये थे। पूनम को कोई भी भला कैसे इन्कार कर सकता था। उसके व्यक्तित्व से अभिभूत हुये बिना कोई रह ही नहीं सकता। कालेज में भी तो कितने ही लड़के उस पर मरते थे। परंतु पूनम ने
मुझे चाहा तो बस...।
खूबसूरत लम्हों का एक सागर इकट्ठा कर लिया है पूनम ने मेरे लिये। कई जीवन उन हसीन लम्हों के सहारे बिता सकता हूं। गर्दिश के दिनों में दोनों फर्श पर बिस्तर बिछाकर भी सोये। एक-एक करके पूनम ने घर की सभी चीज़ें बनाईं।...घर बनाया। मुझे संवारा, तराशा। और आज जब अपनी मेहनत को फल पाने का समय आया तो यह बीमारी।
मुझे मालूम था यही होगा। पूनम ने बिना कुछ पूंछे ही रिपोर्ट मेरे हांथ से ले ली थी। रिपोर्ट पढने के बाद काफी समय तक कमरे में मुर्दा चुप्पी छाई रही। अकांक्षा की आंखे अपनी मम्मी पर गड़ी थीं। "पूनम घबराने की कोई बात नहीं। डा. पिन्टो कह रहे थे कि बहुत इनीशियल स्टेज है। और इस स्टेज पर तो शर्तिया इलाज हो सकता है।"
पूनम ने रिपोर्ट एक तरफ सरका दी। आकांक्षा को अपने पास खींच लिया और उसके सर पर एक चुंबन अंकित कर दिया।
उसकी दोनों आंखो में आंसुओं की एक लकीर सी उभर आई थी। वह लकीर मुझे अंदर तक कहीं चीर गई थी। उस रात बिना
भोजन किये ही हम सब सो गये थे।
सुबह जब आकांक्षा स्कूल चली गई और अपूर्व नर्सरी तो पूनम ने मुझे संभाला, "जब कह रहे हो कि पहली स्टेज है तो चेहरे पर इतनी मुर्दनी क्यों फैला रखी है। चावला आन्टी भी तो कितने सालों से चल रही हैं। मैं भी ठीक हो जाऊंगी।"
मुझे लग रहा था मुझ से बड़ा बेवकूफ दुनिया में कोई नहीं हो सकता। पूनम का हौसला मुझे बढाना चाहिये था और यहां सब
कुछ उल्टा हो रहा था। बस आगे बढ कर पूनम को बांहो में भर लिया था। बिल्डिंग में बात फैलते देर नहीं लगी। करुणा को
पूनम ने बताया; करुणा ने मधु को और मधु ने मिसेज रंगनाथन को। मिसेज रंगनाथन को पता लगने का अर्थ है कि पी.टी.आई. और यू.एन.आई. दोनों को एक साथ पता लगना। नेशनल नेटवर्क पर बिल्डिंग में शोर मच गया। टाटा के डाक्टरों के नाम, पते सब मालूम होने लगे। मेरा विश्वास अभी भी डाक्टर पिन्टो में पूरी तरह जमा हुआ था।
डा. पिन्टो के क्लीनिक में एक बार फिर पहुंच गये, "डा. पिन्टो! आपसे एक सवाल पूंछना है। ..मैं अपनी पत्नी का आपरेशन टाटा के किसी भी डाक्टर से करा सकता हूं, विदेश चाहूं तो वहां भी ले जाऊं। फिर भला आपसे ही हम आपरेशन क्यों करवाऊं?"
एक क्षण के लिये गुस्सा डा. पिन्टो के चेहरे पर आया और फिर कपूर बन कर उड़ गया। उन्होंने अपनी छाती पर क्रास बनाया, "मिस्टर मेहरा, मैंने तो एक बार भी आपसे नहीं कहा कि आप आपरेशन मुझसे करवायें। आप पिछले बीस मिनट से मुझसे बात कर रहे हैं। जरा टाटा में करके देखिये। और फिर बंबई में एक भी कैंसर सर्जन ऎसा नहीं है जिसने टाटा में काम न किया हो। आपरेशन आप कहीं भी करवाईये, किसी से भी करवाईये, पर जल्दी करवाईये।..अभी पहली स्टेज है..कहीं देर न हो जाय। आई वुड पुट इट दिस वे...कि आजकल हर बड़ा अस्पताल कैंसर सर्जरी के लिये पूरी तरह से इक्विप्ड है।..और सर्जन लोग तो छोटे नर्सिंग होम में भी आपरेशन कर देते हैं।...बाकी आप जैसा ठीक समझें।"
डा.पिन्टो की दो टूक बातों ने मेरा और पूनम दोनों का दिल जीत लिया था। कुछ क्षणों के लिये हम दोनों जैसे कैंसर की
भयावहता से जैसे मुक्त हो गये थे। कभी हम डा. पिन्टो के चेहरे देखते कभी जीसस क्राइस्ट की फोटो को। आपरेशन का दिन
तय कर आये हम दोनों।
रात आने का समय तो तय है। अबकी बार हम डर रहे थे कि रात अपने साथ क्या क्या लाने वाली है। लितनी लंबी होगी यह रात। क्या इस रात के बाद सवेरा देख पायेंगे।
बच्चे सो चुके थे। आपरेशन को बस चार रातें बाकी थीं। मन में उमड़ते घुमड़ते विचार जैसे रिले रेस में दौड़ रहे थे। पहला
खयाल हट भी नहीं पाता था कि दूसरा विचार जगह ले लेता था। मैं इन विचारों की उधेड़्बुन मॆं फंसा हुआ था कि पूनम रसोई की बत्ती बुझा कर बेडरूम में पहुंची। रोज की तरह आज भी सोने से पहले स्नान करके आई थी। बदन से चंदन की खुशबू पूरे कमरे में फैल रही थी। आकर चुपचाप बिस्तर पर लेट गई। सदा की तरह आंखे बंद करके गायत्री मंत्र जपने लगी। मैं उस सात्विक चेहरे को निहारे जा रहा था।
समझ में नहीं आ रहा था कि ऎसे फारिश्ते भी ऎसी बीमारी का शिकार हो सकते हैं।
"मुझे बहुत प्यार करते हो?"
"यह क्या बात पूंछी तुमने?"
"मुझे तुमसे एक बहुत बड़ी शिकायत है नरेन। तुम कभी भी मेरे बारे में पजेसिव नहीं हुये।..मैं चाहें किसी से भी बात करूं,
किसी के साथ भी घूमने जाऊं, तुम्हें बुरा नहीं लगता। मुझे लेकर तुमहारे दिल में कभी जलन या ईर्ष्या की भावना नहीं
जागती।...एक बात बताओ..मेरे शरीर को भी उतना ही प्यार करते हो जितना कि मुझे?"
"पूनम!".....
"नहीं, सच-सच बताओ।...आज तुम्हारे मुंह से सुनना चाहती हूं।"
"मैं सिर से पांव तक तुम्हें प्यार करता हूं।"
"जितना चाहें अभी प्यार कर लो नरेन.....अब तो बस चार रातें बाकी हैं.....फिर जिन्दगी कभी सहज नहीं हो पायेगी.....मुझसे नफरत तो नहीं करने लगोगे नरेन..सच! इसमें मेरा कोई दोष नहीं है।"
फूट पड़ी थी पूनम की रुलाई। मेरी छाती उसके आंसुओं से गीली हो रही थी। मुझे ही आज फैसला करना था। पूनम को आज
समझा देना था कि आपरेशन के बाद भी पूनम मेरे लिये उतनी ही आकर्षक, प्यारी और जरूरी होगी जितनी आज है। मुझे
ऎकाऎक बहुत बड़ा हो जाना था। मैं पूनम की परिपक्वता पर आश्रित होने का आदी हो गया था। अब मुझे इस किरदार को पूरी शिद्दत से समझना होगा, निभाना होगा।
डा.पिन्टो का विश्वास, पूनम का साहस और हालात की संजीदगी सब मेरी हिम्मत बढा रहे थे। आपरेशन के एक दिन पहले
पूनम को अस्पताल में भर्ती कराना था। छाती का एक्सरे, खून टेस्ट, ई.सी.जी और जाने क्या-क्या। रात का खाना भी पूनम को जल्दी खिला दिया गया था। रात को डा.पिन्टो के सहायक डा. शाह और डा. दवे दोनों पूनम का चेक अप करने आये थे। मैं अब भी उम्मीद लगाये बैठा था कि उनमें से कोई कह दे कि पूनम को कैंसर है ही नहीं।
कमरे के बाहर निकलते-निकलते डा.दवे की आवाज कानों से टकराई, "शिरीश, डू यू थिंक सर हैज़ डाय्ग्नोज़्ड दि केस
करेक्टली?"
"हां यार! सिम्प्टम तो कोई दिखाई नहीं दे रहा। शी लुक्स पर्फैक्टली नार्मल एन्ड सो यंग।"
दम साधे सब सुन रहा था। पर रिपोर्ट मेरे सामने रखी थी। रिपोर्ट में साफ-साफ लिखा था कि ब्रेस्ट में बिखरे-बिखरे कैंसर
सैल्ज़ मौजूद हैं।..चमत्कार कर दो प्रभू।...सुबह अपरेशन टेबल प डा. पिन्टो को गांठ दिखाई ही न दे।
दिमाग शायद शांत होना ही नहीं चाहता था। इसलिये तो अशांत आत्मा की तरह इधर-उधर भटक रहा था।...
कई बार हैरान भी होता था कि पूनम और मैं एक सा भाग्य लेकर क्यों जन्में। पूनम भी बीच की है, उससे बड़ा एक भाई और एक छोटी बहन। मैं भी बीच का हूं, मुझसे बड़ी एक बहन और एक बहन छोटी। दोनों की शक्लें अपने अपने परिवार में किसी से नहीं मिलतीं। दोनों को ही साहित्य से लगाव था। दोनों की सासें तो हैं पर मां किसी एक की भी नहीं। नहीं तो इस वक्त कोई एक मां तो हमारे साथ होती। अपने बच्चों को अकेला घर में छोड़कर हम दोनों अस्पताल में यूं न बैठे होते। बाहर भी अंधेरा है और भीतर भी। सुबह की रोशनी की प्रतीक्षा है।
सुबह को आना ही था। आज सुबह थोड़ी जल्दी हो गई थी। पूनम को खाने को कुछ भी नहीं दिया गया था -बस चाय।
पूनम उठकर स्वयं ही नहाई थी। उसके बदन से भीनी-भीनी खुशबू उड़ रही थी। खुशबू! जो सदा ही मुझे दीवाना बना देती थी। उस डेटाल और स्पिरिट से भरे माहौल में भी पूनम के बदन की खुशबू मेरे नथुनों तक पहुंच रही थी। जैसे बलि से पहले उसे सजाया जा रहा था।
सुशील अपनी पत्नी लुइज़ा के साथ आया था। दोनों पूनम का हांथ पकड़े प्रभु यीशु से प्रार्थना कर रहे थे। मन ही मन मैं उनकी हर बात दोहरा रहा था। सबके दिल में एक ही दुआ थी। डा. पिन्टो को देखते ही दिल उछलकर गले में आ फंसा था। ज्ल्दी से उनके करीब पहुंचा, "डाक्टर आपको पक्का यकीन है कि कैंसर ही है? कहीं कोई गलती तो नहीं हो रही है?" मैं कैसे कहता कि मैं उनके सहायकों की बातें सुन चुका था।
डा.पिन्टो ने अपनी छाती पर क्रास बनाया, "लुक मैं पहले लम्प को निकालकर 'कोल्ड सेक्शन टेस्ट' करूंगा। अगर टेस्ट ठीक रहा, तो पैंतालीस मिनट में हम बाहर आ जायेंगे....अगर , नोड्ज़ इन्वाल्व हुये तो, मेजर आपरेशन करना होगा। नाउ, बेस्ट आफ लक!"
और मैं बस देख रहा था। पूनम गाड़ी पर लेटी अंदर पहुंच चुकी थी। डा. पिन्तो ने कपड़े बदलकर हरा सा कोट पहन लिया था। बेचैनी मेरे रक्त के साथ-साथ मेरे शरीर में संचार कर रही थी। अभिनव मेरा हांथ थामे खड़ा था। अपनी शूटंग आज कैंसिल कर दी थी। फिर भी उसे खड़ा देख कर लोग समझ रहे थे कि शायद कोई शूटिंग हो रही है। विश्वास दादा ने जैसे मेरे विश्वास को थाम रखा था। उनकी उभरी हुई जेब से सौ-सौ रुपयों की गड्डी अपने ढंग से मेरा हौसला बढा रही थी।
पैंतालीस मिनट, एक घंटा, दो घंटे, तीन घंटे...वक्त धीरे धीरे बढता जा रहा था। मेरी नेस्तेज निगाहें शून्य में कहीं दूर कुछ खोज रहीं थीं। 'कोल्ड सेक्शन'....पाज़िटिव..। जीवन भर सिखाया गया था पाज़िटिव होना कितनी अच्छी बात है। ..परंतु आज का टेस्ट पाज़िटिव होने का अर्थ कितना भयानक है। आकांक्षा और अपूर्व तो आज स्कूल भी नहीं गये। दम साधे घर में ही पड़े हैं। चिंता और बोरियत बाहर बैठे चेहरों पर साफ दिखाई दे रही थी। सब की चिंता का विषय एक ही था- "इतनी छोटी उम्र में इतनी भयंकर बीमारी!..बच्चों का क्या होगा? अभी तो बहुत छोटे हैं।"
और डा.पिन्टो बाहर निकले। छाती पर एक बार फिर क्रास बनाया। "गाद इज़ ग्रेट मि. मेहरा! सब ठीक हो गया। मैंने काफी गहरे तक आपरेट कर दिया है। कैंसर आलरेडी नोड्ज़ तक पहुंच गया था.. अभी तो बेहोश पड़ी है आपकी वाइफ...बट जल्दी ही होश आ जायेगा।
आपरेशन थियेटर में जाकर पूनम को देखने की हिम्मत नहीं हो पा रही थी। पूनम को कैसे देख पाऊंगा। उसकी आंखॆ मुझसे
सवाल पूंछेंगी..।पर वह तो बेहोश है..।पूनम को अक्सीजन दी जा रही थी....।चेहरा जर्द खून चढ रहा था। शरीर जैसे नलियों से अटा पड़ा था। आपरेशन कामयाब रहा था|
अस्पताल के स्पेशल वार्ड के कमरा न. चौबीस में पहुंच गई थी पूनम। ...चौबीस उसका जन्मदिन। कमरा भी उसी नम्बर का। ..एक-एक करके सभी दोस्त और मिलने वाले चले गये थे। कमरे में एक मैं, एक पूनम और एक एयर्कन्डीशन की आवाज़। प्रतीक्षा कर रहा था कि पूनम कसमकसाये ही सही। परंतु अभी तो नशीली दवा का गहरा असर था। पूनम तो बस सोये ही जा रही थी। और मैं उसे देखे ही जा रहा था।...एयर कन्डीशन की आवाज़ पर सवार मेरे विचार मेरे दिमाग को मथे आ रहे थे। पूनम से पहली मुलाकात से लेकर आज तक की प्रत्येक घटना मेरे मानस पटल पर उजागर होने लगी थी। क्या ठीक हो जायेगी पूनम?...क्य फिर वही सुहाने दिन लौट आयेंगे? पूनम को कैंसर हुआ ही क्यों?...डा. पिन्टो से बच्चों की तरह पूंछ बैठा था, "डाक्टर , यह कैंसर होता ही क्यों है...इसका कारण क्या है?"
डा.पिन्टो ने प्रभु यीशु की तस्वीर की तरफ इशारा करते हुये कहा था, "यही जानते हैं।...दर असल मि. मेहरा जो इंसान भी कैंसर होने के सही कारण होने के बारे में जान लेगा उसे तो नोबेल पुरस्कार मिलेगा। कैंसर क्या होता है यह तो साइंस जानती है...पर कैंसर क्यों होता है इसके जवाब में अभी तक अंधेरा है। यह शरीर अपने विरुद्व क्यों हो जाता है, क्यों यह शरीर आत्मसंहार शुरु कर देता है, इसका सही जवाब तो अभी तक वैज्ञानिकों को भी नहीं मिल पाया है।"
जिस-जिस को समाचार मिला वह अस्पताल पहुंचने लगा। हर व्यक्ति को वही-वही बातें बताते बोरियत होने लगती थी। अपनी-अपनी समझ में हर व्यक्ति अप्नी चिंता व्यक्त कर रहा था।
"कौन सी स्टेज है?...."टाइम पर पता चल गया था न?" ...अभी फैला तो नहीं है?"...."मैलिग्नेंट है?" हर किसी का कोई न कोई करीबी रिश्तेदार कैंसर पीड़ित रहा है। मैं तो कुछ ऎसे परेशान हो रहा था जैसे पूनम से पहले किसी को कभी कैंसर हुआ ही नहीं था। मुफ्त की सलाह देने वाले बहुतायत से थे।
"मेहरा जी, हम आपको कहें, आप पूनम जी को रोजाना शहद दिया करें और सरसों के तेल की मालिश कराया करें। इंशा
अल्लाह सब ठीक हो जायेगा।...और हां चने जरूर दें खाने को" यह नज़्मा थी हमारी पड़ोसन। भूल गईं थी कि अस्पताल में कम बोलना एक अच्छी आदत समझी जाती है। जाते-जाते ताकीद करना नहीं भूलीं, "मेहरा जी, एक बात कहूं, हमारे पीर साहब से ताबीज बनवा लीजिये, पूनम जी बिल्कुल ठीक हो जायेंगी।"
चन्द्रभान की देवी, नज़्मा जी के पीर फकीर, सुशील और लुइज़ा का 'लिविंग गाड', और डा. पिन्टो की छाती पर बार-बार बनता क्रास, कार्सीनोमा, कटी हुई छाती, अस्पताल का कमरा सब मुझे परेशान किय जा रहे थे।
नवें दिन हम घर लौट आये थे। पूनम की आंखो के बेबस सवाल मेरी ओर ताके जा रहे थे, "वैसे यह भी कोई जीवन हैजी?
पराये मर्दों के सामने नंगा होना! पता नहीं कहां कहां हांथ लगते हैं। बेकार हो गई ज़िन्दगी तो!"
पूनम के दोनों हांथ स्वयंमेव ही मेरे हांथों में आ गये थे। आंखे तो मेरी भी नम हो आईं थीं। उसके माथे पर मेरे एक चुंबन ने ही शायद उसे खासी शक्ति प्रदान कर दी थी, "नरेन किसी से भी मेरी बीमारी या आपरेशन की बातें मत किया करो। लोग
अजीब सी निगाह से छाती को घूरते हैं।"
इतनी बड़ी बीमारी को छुपा जाना चाहती थी पूनम! यहां किसी को जुखाम या बुखार हो जाय तो पूरा शहर सर पर उठा लेते
हैं... और पूनम!..इस भयंकर बीमारी ने एक काम तो कर दिया था। मुझे पूनम के और करीब ला दिया था। मेरी सोंच , मेरे कर्मक्षेत्र, मेरे जीवन का केन्द्रबिन्दु पूनम होकर रह गई थी।
डा. पिन्टो से पहले तो तो दोस्तों और रिश्तेदारों ने डरा दिया था। -"आपरेशन के बाद रेडियेशन और कीमोथेरेपी भी करवानी पड़ती है। सारे बाल उड़ जाते हैं। उल्टियां कर-करके बुरा हाल हो जाता है" --"वैसे ब्रैस्ट कैंसर में तो 'यूट्रस और ओवरीज़' भी निकलवा देते हैं।...आपके डाक्टर ने सुझाया नही?..कमाल है!"
डा.पिन्टो अपने चिरपरिचित अंदाज में ही पेश आये, "गाड इज़ ग्रेट मि. मेहरा! ...आई वुड पुट इट दिस वे कि यूट्रस और
ओवरीज़ निकालने की कोई जरूरत नहीं। दर असल मैं तो कीमोथेरेपी भी नहीं करता, लेकिन सात नोड्ज़ में कैंसर फैल गया था, इसलिये कीमोथेरिपी देनी ही पड़ेगी नहीं तो हम टेमाक्सीफिन गोलियों से ही काम चला लेते।"
"टीमोक्सीफिन!"..मेरे मन में आशा की एक किरन जाग उठी। हो सकता है डा. पिन्टो यही दवा देने के लिये मान जायं।...शायद पूनम को कीमोथेरेपी की परेशानियों से बचाया जा सके-" डा. पिन्टो, टीमोक्सीफिन और कीमोथेरेपी में क्या फर्क है?"
"यू कैन पुट इट दिस वे कि कीमोथेरेपी की एक माइल्ड फार्म है टेमाक्सीफिन। यह एक हार्मोनल दवाई है। यह शरीर में जाकर फ़ीमेल हार्मोन होने का दिखावा करती है। कैंसर सैल इसकी तरफ अट्रैक्ट होते है और इसके कांटेक्ट में आकर मर जाते हैं। इस तरह वह कैंसर को आगे बढने से रोकती है।...पर नोड्ज़ में कैंसर पहुंचने पर कीमोथेरेपी जरूरी हो जाती है। अब सोंचना यह है कि एड्रियामायसिन दिया जाय या ज्यादा पापुलर सी.एम.एफ की मिली जुली कीमोथेरेपी। एड्रियामायसिन से जो बाल गायब हो जाते हैं वो वापस नहीं आते और कई बार यह दिल पर भी बुरा असर करती है। तो हम सी.एम.एफ़ ही देंगे।"
कीमोथेरेपी शुरु हो गई। इस बीच बोन स्कैन और अल्ट्रासाउन्ड और लिवर टेस्ट सब चल रहे थे। डाक्टर, दवाइयों और बीमारी के नाम से ही दहशत होने लगी थी- "डा. पिन्टो अब पूनम ठीक हो जायेगी न?..अब दोबारा होने का डर तो नहीं?" डा. पिन्टो की छाती पर फिर से क्रास बना, "मैं तो बस इलाज करता हूं मि. मेहरा, ठीक तो यह करते हैं! बस इनकी पूजा कीजिये।" फोटो में यीशू मसीह का चेहरा चमक रहा था।
पूजा से पूनम का विश्वास उठता जा रहा था, "मैंने तो कभी किसी का बुरा नहीं चाहा, किसी की पीठ पीछे तक बुराई नहीं की, शुद्व शाकाहारी जीवन जीती हूं..फिर यह बीमारी मुझे ही क्यों?"
पूनम का यह सवाल मेरे विश्वास को हिलाने के लिये काफी था। किंतु चन्द्रभान किसी और ही मिट्टी का बना था। वह मुझे
एक महिला के पास ले गया। महिला बैठी सिर हिला रही थी- "यह देवी मां हैं, नरेन! यह चाहें तो कुछ भी हो सकता है।"
यंत्रवत मेरे जैसा तार्किक व्यक्ति भी चरणों में झुक गया। "बहुत देरी कर दी तुमने आने में । फिर भी यह प्रसाद ले जाओ।
भगवान भला करेंगे।"
प्रसाद के अस्त्र से लैस मैं घर लौटा तो सुशील, लुइज़ा और अन्य महिलाओं के साथ पूनम के बिस्तर के चारों ओर बैठा पूजा
कर रहा था। "पूनम भाभी आपको अपने में विश्वास पैदा करना होगा...आप केवल ईसामसीह में विश्वास रखें और पूजा भी केवल उन्हीं की करें।"
"सुशील भैया, बचपन से विश्वास बने हुये हैं, क्या उनसे मुक्ति पाना इतना आसान है?"
"भाभी , यह तो आपको करना ही होगा, मैं तो कहता हूं अगले इतवार आप हमारी प्रार्थना सभा में आयें और देखें कि हम कैसे पूजा करते हैं।"
मैं बोल ही पड़ा, "भईये , हमारे घर से तो बान्द्रा काफी दूर है। पर यहां पास ही में जो चर्च है वहां ले जाऊंगा।
"नहीं नरेन! ..आना तो तुम्हें हमारे यहां ही पडेगा। तुम्हारे घर के पास जो चर्च है वो कैथोलिक चर्च है। जबकि हम लोग अपने आपको बार्न अगेन कहते हैं। हमारा भगवान जीवित भगवान है...लिविंग गाड। इसलिये तुम हमारे भगवान में ही विश्वास रखो और मैं तो यहां तक कहूंगा कि तुम लोग भी धर्म परिवर्तन करके हमारा धर्म अपना लो।..पूनम की बीमारी का इलाज केवल विश्वास ही है।
बहुत मुश्किन से मैं अपने आपको रोक पाया था। फिर भी मेरे चेहरे की भांगिमा देखकर सुशील अपने साथियों समेत किसी और के जीवन के लिये प्रार्थना करने निकल पड़ा।
शाम को पूनम के लिये सूप बनाया था। कल के कीमोथेरेपी के इंजेक्शन के विचार से त्रस्त, पूनम सूप को निगल नहीं पा रही थी। दरवाजे पर घंटी बजी। "लीजिये मेहराजी, हम तो पूनम के लिये तावीज बनवा लाये। आप देखियेगा माशा अल्लाह पूनम जी भली चंगी हो जायेंगी। वैसे आप इन्हें गर्म पानी के साथ शहद देते रहियेगा। आप देखियेगा अल्लाह क्या चमत्कार करते हैं।"
चमत्कार! इसकी आशा तो आपरेशन से पहले लगाये बैठा था। ,...पर कहां! विज्ञान ने चमत्कार की छाती काट दी और बीस नोड्ज़ निकाल दिये! कल फिर कीमोथेरेपी।
पूनम भी चमत्कार में कहां विश्वास करती है। उसे तो पुनर्जन्म में भी विश्वास नहीं। वह तो आज इस पल के बाद अगले पल के बारे में भी नहीं सोंचती। सोंचती है तो बस मेरे बारे में।....उसे यही गम खाये जाता है कि अपने पति का जीवन कैंसर से ग्रस्त करने की जिम्मेदार वही है।...
पूनम को यह भी अच्छी तरह मालूम है कि मैं तो भगवान के अस्तित्व के सामने सदा प्रश्न चिन्ह लगा देता हूं...।मेरे लिये कर्म के सिद्वान्त के अतिरिक्त जीवन का कोई अर्थ है ही नहीं।
पूनम देख रही है...अपने पति की स्थिति से पूरी तरह वाकिफ है वो। वो देख रही है कि कैसे उसका पति पूरी श्रद्वा से तावीज़ बांध रहा है..कैसे किसी सिर हिलाती देवी के सामने माथा टेककर पूनम के जीवन की भीख मांग रहा है। 'बार्न अगेन' ईसाईयों के सुर में सुर मिलाते देख रही है वह। बेबस, लाचार पड़ी लेटी है पलंग पर।
पूनम की आंखो में बस एक ही सवाल दिखाई दे रहा है..."मेरा पति कैंसर का इलाज तो दवा से करवाने की कोशिश कर सकता है...मगर जिस कैंसर ने उसे चारों ओर से जकड़ रखा है...क्या उस कैंसर का भी कोई इलाज है?"

--तेजेन्द्र शर्मा

2 comments:

RAJEEV KUMAR KULSHRESTHA said...

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DR. ANWER JAMAL said...

Nice post.
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