Thursday, February 4, 2010

काबुलीवाला - रवीन्द्र नाथ टैगोर

मेरी पांच बरस की लड़की मिनी से क्षण भर भी बिना बात किये रहा नहीं जाता। संसार में जन्म लेने के बाद भाषा सीखने में उसने एक साल ही लगाया था। उसके बाद से जब तक वह जागती रहती है, उस समय का एक भी क्षण वह खामोश रहकर नष्ट नहीं करती है। उसकी मां कभी कभी धमका कर उसका मुंह बंद कर देती हैं, पर मैं ऎसा नहीं कर पाता। मिनी अगर खामोश रहे तो, तो वह ऎसी अजीब सी लगती है कि मुझसे उसकी चुप्पी ज्यादा देर तक सही नहीं जाती। यही कारण यही है कि मुझसे उसकी बातचीत कुछ ज्यादा उत्साह से चलती है।
सबेरे मैं उपन्यास का सत्रहवां अध्याय लिखने जा ही रहा था कि मिनी ने आकर शुरु कर दिया, "बाबू, रामदयाल दरबान काका को कौवा कह रहा था। वह कुछ नहीं जानता, है न बाबा?"
संसार की भाषाओं की विभिन्नता के बारे में मैं उसे ज्ञान देने ही वाला था कि उसने दूसरा प्रसंग छेड़ दिया, "सुनो बाबू, भोला कह रहा था कि आसमान से हांथी सूंड़ से पानी बिखेरता है तभी बारिश होती है। ओ मां, भोला झूठ मूठ ही इतना बकता है! बस बकता ही रहता है, दिन रात बकता रहता है बाबू।"
इस बारे में मेरी राय का जरा भी इंतज़ार किये बिना ही वह अचानक पूंछ बैठी, "क्यों बाबू, अम्मा तुम्हारी कौन लगती है?"
मैंने मन ही मन कहा, "साली" और मुंह से कहा, "मिनी, तू जा, जाकर भोला के साथ खेल। मुझे अभी काम करना है। वह मेरी लिखने की मेज के पास मेरे पैरों के निकट बैठ गई और दोनों घुटने और हांथ हिला हिला कर, फुर्ती से मुंह चला-चलाकर रटने लगी, "आगड़ुम बागड़ुम घोड़ा दुम साजे।" उस समय मेरे उपन्यास के सत्रहवें अध्याय में प्रताप सिंह कंचन माला को लेकर अंधेरी रात में कारागार की ऊंची खिड़की से नीचे नदी के पानी में कूद रहे थे।
मेरा कमरा सड़क के किनारे था। यकायक मिनी अक्को बक्को तीन तिलक्को का खेल छोड़कर खिड़की के पास पहुंची और जोर जोर से पुकारने लगी, "काबुलीवाला, ओ काबुलीवाला!"
गन्दे से ढीले कपड़े पहने , सिर पर पगड़ी बांधे, कन्धे पर झोली लटकाये और हांथ में अंगूर की दो चार पिटारियां लिये, एक लम्बा सा काबुली धीमी चाल से सड़क पर जा रहा था। उसे देख मेरी बिटिया रानी के मन में कैसे भाव जगे होंगे यह बताना तो मुश्किल है, पर वह जोर जोर से उसे पुकार रही थी। मैंने सोंचा, अभी कन्धे पर झोली लटकाये एक आफत मेरे सिर पर सवार हो जायेगी और मेरा सत्रहवां अध्याय समाप्त होने से रह जायेगा।
लेकिन मिनी की पुकार पर जैसे ही काबुली ने हंस कर अपना चेहरा घुमाया और मेरे घर की ओर आने लगा, वैसे ही मिनी जान छुड़ाकर अन्दर भागी और लापता हो गई। उसके मन में एक अन्धविश्वास सा जम गया था कि झोली ढूंढने पर एकाध और मिन्नी जैसे जीवित इंसान मिल सकते हैं।
काबुली ने आकर हंसते हुये सलाम किया और खड़ा रहा। मैंने सोंचा, हालांकि प्रताप सिंह और कंचनमाला की दशा बड़े संकट में है, फिर भी इस आदमी को घर बुलाकर कुछ न खरीदना ठीक न होगा।
कुछ चीज़ें खरीदीं। उसके बाद इधर उधर की चर्चा भी होने लगी। अब्दुल रहमान से रूस, अंग्रेज और सीमान्त रक्षा नीति पर बातें होती रहीं।
अन्त में उठते समय उसने पूंछा, "बाबू जी, तुम्हारी लड़की कहां गई?"
मिनी के मन से बेकार का डर दूर करने के लिये मैंने उसे अंदर से बुलवा लिया। वह मुझसे सट कर खड़ी हो गई। सन्देह भरी दृष्टि से काबुली का चेहरा और उसकी झोली की ओर देखती रही। काबुली ने झोली से किशमिश और खुबानी देना चाहा, पर उसने किसी तरह से नहीं लिया। दुगने सन्देह के साथ वह मेरे घुटनों के साथ चिपकी रही। पहला परिचय इसी तरह हुआ।
कुछ दिनों बाद, एक सवेरे किसी जरूरत से घर से बाहर निकला तो देखा, मेरी बिटिया दरवाजे के पास बेंच पर बैठी बेहिचक बातें कर रही है। काबुली उसके पैरों के पास बैठा मुस्कुराता हुआ सुन रहा है, और बीच बीच में प्रसंग के अनुसार अपनी राय भी खिचड़ी भाषा में प्रदर्शित कर रहा है। मिनी के पांच साल की उम्र के अनुभव में बाबू के अलावा ऎसा धैर्य वाला श्रोता शायद ही कभी मिला होगा। फिर देखा उसका छोटा सा आंचल बादाम और किशमिश से भरा हुआ है। मैंने काबुली से कहा, "इसे यह सब क्यों दिया? ऎसा मत करना।" इतना कहकर जेब से एक अठन्नी निकालकर उसे दे दी। उसने बेझिझक अठन्नी लेकर झोली में डाल ली।
घर लौटकर देखा उस अठन्नी को लेकर बड़ा हो हल्ला शुरु हो चुका था।
मिनी की मां एक सफेद चमचमाता गोलाकार पदार्थ हांथ में लेकर मिनी से पूंछ रही थीं, "तुझे अठन्नी कहां से मिली?"
मिनी ने कहा, "काबुली वाले ने दी है।"
उसकी मां बोली, "काबुली वाले से तूने अठन्नी ली क्यों?"
मिनी रुआंसी सी होकर बोली, "मैंने मांगी नहीं, उसने खुद ही देदी।"
मैंने आकर मिनी को उस पास खड़ी विपत्ति से बचाया और बाहर ले आया।
पता चला कि काबुली के साथ मिनी की यह दूसरी ही मुलाकात हो ऎसी बात नहीं है। इस बीच वह रोज़ आता रहा और पिस्ता-बादाम की रिश्वत देकर मिनी के मासूम लोभी दिल पर काफी अधिकार जमा लिया।
इन दिनों मित्रों में कुछ बंधी बंधाई बातें और परिहास होता रहा। जैसे रहमान को देखते ही मेरी लड़की हंसती हुई उससे पूंछती, "काबुलीवाला! ओ काबुलीवाला! तुम्हारी झोली में क्या है?"
रहमान एक बेमतलब नकियाते हुये कहता, "हांथी।"
यानी उसकी झोली के भीतर हांथी है, यही उसके परिहास का सूक्ष्म सा अर्थ था। अर्थ बहुत ही सूक्ष्म हो, ऎसा तो नहीं कहा जा सकता, फिर भी इस परिहास में दोनों को बड़ा मजा आता। सर्दियों की भोर में एक सयाने और एक कम उम्र बच्ची की सरल हंसी मुझे भी बड़ी अच्छी लगती।
उन दोनों में एक बात और चल रही थी। रहमान मिनी से कहता, "खोखी, तुम ससुराल कभी मत जाना हां!"
बंगाली परिवार की लड़कियां बचपन से ही ससुराल शब्द से परिचित हो जाती हैं, लेकिन हम लोगों ने थोड़ा आधुनिक होने के कारण मासूम बच्ची को ससुराल के बारे में सचेत नहीं किया था। इसलिये रहमान की बातों का मतलब वह साफ साफ नहीं समझ पाती थी, लेकिन बात का कोई जवाब दिये बिना चुप रह जाना उसके स्वभाव के बिल्कुल विरुद्व था। वह पलटकर रहमान से पूंछ बैठती, "तुम ससुराल जाओगे?"
रहमान काल्पनिक ससुर के प्रति अपना बहुत बड़ा सा घूंसा तानकर कहता, "हम ससुर को मारेगा।"
यह सुनकर मिनी ससुर नाम के किसी अजनबी प्राणी की दुर्दशा की कल्पना कर खूब हंसती।

सर्दियों के उजले दिन थे। प्राचीन काल में इसी समय राजा लोग दिग्विजय करने निकलते थे। मैं कलकत्ता छोड़कर कहीं नहीं गया। शायद इसीलिये मेरा मन संसार-भर में घूमा करता है। जैसे मैं अपने घर के ही किसी कोने में बसा हुआ हूं। बाहर की दुनिया के लिये मेरा मन सदा बेचैन रहता है। किसी देश का नाम सुनते ही मन वहीं दौड़ पड़ता है। किसी विदेशी को देखते ही मेरा मन फौरन किसी नदी पहाड़ जंगल के बीच एक कुटिया का दृश्य देख रहा होता है। उल्लास से भरे एक स्वतन्त्र जीवन का एक चित्र कल्पना में जाग उठता है।
इधर मैं भी इतनी सुस्त प्रकृति यानी कुन्ना किस्म का हूं कि अपना कोना छोड़कर जरा बाहर निकलने पर ही सिर पर बिजली गिरने का सा अनुभव होने लगता है। इसलिये सवेरे अपने छोटे कमरे में मेज के सामने बैठकर काबुली से गप्पें लड़ाकर बहुत कुछ सैर सपाटे का उद्देष्य पूरा कर लिया करता हूं। दोनों ओर ऊबड़ खाबड़, दुर्गम जले हुये, लाल लाल ऊंचे पहाड़ों की माला, बीच में संकरे रेगिस्तानी रास्ते और उन पर सामान से लदे हुये ऊंटो का काफिला चल रहा है। पगड़ी बांधे सौदागर और मुसाफिरों में कोई ऊंट पर तो कोई पैदल चले जा रहे हैं, किसी के हांथ में बरछी है तो किसी के हांथ में पुराने जमाने की चकमक पत्थर से दागी जाने वाली बंदूक। काबुली अपने मेघ गर्जन के स्वर में , खिचड़ी भाषा में अपने वतन के बारे में सुनाता रहता और वह चित्र मेरी आखों के सामने काफिलों के समान गुजरता चला जाता।
मिनी की मां बड़े ही शंकालु स्वभाव की है। रास्ते पर कोई आहट होते ही उसे लगता कि दुनिया भर के शराबी मतवाले होकर हमारे घर की ओर ही चले आ रहे हैं। यह दुनिया हर कहीं चोर डाकू, शराबी, सांप, बाघ, मलेरिया, सुअरों, तिलचट्टों और गोरों से भरी हुई है, यही उसका ख्याल है। इतने दिनों से (हालांकि बहुत ज्यादा दिन नहीं ) दुनिया में रहने के बावजूद उसके मन से यह भय दूर नहीं हुआ। खासतौर से रहमान काबुली के बारे में वह पूरी तरह निश्चिंत नहीं थी। उस पर खास नज़र रखने के लिये वह मुझसे बार बार अनुरोध करती थी। मैं उसके सन्देह को हंसकर उड़ा देने की कोशिश करता, तो वह मुझसे एक एक करके कई सवाल पूंछ बैठती, "क्या कभी किसी का लड़का चुराया नहीं गया? क्या काबुल में गुलामी प्रथा लागू नहीं है? एक लम्बे चौडे काबुली के लिये एक छोटे से बच्चे को चुरा कर ले जाना क्या बिल्कुल असंभव है?"
मुझे मानना पड़ा कि यह बात बिल्कुल असंभव तो नहीं, पर विश्वास योग्य भी नहीं है। विश्वास करने की शक्ति हरेक में समान नहीं होती, इसलिये मेरी पत्नी के मन में डर बना रह गया। लेकिन सिर्फ इसलिये बिना किसी दोष के रहमान को अपने घर में आने से मैं मना नहीं कर सका।
हर साल माघ के महीनों में रहमान अपने मुल्क चला जाता है। इस समय वह अपने रुपयों की वसूली में बुरी तरह फंसा रहता है। घर-घर दौड़ना पड़ता है, फिर भी वह एक बार आकर मिनी से मिल ही जाता है। देखने में लगता है जैसे दोनों में कोई साजिश चल रही हो। जिस दिन सवेरे नहीं आ पाता उस दिन देखता हूं शाम को आया है। अंधेरे कमरे के कोने में उस ढीला ढाला कुर्ता पायजामा पहने झोली झिंगोली वाले लम्बे तगड़े आदमी को देखकर सचमुच मन में एक आशंका सी होने लगती है। लेकिन जब देखता हूं कि मिनी 'काबुलीवाला काबुलीवाला' कहकर हंसते-हंसते दौड़ आती और अलग-अलग उम्र के दो मित्रों में पुराना सहज परिहास चलने लगता है, तो मेरा हृदय खुशी से भर उठता।
एक दिन सवेरे में अपने छोटे से कमरे में बैठा अपनी किताब के प्रूफ देख रहा था। सर्दियों के दिन खत्म होने से पहले , आज दो तीन दिन से कड़ाके की ठंड पड़ रही थी। चारों ओर सबके दांत किटकिटा रहे थे। खिड़कियों के रास्ते धूप आकर मेज के नीचे मेरे पैरों पर पड़ रही थी। यह सेंक मुझे बड़ी सुहावनी लग रही थी। सुबह के करीब आठ बजे होंगे। गुलूबंद लपेटे सवेरे सैर को निकलने वाले लोग अपनी सैर समाप्त कर घर लौट रहे थे। इसी समय सड़क पर बड़ा शोर गुल सुनाई पड़ा।
देखा, हमारे रहमान को दो सिपाही बांधे चले आ रहे हैं और उसके पीछे-पीछे तमाशबीन लड़कों का झुन्ड चला अ रहा है। रहमान के कपड़ों पर खून के दाग हैं और एक सिपाही के हांथ में खून से सना हुआ छुरा है। मैंने दरवाजे से बाहर जाकर सिपाहियों से पूंछा कि मामला क्या है।
कुछ उस सिपाही से कुछ रहमान से सुना कि हमारे पड़ोस में एक आदमी ने रहमान से उधार में एक रामपुरी चादर खरीदी थी। कुछ रुपये अब भी उस पर बाकी थे, जिन्हें देने से वह मुकर गया था। इसी पर बहस होते-होते रहमान ने उसे छुरा भौंक दिया।
रहमान उस झूठे आदमी के प्रति तरह-तरह की गन्दी गालियां बक रहा था कि इतने में 'काबुलीवाला, ओ काबुलीवाला' कहती हुई मिनी घर से निकल आई।
क्षण भर में रहमान का चेहरा उजली हंसी से खिल उठा। उसके कन्धे पर आज झोली नहीं थी, इसलिये झोली के बारे में दोनों मित्रों की पुरानी चर्चा न छिड़ सकी। मिनी आते ही एकाएक उससे पूंछ बैठी, "तुम ससुराल जाओगे?"
रहमान ने हंस कर कहा, "वहीं तो जा रहा हूं।"
उसे लगा उसके जवाब से मिनी मुस्कुराई नहीं। तब उसने हांथ दिखाते हुये कहा, "ससुर को मारता, पर क्या करूं हांथ बंधे हुये हैं।"
संगीन चोट पहुंचाने के जुर्म में रहमान को कई सालों की कैद की सजा हो गई। कभी उसके बारे में मैं धीरे-धीरे भूल ही गया। हम लोग जब अपने-अपने घरों में प्रतिदिन के कामों में लगे हुये आराम से दिन गुजार रहे थे, तब पहाड़ों पर आजाद घूमने वाला आदमी कैसे साल पर साल जेल की दीवारों के बीच गुजार रहा होगा, यह बात कभी हमारे मन में नहीं आई।
चंचल हृदय मिनी का व्यवहार तो और भी शर्मनाक था, यह बात उसके बाप को भी माननी पड़ेगी। उसने बड़े ही बेलौस ढंग से अपने पुराने मित्र को भुलाकर पहले तो नबी सईस से दोस्ती कर ली, फिर धीरे-धीरे जैसे उसकी उम्र बढने लगी, वैसे-वैसे दोस्तों के बदले एक के बाद एक सहेलियां जुटने लगीं। यहां तक कि वह अब अपने बाबू के लिखने के कमरे में भी दिखाई नहीं देती। मैंने भी एक तरह से उसके साथ कुट्टी कर ली है।
कितने ही वर्ष बीत गये। फिर सर्दियां आ गईं। मेरी मिनी की शादी तय हो गई। दुर्गा पूजा की छुट्टी में ही उसका ब्याह हो जायेगा। कैलाशवासिनी पार्वती के साथ-साथ मेरे घर की आनन्द मयी भी पिता का घर अंधेरा कर पति के घर चली जायेगी।
बड़े ही सुहावने ढंग से आज सूर्योदय हुआ है। बरसात के बाद सर्दियों की नई धुली हुई धूप ने जैसे सुहागे में गलाये हुये साफ और खरे सोने का रंग अपना लिया है। कलकत्ता के गलियारों में आपस में सटी-टूटी ईंटोवाली गन्दी इमारतों पर भी इस धूप की चमक ने एक अनोखी सुन्दरता बिखेर दी है।
हमारे घर पर सवेरा होने से पहले ही शहनाई बज रही है। मुझे लग रहा है, जैसे वह शहनाई मेरे सीने में पसलियों के भीतर रोती हुई बज रही है। उसका करुण भैरवी राग जैसे मेरे सामने खड़ी विछोह की पीड़ा को जाड़े की धूप के साथ दुनिया भर में फैलाये दे रहा हो। आज मेरी मिनी का ब्याह है।
सवेरे से ही बड़ा शोरशराबा और लोगों का आना-जाना शुरु हो गया। आंगन में बांस बांधकर शामियाना लगाया जा रहा है,मकान के कमरों और बरामदों पर झाड़ लटकाये जाने की टन-टन सुनाई पड़ रही है। गुहार - पुकार का कोई अंत ही नहीं।
मैं अपने पढने-लिखने वाले कमरे में बैठा खर्च का हिसाब-किताब लिख रहा था कि रहमान आकर सलाम करते हुये खड़ा हो गया।
शुरु में मैं उसे पहचान न सका। उसके पास वह झोली नहीं थी और न चेहरे पर चमक थी। अन्त में उसकी मुस्कुराहट देख कर उसे पहचान गया।
"क्यों रहमान, कब आये?" मैंने पूंछा।
उसने कहा, "कल शाम ही जेल से छूटा हूं।"
यह बात मेरे कानों में जैसे जोर से टकराई। किसी कातिल को मैंने अपनी आंखो से नहीं देखा था। इसे देखकर मेरा अंतःकरण विचलित सा हो गया। मेरी इच्छा होने लगी कि आज इस शुभ दिन पर यह अदमी यहां से चला जाय, तो अच्छा हो।
मैंने उससे कहा, "आज हमारे घर एक जरूरी काम है। मैं उसी में लगा हुआ हूं, आज तुम जाओ।"
सुनते ही वह जाने को तैयार हुआ, लेकिन फिर दरवाजे के पास जा खड़ा हुआ और कुछ संकोच से भर कर बोला, "एक बार खोकी को नहीं देख सकता क्या?"
शायद उसके मन में यही धारणा थी कि मिनी अभी तक वैसी ही बनी हुई है। या उसने सोंचा था कि मिनी आज भी वैसे ही पहले की तरह 'काबुलीवाला, ओ काबुलीवाला' पुकारती हुई भागती हुई आ जायेगी और उसकी हंसी भरी अद्भुत बातों में किसी तरह का कोई फर्क नहीं आयेगा। यहां तक की पहले की मित्रता की याद कर वह एक पिटारी अंगूर और एक कागज के दोने में थोड़ा किशमिश-बादाम शायद किसी अपने वतनी दोस्त से मांग-मूंग कर ले आया था। उसकी पहले वाली झोली उसके पास नहीं थी।
मैंने कहा, "आज घर पर काम है। आज किसी से मुलाकात न हो सकेगी।"
वह कुछ उदास सा हो गया। स्तब्ध खड़ा मेरी ओर एकटक देखता रहा, फिर सलाम बाबू कहकर दरवाजे से बाहर निकल गया।
मेरे हृदय में एक टीस सी उठी। सोंच रहा था कि उसे बुला लूं कि देखा वह खुद ही चला आ रहा है।
नजदीक आकर उसने कहा, " ये अंगूर किशमिश और बादाम खोखी के लिये लाया हूं, उसको दे दीजियेगा।"
सब लेकर मैंने दाम देना चाहा, तो उसने एकाएक मेरा हांथ पकड़ लिया, कहा, "आपकी मेहरबानी है बाबू, हमेशा याद रहेगी। मुझे पैसा न दें...। बाबू, जैसी तुम्हारी लड़की है, वैसी मेरी भी एक लड़की है वतन में। मैं उसकी याद कर तुम्हारी खोखी के लिये थोड़ा सा मेवा हांथ में लेकर चला आता था। मैं यहां कोई सौदा बेचने नहीं आता।"
इतना कहकर उसने अपने ढीले ढाले कुर्ते के अन्दर हांथ डालकर एक मैला सा कागज निकाला और बड़े जतन से उसकी तहें खोलकर दोनों हांथ से उसे मेज पर फैला दिया।
मैंने देखा, कागज पर एक नन्हें से हांथ के पंजे की छाप है। फोटो नहीं , तैल चित्र नहीं, सिर्फ हथेली में थोड़ी सी कालिख लगाकर उसी का निशान ले लिया गया है। बेटी की इस नन्ही सी याद को छाती से लगाये रहमान हर साल कलकत्ता की गलियों में मेवा बेचने आता था, जैसे उस नाजुक नन्हें हांथ का स्पर्श उसके विछोह से भरे चौड़े सीने में अमृत घोले रहता था।
देखकर मेरी आंखे भर आईं। फिर मैं यह भूल गया कि वह एक काबुली मेवे वाला है और मैं किसी ऊंचे घराने का बंगाली। तब मैं यह अनुभव करने लगा कि जो वह है, वही मैं भी हूं। वह भी बाप है और मैं भी। उसकी पर्वतवासिनी नन्ही पार्वती के हांथों की निशानी ने ही मेरी मिनी की याद दिला दी। मैंने उसी वक्त मिनी को बाहर बुलवाया। घर में इस पर बड़ी आपत्ति की गई, पर मैंने एक न सुनी। ब्याह की लाल बनारसी साड़ी पहने, माथे पर चन्दन की अल्पना सजाये दुल्हन बनी मिनी लाज से भरी मेरे पास आकर खड़ी हो गई।
उसे देखकर काबुली पहले तो सकपका सा गया, अपनी पुरानी बातें दोहरा न सका। अंत में हंसकर बोला, "खोखी तुम ससुराल जाओगी?"
मिनी अब ससुराल शब्द का मतलब समझती है। उससे पहले की तरह जवाब देते न बना। रहमान का सवाल सुन शर्म से लाल हो, मुंह फेरकर खड़ी हो गई। काबुली से मिनी की पहले दिन की मुलाकात मुझे याद हो आई। मन न जाने कैसा व्यथिथ हो उठा।
मिनी के चले जाने के बाद एक लंबी सांस लेकर रहमान वहीं जमीन पर बैठ गया। अचानक उसके मन में एक बात साफ हो गई कि उसकी लड़की भी इस बीच इतनी ही बड़ी हो गई होगी और उसके साथ भी उसे नये ढंग से बात चीत करनी पड़ेगी। वह उसे फिर से पहले वाले रूप में नहीं पायेगा। इस आठ वर्षों में न जाने उसका क्या हुआ होगा। सवेरे के वक्त सर्दियों की उजली कोमल धूप में शहनाई बजने लगी और कलकत्ता की एक गली में बैठा हुआ रहमान अफगानिस्तान के मेरु पर्वतों का दृष्य देखने लगा।
मैंने उसे एक बड़ा नोट निकालकर दिया, कहा, "तुम अपने वतन अपनी बेटी के पास चले जाओ। तुम दोनों के मिलन-सुख से मेरी मिनी का कल्याण होगा।"
यह रुपया दान करने के बाद मुझे विवाहोत्सव की दो-चार चीज़ें कम कर देनी पड़ीं। मन में जैसी इच्छा थी उस तरह रोशनी नहीं कर सका। किले का अंग्रेजी बैंड भी नहीं मंगा पाया। घर में औरतें बड़ा असन्तोष प्रकट करने लगीं, लेकिन मंगल ज्योति में मेरा यह शुभ-आयोजन दमक उठा।

Wednesday, January 20, 2010

ज्योतिर्मयी - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला'

एक
"मानती रहें, चूंकि आप ही लोगों ने, आप ही के बनाये शस्त्रों ने, जो हमारे प्रतिकूल हैं, हमें जबरन गुलाम बना रखा है; कोई चारा भी तो नहीं है-कैसी बात है।" कमल की पंखुङियों सी उज्ज्वल बङी-बङी आंखों से देखती हुई, एक सत्रह साल की, रूप की चन्द्रिका, भरी हुई युवती ने कहा।
"नहीं, पतिव्रता पत्नी तमाम जीवन तपस्या करने के पश्चात परलोक में अपने पति से मिलती है।" सहज स्वर में कहकर युवक निरीक्षक की दॄष्टि से युवती को देखने लगा।
युवती मुस्कुराई-तमाम चेहरे पर सुर्खी दौङ गयी। सुकुमार गुलाब के दलों से लाल-लाल होंठ जरा बढे, मर्मरोज्ज्वल मुख पर प्रसन्न-कौतुक-पूर्ण एक्ज्योतिश्चक्र खोलकर यथास्थान आ गये।
"वाक्ये का दरिद्रता!" युवती मुस्कुराती हुई बोली, "अच्छा बतलाइये तो, यदि पहले ब्याही स्त्री इसी तरह स्वर्ग अपने पूज्यपाद पति-देवता की प्रतीक्षा करती हो, और पतिदेव क्रमशः दूसरी, तीसरी, चौथी पत्नियों को बार-बार प्रतीक्षार्थ स्वर्ग भेजते रहें, तो खुद मरकर किसके पास पहुंचेंगे?
युवती खिलखिला दी।
युवक का चेहरा उतर गया।
"आपने इस साल एम.ए. पास किया किया है, और अंग्रेजी में। यहां पतिव्रता स्त्रियों की पत्नीव्रत पुरुषों से ज्यादा जीवनियां आपने याद कीं!" युवती ने वार किया।
युवक बङे भाई की ससुराल गया था। युवती उसी की विधवा छोटी भाभी है।
"आपने कहां तक पढा है?" युवक ने जानना चाहा।
"सिर्फ हिन्दी और थोङी सी संस्कृत जानती हूं।" डब्बे को नजदीक लेकर युवती पान चबाने लगी।
"मैं इतना ही कहता हूं, आपके विचार समाज के के तिनके के लिये आग हैं।"ताज्जुब की निगाह देखते हुये युवक ने कहा।
"लेकिन मेरे हृदय के मोम के पुतले को गलाकर बहा देने, मुझसे जुदा कर देने के लिये समाज आग है, साथ-साथ यह भी कहिये।" उंगली चूनेदानी में, बङी-बङी आंखो की तेज निगाह युवक की तरफ फेरकर युवती ने कहा, "मैं बारह साल की थी, ससुराल नहीं गयी, जानती भी नहीं, पति कैसे थे, और विधवा हो गयी।" कई बूंद आंसू कपोलों से बहकर युवती की जांघ पर गिरे। आंचल से आंखे पोंछ लीं , फिर पान बनाने लगी।
"तम्बाकू खाते हैं आप?" युवती ने पूंछा।
"नहीं।" युवक के दिल में सन्नाटा था। इतनी बङी, इतने आश्चर्य की, इतनी खतरनाक बात आज तक किसी विधवा युवती की ज़बान से उसने नहीं सुनी। वह जानता था, यह सब अखबारों का आन्दोलन था। इस तरह की कल्पना भी उसने कभी नहीं की थी। कारण, वह कान्यकुब्जों के एक श्रेष्ठ्र कुल में पैदा हुआ था। युवती की बातों से घबरा गया।
"लीजिये" युवती ने कई बीङे उसकी ओर बढा दिये।
"आप बुरा मत मानियेगा, मैं आपको देख रही थी कि आप कितने दर्दमंद हैं।" युवती ने साधारण आवाज में कहा।
युवक ने पान ले लिये, पर लिये ही बैठा रहा। खाइये" युवती ने कहा, "आप से एक बात पूंछूं?"
"पूंछिये।"
"अगर आपसे कोई विधवा-विवाह करने के लिये कहे?" युवती मुस्कुराई।
"मैं नहीं जानता, यह तो पिताजी के हांथ की बात है।" युवक झेंप गया।
"अगर पिताजी की जगह आप ही अपने मुक्ताराम होते?"संकुचित होकर, फिर हिम्मत बांध कर युवक ने कहा, "मुझे विधवा-विवाह करए हुये लाज लगती है।"
युवती मनोभावों को दबाकर, छलछलाई आंखों चुप रही। एक बार उसी तरह युवक को देखा, फिर मस्तक झुका लिया।
दूसरे दिन युवक घर चलने लगा। मकान की जेठी स्त्रियों के पैर छुये। इधर-उधर आंखे युवती की तलाश करती रहीं। वह न मिली। युवक दोमंजिले से नीचे उतरा। देखा दरवाजे के पास खङी उसी की राह देख रही है। युवक ने कहा, "आज्ञा दीजिये अब जा रहा हूं।" हांथ जोङकर युवती ने प्रणाम किया। एक पत्र युवक को देकर कहा, "बन्द दर्शन दीजियेगा।" युवक के हृदय में एक अज्ञात प्रसन्नता की लहर उठी। उसने देखा, नील पंखो पलकोम के पंखो से युवती की आंखे अप्सराओं सी आकाश की ओर उङ जाना चाहती हैं, जहांस्नेह के कल्प-वसंत में मदन और रति नित्य मिले हैं, जहां किसी भी प्रकार की निष्ठुर श्रखंला नवोन्मेष को झुका नही सकती जहां प्रेम ही आंखों में मनोहर चित्र, कंठ में मधुर संगीत, हृदय मॆं सत्यनिष्ठ भावना और रूप में खूबसूरत आग है।
युवक ने स्नेह के मधुर कंठ से, सहानुभुति की ध्वनि में, कहा, "ज्योती।"
युवती निःसंकोच कुछ कदम आगे बढ गई। युवक के बिल्कुल नज़दीक, एक तरह से सटकर, खङी हो गई। फिर युवक की ठोङी के पास, आंखे आंखो में मिली हुई। वस्त्र के स्पर्श से शिराओं में एक ऎसी तरंग बह चली जिसका अनुभव आज तक उनमें किसी को नहीं हुआ था। अंगों में आनन्द के परमाणु निकलते रहे। आंखों में नशा छा गया।
"फिर कहूंगा।"युवक सजा कर चल दिया। "याद रखियेगा-आपसे इतनी ही कर-बद्व प्रर्थना ....." युवक दृष्टि से ओझल हो गया।

दो
"दिल के तुम इतने कमजोर हो? नष्ट होते हुये एक समाज-क्लिष्ट जीवन का उद्वार तुम नहीं कर सकते विजय? तुम्हारी शिक्षा क्या तुम्हे पुरानी राह का सीधा-साधा एक लट्टू का बैल करने के लिये हुयी है?" वीरेन्द्र ने चिन्त्य भर्त्सना के शब्दों में कहा।
"पिताजी से कुछ बस नहीं वीरेन, उनके प्रतिकूल कोई आचरण मैं न कर सकूंगा। पर आजीवन-आजीवन मैं सोचूंगा कि दुर्बल समाज की सरिता में एक बहते हुये निष्पाप पुष्प का मैं उद्वार नहीं कर सका, खास तौर से इसलिये कि मुझे उसने तैरना नहीं सिखलाया।"
"तुम्हे एक दूसरी सामाजिक शिक्षा से तैरना मालूम हो चुका है।"
"हां, होचुका है, पर केवल तैरते रहना, फिर किनारे पर लगना नहीं; सब घाट हमारे समाज द्वारा अधिकृत हैं, और केवल तैरते रहना मनुष्य के लिये असम्भव है।"
तुम फूल पर आ सकते हो।"
"पर उस फूल को लेकर नहीं, जब समाज के किसी भी घाट पर नहीं जा सकता, और केवल कूल इतना बीहङ है कि थके हुये मेरे पैर वहां जम नहीं सकते, वहां दृष्टियों का ताप इतना प्रखर है कि फूळ मुरझा जायेगा, मैं भी झुलस जाऊंगा।"
तो सारांश यह है कि तुम उस पावन मूर्ति अबला का, जिसने तुम्हे बढकर प्यार किया-मित्र समझकर गुप्त हृदय की व्यथा प्रकट कर दी, उस देवी का समाज के पंक से उद्वार नहीम कर सकते?"
"देखो मेरा हृदय अवश्य उसने छीन लिया है, पर शरीर पिताजी का है, मैं यहां दुर्बल हूं।"
"कैसी वाहियात बात। कितनी बङी आत्मप्रवंचना है यह। विजय, हृदय शरीर से अलग भी है? जिसने तुम पर क्षण मात्र में विजय प्राप्त कर ली, उसने तुम्हारे शरीर को भी जीत लिया है, अब उसका तिरस्कार परोक्ष अपना ही है। समाज का ध्र्म तो उसके लिये भी था-क्या फूटॆ हुये बर्तन की तरह वह भी समाज में एक तरफ निकालकर न र्ख दी जाती? क्या उसने यह सब नहीं सोंच लिया।"
"उसमें और-और तरह की भावनायें भी होंगी।"
"और-और तरह की भावनयें उसमें होंती, तो वह तुम्हारे भाई की ससुराल वालों के समर्थ मुखों पर अच्छी तरह सयाही पोत कर अब तक कहीं चली गई होती, समझॆ? वह समझदार है। और, तुम्हारे सामने जो इतना खुली है, इसका कारण काम नहीं, यथार्त ही तुम्हे उसने प्यार किया है। अच्छा उसका पता तो बताओ।"
वीरेन्द्र ने नोटबुक निकालकर पता लिख दिया। फिर विजय से कहा, "तुम मेरे मित्र हो वह मेरे मित्र की प्रेयसी है।"
दोनों एक दूसरे को देखकर हंसने लगे।

तीन
इस घटना को कई महीने बईत चुके। अब भाई की ससुराल जने की कल्पना मात्र से विजय का कलेजा कांप उठता, संकोच की सरदी तमाम अंगो को जकङ लेती, संकल्प से उसे निरस्त्र हो जाना पङता है। उसकी यह हालत देख-देख कर वीरेन्द्र मन ही मन पाश्चाताप करता, पर तब से फिर किसी प्रकार की इच्छा का दवाब उसने उस पर नहीं डाला। विजय इलाहबाद यूनीवर्सिटी मेम रिसर्च-स्कालर है। वीरेन्द्र बी.ए. पास कर लेने पश्चात वहीं अपना कारोबार देखने में रहता है। वह इटावे के प्रसिद्व रईस नागर्मल-भीखमदास फ़र्म के मालिक मंसाराम अग्रवाल का इकलौता लङका है।
महीने के लगभग हुआ, वीरेन्द्र इटावे चला गया है। चलते समय विजय से विदा होकर गया था।
इधर भी, ती-चार दिन हुए, घर से पत्र द्वारा विजय को बुलावा आया है। जिला उन्नाव, मौजा बीघापुर विजय की जन्म्भूमि है।
उसके पिता अच्छी साधारण स्थिति के मनुष्य हैं, मांझगांव के मिश्र, कुलीन कान्यकुब्ज। विवाह अधिक दहेज के लोभ से उन्होंने रोक रखा है। अब तक जितने सम्बन्ध आए थे, तीन हजार से अधिक कोई नहीं दे रहा था। अब के एक सम्बन्ध आया हुआ है, उसकी तरफ विजय के पिता का विशेष झुकाव है। ये लोग मुरादाबाद के बाशिंदे हैं। पन्द्रह दिन पहले ही विजय की जन्मपत्रिका ले कर गये थे। विवाह बनता है, इसलिये दोबारा पक्का कर लेने को कन्या-पक्ष से कोई आया हुआ है। विजय के पिता और चाचा मकान के भीतर आपस में सलाह कर रहे हैं।
"दादा, लेकिन एक पै तो है, ये साधारण ब्राह्मण हैं, ऎसा फिर न हो कि कहीं के भी न रहें।"
"तुम भी; मारो गोली; हमको रुपये से मतलब है; हमारे पास रुपया है तो भाई-बंद, जात-बिरादरी वाले सब साले आवेंगे; नहीम तो कोई लोटे भर पानी को नहीं पूंछेगा।"
"तो क्या राय है?"
"विवाह करो और क्या?"
"सात हजार से आगे नहीं बढता।"
"घर घेरे बैठा है, देखते नहीं? धीरे-धीरे दुहो; लेकिन शिकार निकल न जाय।"
"अब फंसा है तो क्या निकलेगा।"
"डर कौन-बारात में घर के चार जने चले जायेंगे। कहेंगे दू है, खर्चा नहीं मिला।"
"वही खर्चा यहां करके खिला दिया जाय-है न?"
ठीक है।"
"बस, यही ठीक है।"
विजय के पिता पं.गंगाधर मिश्र और चचा पं.कृष्णशंकर रक्तचंदन का टीका लगाये, रुद्राक्ष की माला पहने, खङाऊं खट्खटाते हुये दरवाजे चौपाल में, नेवाङ के पलंग पर, धीर-गंभीर मुद्रा मॆं, सिर झुकाये हुये, आकर बैठ गये। एक मूंज की चारपाई पर कन्या-पक्ष के पं. सत्यनरायण शर्मा मिजंई पहने, पगङी बांधे बैठे हुये थे। मिश्र जी को देखकर पूंछा, "तो क्या आज्ञा देते हैं मिश्र जी?"
पं. गंगाधर ने पं कृष्णशंकर की ओर इशारा करके कहा, "बात-चीत इनसे पक्की कीजिये। मकान-मालिक तो यह हैं।"
पं. सत्यनारायणजी ने पं. कृष्णशंकर कीओर देखा।
"बात यह है पण्डित जी कि दहेज बहुत कम मिल रहा है। आप सोंचे कि अब तक सात आठ हजार रुपया तो लङके की पढाई मॆं ही लग चुका है। लखनऊ के बाजपेयी आये थे, हमारा उनका सम्बन्ध भी है, छः हजार देते थे, पर हमने इन्कार कर दिया। अब हमको खर्च भी पूरा न मिला, तो लङके को पढाकर हमने क्या फायदा उठाया? इस संबन्ध में (इधर-उधर झांककर) हमें कुछ मिला भी नहीं, तो इतना गिरकर...।"
"अच्छा तो कहिये, क्या चाहते हैं आप।"
"पन्द्रह हजार।"
"तब तो हमारे यहां बरतन भी साबित नहीं रहेंगे।"
"अच्छा तो आप कहिये।"
"नौ हजार ले लीजिये।"
"अच्छा, बारह हजार में पक्का।"
पं. सत्यनारायण अपनी अघारी सम्भालने लगे।
"ग्यारह हजार देते हैं आप?" पं. कृष्णशंकर ने उभङ कर पूंछा।
"दस हजार सही, बताइये।"
"अच्छा पक्का; मगर पांच हजार पेशगी।"
पं. सत्यनारायण ने कागज़, स्टांप हजार-हजार के पांच नोट निकालकर कहा, "लीजिये आप दोनो इसमॆएं दस्तखत कीजिये। पहले लिखिये, पं. सत्यनाराय्ण, मुरादाबाद, की कन्या से श्रीयुत विजय कुमार मिश्र एम.ए. के विवाह संबध में, जो दस हजार में मय गवही और गौने के खर्च के पक्का हुआ है, कन्या के पिता से पांच हजार पेशगी नकद वसूल पाया, फिर स्टाम्प पर वल्दियत के साथ दस्तखत कीजिये।"
पंडित गंगाधर गदगद हो गये। लिखा-पढी हो गयी। विवाह का दिन स्थिर हो गया।
तिलक चढ गया। तिलक के पहले समय तक विजय को ज्योतिर्मयी की याद आती रही। पर नवीन विवाह के प्रसंग से मन बंट गया। फिर धीरे-धीरे, जैसा हुआ करता है, वह स्मृति भी चित्त के अतल स्पर्श को चली गयी। अब विजय को उसके चरित्र पर रह-रहकर शंका होने लगी है। सोंचता है, बुरा फंस गया था, बच गया। सच कहा है-'स्त्रीचरित्रं पुरुषस्य भाग्यं दैवो न जानाति कुतो मनुष्यः?'
अब नई कल्पनायें उसके मस्तिष्क पर उठने लगी हैं। एक अज्ञात, अपरिचित मुख को जैसे केवल कल्पना के बल से प्रत्यक्ष कर लेना चाहता है, और इस चेष्टा में सुख भी कितना। इतना कभी नहीं उसे मिला। इस अज्ञात रहस्य में ज्योतिर्मयी की अम्लान छवि एक प्रकार भूल ही गया।

चार
विजय ने विवाह के उत्सव में मिलने के लिये वीरेन्द्र को लिखा था, पर उसने उत्तर दिया, "मैं तो विजय का ही मित्र हूं, किसी पराजय का नहीं; इस विवाह में मैं शरीक न हो सकूंगा।"
जैसा पहले से निश्चय था, जल्दबाजी का बहाना कर पं. गंगाधर ने जाने-जाने रिश्तेदारों को छोङकर किसी को न बुलाया। इसी कारण ज्योतिर्मयी के यहां निमन्त्रण नहीं पहुंच सका। इधर भी जहां कहीम न्यौता गया, वहां से कुछ लोग ही आये। कारण संदेह की हवा बह चुकी थी।
बारात चली। लखनऊ में विजय की वीरेन्द्र मुलाकात हुयी। वीरेन्द्र ने पूंछा, "यार तुम तो ज्योतिर्मयी को भूल ही गये, इतने गल गये इस विवाह में!"
"बात यह है कि इस तरह की स्त्रियां समाज के काम की नहीं होतीं।"
"अरे! तुमने तो स्वर भी बदल लिया।"
"क्या किया जाय?"
"और जहां विवाह करने जा रहे हो, यही बङी सती-सावित्री निकलेगी, इसका क्या प्रमाण मिला है?"
"क्वारी और विधवा में फ़र्क है भाई"
यह मानता हूं।"
"कुछ संस्कृति का भी खयाल रखना चाहिये। संस्कृति से ही संतति अच्छी होती है।"
अरे तुम तो पूरे पं. हो गये!"
"अपने कुल का सबको ख्याल रहता है-केतहु काल कराल परै, पै मराल न ताकहिं तुच्छ तलैया।"
"अच्छा!"
"जी हां।"
"तब तो, जी चाहता है, तुम्हारे साथ मैं भी चलूं।"
"चलो, मैंने तो तुम्हे लिखा भी था, पर तुम दुनिया की वास्तविकता का विचार तो करते नहीं, विचारों की दीवारें उठाया-गिराया करते हो।"
"अच्छा भई, अब वास्तविकता का आनन्द भी ले लें। कहो कितने गिनाये?।
"दस हजार।"
"दस हजार! उसके मकान में लोटा त ओसाबुत छोङा न होगा?"
"कान्यकुब्ज-कुलीन हैं?"
"वे कोई मामूली कान्यकुब्ज होंगे?"
"बहुत मामूली नहीं, १७ बिसवे मर्यादावाले हैं।"
"हूं" वीरेन्द्र सोंचने लगा। "तुमसे घृणा हो गई है। जाओ अब नही ं जाऊंगा। तुम इतने नीच हो।"
वीरेन्द्र षर की ओर चला गया। बारात मुरादाबाद चली।
वर कन्या के लिये पं. सत्यनारायण जी ने एक सेकेण्ड क्लास कम्पार्टमेन्ट पहले से रिजर्व करा रखा था, और लोगों के लिये इण्टर क्लास अलग से।
पं. सत्यनारायण हांथ जोङकर पं.गंगाधर और कृष्णशंकर आदि से विदा हुये। कन्या से कहा, "बेटी, वहां पहुंचकर अपने समाचार जल्द देना।" गाङी छूट गई।
प्रणय से विजय का चित्त चपल हो उठा। अब तक जिस अदेश मुख पर असंख्य कल्पनायें की हैं उसने, उसे देखने का यह कितना शुभ सुन्दर अवसर मिला। उसने पिता को, ससुर को, समाज को भरे आनंद से छलकते हृदय से बार-बार धन्यवाद किया। साथ युवती बहू का घूंघट उठा चन्दमुख को देखने की चकोर-लालसा प्रबल हो उठी। डाकगाङी पूरी रफ्तार से जा रही थी।
विजय उठकर बहू के पास चलकर बैठा। सर्वांग कांप उठा। घूंघट उठाने के लिये हांथ उठाया। कलाई कांपने लगी। उस कंपन में कितना आनन्द है। रोंए-रोएं के भीतर आनन्द की गंगा बह चली।
विजय ने बहू का घूंघट उठाया, त्रस्त होकर चीख उठा, "ऎ!- तुम हो?"
'विवाह का यही सुख है!' ज्योतिर्मयी की आंखो से घृणा मध्यान्ह की ज्वाला की तरह निकल रही थी। छिः! मैंने यह क्या किया! यह वही विजय-संयत, शांत वही विजय है? ओह! कैसा परिवर्तन ! इसके साथ अब अपराधी की तरह, सिकुङकर, घर के कोने में मुझे सम्पूर्ण जीवन पार करना होगा। इससे मेरा वैधव्य शतगुण अच्छा था! वहां कितनी मधुर-मधुर कल्पनाओं में पल रही थी! वीरेन्द्र! तुम्हारे जैसा सिंह-पुरुष ऎसे सियार का भी साथ करता है? तुमने इधर डेढ महीने से मेरे लिये कितना दुःख, कितना कष्ट, मुझॆ और अपने इस अधम मित्र को सुखि करने के विचार से किया! १८ हजार खर्च किये! तुम्हारे मैनेजर-सत्यनारायण- मेरे कल्पित पिता- वह देवताओं का निर्मल परिवार। ज्योतिर्मयी मन ही मन और कितना, न जाने क्या-क्या सोंच रही थी।
विजय ने पूंछा, "तुम यहां कैसे आ गयीं?"
"विरेन्द्र से पूंछना।" ज्योतिर्मयी ने कहा।
ज्योतिर्मयी मिश्र खानदान मॆं मिल गई है पर वीरेन्द्र फिर विजय से नहीं मिला।

सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला'


सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' अधुनिक हिन्दी साहित्य के महान महान स्तन्भ थे। वे एक कवि, उपन्यासकार, निबन्धकार और कहानीकार थे। उन्होंने कई रेखाचित्र भी बनाये। उनके जीवन काल में उनकी प्रतिभा को पहचाना नहीं गया। उनके क्रान्तिकारी और स्वच्छन्द लेखन के कारण उनका साहित्य अप्रकाशित ही रहा।
निराला का पूरा जीवन, एक थोङे समय को छोङकर, दुर्भाग्य और विपत्ति का अनुक्रम था। उनका जन्म उन्नाव जिले के गढाकोला गांव के एक कान्यकुब्ज ब्राह्मण परिवार में, बसन्त पञ्चमी के दिन, १८९७ में हुआ। उनके पिता का नाम पं रामसहाय था, जो बंगाल के महिषादल राज्य के मेदिनीपुर जिले में एक सरकारी नौकरी करते थे। निराला का बचपन बंगाल के इस क्षेत्र में बीता जिसका उनके मन पर बहुत गहरा प्रभाव रहा है। तीन वर्ष की अवस्था में उनकी मां की मृत्यु हो गयी और उनके पिता ने उनकी देखरेख का भार अपने ऊपर ले लिया।
निराला की शिक्षा यहीं बंगाली माध्यम से शुरु हुई। हाईस्कूल पास करने के पश्चात उन्होंने घर पर ही संस्कृत और अंग्रेजी साहित्य का अध्ययन किया। प्रारम्भ से ही राम चरित मानस उन्हें बहुत प्रिय था। वे हिन्दी, बंगला, अंग्रेजी और संस्कृत भाषा में निपुण थे और श्री राम कृष्ण परमहंस, स्वामी विवेकानन्द और श्री रवीन्द्रनाथ टैगोर से विशेष रूप से प्रभावित थे।
निराला स्वच्छन्द प्रकृति के थे और स्कूल में पढने से अधिक उनकी रुचि घुमने, खेलने, तैरने और कुश्ती लङने इत्यादि में थी। संगीत में उनकी विशेष रुचि थी। अध्ययन में उनका विशेष मन नहीं लगता था। इस कारण उनके पिता कभी-कभी उनसे कठोर व्यवहार करते थे, जबकिउनके हृदय में अपने एकमात्र पुत्र के लिये विशेष स्नेह था।
हाईस्कूल करने के पश्चात वे लखनऊ और उसके बाद गढकोला (उन्नाव) आ गये। पन्द्रह वर्ष की अल्पायु में उनका विवाह मनोहरा देवी से हो गया। रायबरेली जिले में डलमऊ के पं. रामदयाल की पुत्री मनोहरा देवी सुन्दर और शिक्षित थीं, उनको संगीत का अभ्यास भी था। पत्नी के जोर देने पर ही उन्होंने हिन्दी सीखी।
इसके बाद अतिशीघ्र ही उन्होंने बंगला के बजाय हिन्दी में कविता लिखना शुरु कर दिया। बचपन के नैराश्य और एकाकी जीवन के पश्चात उन्होंने कुछ वर्ष अपनी पत्नी के साथ सुख से बिताये., किन्तु यह सुख ज्यादा दिनों तक नहीं टिका और उनकी पत्नी की मृत्यु उनकी २० वर्ष की अवस्था मॆं ही हो गयी। बाद में उनकी पुत्री जो कि विधवा थी, की भी मृत्यु हो गयी। वे आर्थिक विषमताओं से भी घिरे रहे। ऎसे समय में उन्होंने विभिन्न प्रकाषकों के साथ प्रूफ रीडर के रूप मॆं काम किया, उन्होंने 'समन्वय' का भी सम्पादन किया।
निराला को सम्मान बहुत मिला। परन्तु उनके संघर्ष के स्तर और संदर्भ को समझना उनके विरोधियों के लिये जितना मुश्किल था, उतना ही उनके प्रशंसको के लिये भी।
अंततः अपने मानसिक और शारीरिक संघर्ष को झेलते हुये निराला की मृत्यु दारागंज ( इलाहाबाद) में १५ अक्टूबर १९६१ में हो गयी।
प्रमुख कृतियां:-
कविता संग्रह: परिमल,अनामिका, गीतिका, कुकुरमुत्ता, आदिमा, बेला, नये पत्त्ते, अर्चना, आराधना, तुलसीदास, जन्मभूमि।
उपन्यास: अप्सरा, अल्का, प्रभावती, निरूपमा, चमेली, उच्च्श्रंखलता, काले कारनामे।
कहानी संग्रह: चतुरी चमार, शुकुल की बीवी, सखी, लिली, देवी।
निबन्ध संग्रह: प्रबन्ध-परिचय, प्रबन्ध प्रतिभा, बंगभाषा का उच्चरन, प्रबन्ध पद्य, प्रबन्ध प्रतिमा, चाबुक, चयन, संघर्ष।
आलोचना: रविन्द्र-कविता-कन्नन।
अनुवाद: आनन्द मठ, विश्व-विकर्ष, कृष्ण कान्त का विल, कपाल कुण्डला, दुर्गेश नन्दिनी, राज सिंह, राज रानी, देवी चौधरानी, युगलंगुलिया, चन्द्रशेखर, रजनी, श्री रामकृष्णा वचनामृत, भारत में विवेकानन्द, राजयोग।

Thursday, December 10, 2009

मैंने भी किया मतदान

जब मेरे मित्र ने मुझसे मतदान करने के लिये कहा तो तमाम उदासीन मतदाताओं की तरह मैंने भी अनिच्छा जाहिर कर दी। मित्र ने जब जोर दिया कि इस देश की आधी आबादी तक इस जल्दी-जल्दी आने वाले राष्ट्रीय पर्व पर मतदान करती है। इसलिये वक्त के साथ चलने के लिये मतदान करने वाले लोगों में नाम शुमार करना जरूरी है, इस पर मैंने जवाब दिया कि जो आधी आबादी मतदान नहीं करती है, मैं उसमें शामिल होना पसंद करूंगा। इसके कई फायदे भी हैं। बिना वोट डाले मतदान करने वाली आधी आबादी को हासिल होने वाली सुविधाओं का उपयोग मैं भी कर सकता हूं। महंगाई, गन्दगी बेरोजगारी, असुरक्षा जैसी जब तमाम दिक्कतों से मुझ जैसे मतदान न करने वाले लोग पीड़ित हैं उसी पीड़ा से मतदान करने वाले लोग भी ग्रसित हैं तो मेरे जैसों में और उन जैसों में क्या फर्क है?
मित्र ने जब यह कहा कि मेरे पास शताब्दी में पहली और आखिरी बार मतदान करने का यह आखिरी अवसर है तो मैं निरुत्तर हो गया। वास्तव में यह ऎसा अवसर था जिसका लाभ न उठाने पर अगली शताब्दी में मुझे अफसोस होता। मैं नहीं चाहता था कि इस शताब्दी में किये गये कुकर्मों का फल अगली शताब्दी में भुगतूं। इसलिये मैं अपने मित्र की राय से सहमत हो गया। मैं मतदान के लिये मित्रों के साथ निकल पड़ा। मैंने देखा कि सड़क के किनारे तख्त पर पंडो की तरह कुछ लोग बैठे थे जिनके पास सिर झुकाये हुये कुछ लोग किसी लिस्ट में अपना नाम खोज रहे थे। जैसे अक्सर लाटरी की दुकान पर लोग सिर झुकाये नम्बर मिलाते नज़र आते हैं। सिर झुकाये - झुकाये ही वापस भी चले जाते हैं। कम से कम यहां अपना नाम मिल जाने पर सिर उठाकर चलने के अवसर ज्यादा थे इसलिये मैं भी अपना नाम तलाशने वहां पहुंच गया।
बहुत खोजने पर एक वोटर लिस्ट में मुझे मेरा नाम दिख ही गया। वोटर लिस्ट में अपना नाम देखते ही मुझे गर्व का अहसास हुआ क्योंकि बहुत से लोगों के नाम लिस्ट में नहीं मिल रहे थे और उनके चेहरे पर निराशा के भाव स्प्ष्ट दिख रहे थे। मैं भी कैसा मूर्ख था। जिसके लिये लोग परेशान घूम रहे थे, उस अवसर को मैं यूं ही गंवा रहा था। विजय के भाव से मैं मतदान केन्द्र पर पहुंचा तो वहां की सूची में मुझे मेरा नाम नहीं मिला। मैं झटका खा गया। मतदान के लिये अचानक मैं बेताब हो गया था और इसी चक्कर में बूथों के चक्कर लगाने लगा।
कई बूथों के चक्कर लगाने पर मुझे एक बूथ में अपना नाम मिल ही गया। पीठासीन अधिकारी से कुछ देर की बहस के बाद मुझे पता चला कि मेरा नाम दो अलग-अलग सूचियों में दर्ज है अर्थात दो अलग-अलग केन्द्रों पर। इस अहसास के साथ ही मैं दोहरे उल्लास से भर गया कि मेरा नाम दो-दो जगहों पर दर्ज है। लोग एक सूची में नाम पाने को तरस रहे थे, और मेरा नाम दो-दो सूची में था, वाह!
जब मैंने इलैक्ट्रानिक मशीन पर बतन दबाया और मुझे बताया गया कि मेरा वोट पड़ गया है तो मुझे विश्वास ही नहीं हुआ। क्या इतनी जल्दी मैंने देश के भाग्य का फैसला कर दिया था? एक अजीब सी रिक्तता का आभास होने लगा था। मैंने अपनी भावना से जब अपने मित्र को अवगत कराया तो वह मुस्कुराने लगे, "क्या दोबारा वोट डालने की इच्छा हो रही है? अभी मन भरा नहीं है? चलिये, एक और वोट डाल दीजिये।"
मैंने सोंचा कि वे मजाक कर रहे हैं। पीठासीन अधिकारी बैठे हैं, तमाम पार्टियों के एजेन्ट बैठे हैं, पुलिस मौजूद है। ऎसे में दूसरा वोट? और सबसे बड़ी बात तो उंगली पर स्याही भी लग चुकी है उसे कैसे छुपायेंगे?
मेरा अंतर्द्वन्द मित्र की समझ में आ गया, " चिन्ता मत करिये, कुछ नहीं होगा, चलिये वोट डालिये।" यह कहकर उन्होंने जेब से एक पर्ची निकालकर मुझे थमाया जिस पर राम सुमेर सोनकर लिखा हुआ था। मैं अपनी जगह से नहीं हिला तो मित्र ने मुझे समझाया, "यहां बैठे लोगों से आतंकित होने की आवश्यकता नहीं है, सभी लोग अपने हैं। कहीं कुछ नहीं होगा। मैं साथ में जो हूं।"
मेरी हिम्मत मेरा साथ छोड़ गई थी। मान भी लिया कि ये सब लोग नहीं बोलेंगे लेकिन अपनी नैतिकता भी तो कोई चीज़ होती है। मैं किस मुंह से सबके सामने से गुजरुंगा? कहीं पकड़ गया तो लोग क्या कहेंगे? वैसे भी बूथ कैप्चरिंग के कोई चिन्ह नहीं दिख रहे थे। सभी लोग शान्ति पूर्वक अपना काम कर रहे थे। ऎसे लोगों से बिके हुये होने की उम्मीद कैसे की जा सकती थी?
मित्र ने मुझे समझाया कि यहां पर जितने पोलिंग ऎजेन्ट बैठे हैं , सब अपने हैं। भले ही वे किसी भी पार्टी के ऎजेन्ट दिख रहे हों, लेकिन हैं अपने आदमी। आप घबरा क्यों रहे हैं? अच्छा आप, मेरे पीछे -पीछे रहिये। बोलियेगा कुछ नहीं।
मैं मित्र के पीछे खड़ा हो गया। पर्ची दिखाई तो दस्तखत करने के लिये कहा गया। राम सुमेर के नाम का हस्ताक्षर कर दिया तो स्याही लगाने वाले के पास पहुंचा।
उसने मेरी उंगली में लगी स्याही देखी तो मित्र ने उसे कुछ इशारा कर दिया। उसने स्याही के ऊपर दुबारा स्याही लगाकर मुझे वोटिंग मशीन के पास जाने को कहा। मेरा दिल जोरों से धडक रहा था। बटन दबाने तक मुझे पकड़े जाने का अहसास जोरों से होने लगा था लेकिन बटन दबाते ही जैसे सारा भय उड़न छू हो गया। मैं सही सलामत बूथ से बाहर निकला तो ऎसा लगा कि चुनाव जीत गया हूं।
मेरे मित्र ने मेरी तरफ मुस्कुराते हुये देखा और मुझसे पूंछा कि कौन सा बटन दबाया था? मैंने बताया कि टेंशन के कारण मुझे याद ही नहीं रहा कि कौन सा बटन दब गया था। मेरे मित्र ने अपने माथे पर हांथ मारते हुये कहा कि 'नास कर दिया।' जाओ एक और वोट डालकर आओ। यह कहते हुये उन्होंने एक और पर्ची निकालकर मुझे दे दी और बूथ पर किसी को इशारा करते हुये कहा कि 'जरा इनका वोट भी डलवा देना।'
इस बार मैंने बिना किसी शर्म, हिचक और भय के मतदान कर दिया। वक्त वक्त की बात है। आधे घन्टे के भीतर मेरी ज़िन्दगी और दृष्टि तक बदल गई थी। कहां मैं वोट डालना नहीं चाहता था और कहां एक ही बूथ पर तीन तीन बार वोट डाल चुका था। मेरी हिम्मत बढ चुकी थी। अचानक मुझे मेरी एक रिश्तेदार दिखाई दीं। अपना रौब गालिब करने के लिये मैं उनके पास पहुंचा और पूंछा कि क्या आप दोबारा वोट डालना चाहेंगी?
आगे की बातचीत में वही सब कुछ हुआ जो थोड़ी देर पहले मेरे साथ हुआ था। मैंने महिला को तैयार कर लिया था और उसके लिये पर्ची मांग ली थी। लेकिन जब वह महिला स्याही लगाने वाले के पास पहुंची तो हांथ दिखाने से मना कर दिया। वह रंगे हांथो नहीं पकड़ना चाह्ती थीं, या फिर उनके सिद्वान्त मुझसे ज्यादा मजबूत थे। कुछ देर की जिद के बाद अंततः बिना स्याही लगाये ही उसे मतदान करने की अनुमति दे दी गई। अनुभव के नय-नये क्षितिज मेरे सामने खुलने लगे थे।
अब मैंने अपनी दृष्टि खोलकर जब मतदान केन्द्र पर किसी तरह का बाहरी कब्जा नहीं था बल्कि सभी के भीतरी तार जुड़े हुये थे। विभिन्न पार्टियों के लोगों का दबदबा कायम था। कोई किसी के मामले में हस्तक्षेप नहीं कर रहा था। जो कोई अपने साथियों को वोट डालने के लिये ला रहा था, उसके वोट पड़ जा रहे थे। भले ही उसका नाम मतदाता सूची में हो या न हो या वह पहले भी चार बार वोट डाल चुका हो।
हां, इतनी सावधानी जरूर बरती जा रही थी कि एक ही बूथ पर एक ही व्यक्ति से कई बार मतदान न कराकर मतदाता की सेवा कई बूथों पर ली जा रही थी। सबकी अपेक्षा थी कि मतदान शान्तिपूर्ण हो। कोई लफड़ा न हो। किसी की नौकरी या प्रतिष्ठा खतरे में न पड़े। यही चुनाव आयोग चाहता है, यही निर्वाचन अधिकारी और यही प्रत्याशियों के समर्थक। जीते कोई भी लेकिन अशान्ति पैदा करके नहीं। यही है समय की पुकार!
--स्नेह मधुर

Thursday, December 3, 2009

सौन्दर्य

तुम कनक किरण के अन्तराल में
लुक-छिप कर चलते हो क्यों?

नत मस्तक गर्व वहन करते
यौवन के घन, रस-कन ढरते।
हे लाज भरे सौन्दर्य! बता दो
मौन बने रहते हो क्यों?

अधरों के मधुर कगारॊं में
कल-कल ध्वनि की गुंजारों में!
मधुसरिता- सी यह हंसी तरल
अपनी पीते रहते हो क्यों?

बेला विभ्रम की बीत चल्ली
रजनी गंधा की कली खिली-

अब सान्ध्य - मलय - आकुलित
दुकूल कलित हो, वों छिपते हो क्यों?
वे कुछ दिन कितने सुन्दर थे!
जब सावन - घन - सघन बरसते-
इन आंखों की छाया भर थे!
सुर धनु रंजित नव -जल धर से-
भरे, क्षितिज व्यापी अम्बर से,
मिले चूमते जब सरिता के ,
हरित फूल युग मधुर अधर से।
प्राण पपीहा के स्वर वाली-
बरस रही थी जब हरियाली-
रस जल कन या लती -मुकुल से-
जो मदकाते गन्ध विधुर थे,
चित्र खींचती थी जब चपला,
नील मेघ-पट पर वह विरला,
मेरी जीवन-स्मृति के जिसमें-
खिल उठते वे रूप मधुर थे।
[लहर- जयशंकर प्रसाद/ भारती भंडार, लीडर प्रेस-प्रयाग]

उठ उठ री लघु लोल लहर

उठ उठ री लघु लोल लहर
करुणा की नव अंगराई सी,
मलयानिल की परछाई सी,
इस सूखे तट पर छिटक छहर।
शीतल कोमल चिर कम्पन सी,
दुर्लभित हठीले बचपन सी,
तू लौट कहां जाती है री-
यह खेल खेल ले ठहर ठहर!
उठ-उठ गिर-गिर फिर-फिर आती,
नर्तित पद-चिन्ह बना जाती,
सिकता की रेखायें उभार-
भर जाती अपनी तरल सिहर!
तू भूल न री, पंकज वन में,
जीवन के इस सूने पन में,
ओ प्यार पुलक हे भरी धुलक!
आ चूम पुलिन के विरस अधर!

दो बूंद
शरद का सुन्दर नीलाकाश,
निशा निखरी, था निर्मल हास।
बह रही छाया पथ में स्वच्छन्द,
सुधा सरिता लेती उच्छवास।
पुलक कर लगी देखने धरा,
प्रकृति भी सकी न आंखे मूंद,
सुशीतल कारी शशि आया,
सुधा की मानो बङि सी बूंद।
हरित किसलय मय कोमल वृक्ष,
झुक रहा जिसका --- भार,
उसई पर रे मत वाले मधुप!
बैठकर भरता तू गुञ्जार,
न आशा कर तू अरे! अधीर
कुसुम रस- रस ले लूंगा मूंद,
फूल है नन्हा सा नादान,
भरा मकरन्द एक ही बूंद।
[झरना- जय शंकर प्रसाद ]

जयशंकर प्रसाद



जिस समय खङी बोली और आधुनिक हिन्दी साहित्य किशोरावस्था में पदार्पण कर रहे थे; काशी के 'सुंघनी साहू' के प्रसिद्व घराने में श्री जयशंकर प्रसाद का जन्म ३० जनवरी १८९० (संवत१९४६) में हुआ। व्यापार में कुशल और साहित्य सेवी , अपके पिता श्री देवी प्रसाद पर लक्ष्मी की कृपा थी। इस प्रकार प्रसाद का पालन पोषण लक्ष्मी और सरस्वती के कृपापात्र घराने में हुआ। एक अत्यन्त सात्विक और धार्मिक मनोवृत्ति का प्रभाव जो पूरे परिवार में वर्तमान था, प्रसाद जी के ऊपर बचपन से ही पङता सा जान पङता था।उनका बचपन अत्यन्त सुख से व्यतीत हुआ, वे अपनी माता के साथ अनेक तीर्थों की यात्राओं पर भी गये।
जिस समय उनके पिता की मृत्यु हुई ( १९०१) वे क्वींस कालेज में सातवीं कक्षा के विद्यार्थी थे। बङे भाई श्री शम्भू रत्न जी पर घर का सारा भार आ पङा। इसके कुछ दिन बाद प्रसाद जी को विवश होकर पढाई छोङकर दुकान पर बैठना पङा। पढाई छोङने के बाद भी वे अध्ययन में लगे रहे और घर पर ही उन्होंने अंग्रेजी, संस्कृत और हिन्दी में पढाई जारी रखी। आठ-नौ वर्ष की अवस्था मॆं ही अमरकोष और लघुकौमुदी कंटस्थ कर लेना अध्ययन की ओर उनकी गहरी निष्ठा का प्रमाण है। इसी आयु में उन्होंने ब्रजभाषा में कवित्त और सवैयों की रचना भी प्रारम्भ कर दी थी। कवि के अन्तर की व्याकुलता के लिये कहीं न कहीं कोई अभिव्यक्ति का मार्ग मिलना ही चाहिये। उनकी प्राम्भिक रचनायें इसी अचेतन व्याकुलता को व्यक्त करती हैं।
प्रसाद जी के सम्पूर्ण साहित्य में णीयति का बङा ही कौशलपूर्ण चित्रण मिलता है। सारे कर्म पुरुषार्थ पर अप्रत्यक्ष रूप से छाई हुई इस नीयति की विडम्बना प्रसाद-साहित्य की एक अप्रतिम विशेषता है। इस नीयति का रूप नाशकारी नहीं है। बहुत कुछ वह मनुष्य के कर्म क्षेत्र में निरपेक्ष होकर कूदने का आग्रह करती है और इसी स्थिति में आनन्द की अवधारण भी ठीक है। नीयति का यह स्वरूप कवि के निजी संघर्ष और भौतिक जीवन की विडम्बना की देन है। कुल सत्रह वर्षोंकी अवस्था में, बङे भाई के देहान्त से उन्हीं के ऊपर घर गॄहस्थी का सारा भार आ गया। एक ओर कवि की कलपना-अभिभूत मानस, दूसरी ओर यथार्त जीवन की कटु यंत्रणायें- उन्हीं के बीच प्रसाद जी का कलाकार जीवन निर्मित हुआ है। अध्ययन उनके इस जीवनानुभव को एक दार्शनिक और चिंतनात्मक आधार देने में सहायक हुआ है। भारतीय दर्शनों का अध्ययन और संस्कृत काव्य का अवगाहन करके प्रसाद जी ने एक शक्तिशाली और पूर्ण मानस-दर्शन की कल्पना की, जिसकी अनुभूति बहुत कुछ उनकी निजी यंत्रणाओं की देन है। उनका निर्माण और उनकी रचना सम्पूर्ण रूप से भारतीय है और भारतीयता के संस्कार उनके काव्य-साहित्य में और अधिक पुष्ट होकर आये हैं।
प्रसाद जी का जीवन कुल ४८ वर्ष का रहा है। इसी में उनकी रचना प्रक्रिया इसी विभीन्न साहित्यिक विद्याओं मॆं प्रतिफलित हुई कि कभी-कभी आश्चर्य होता है। कविता, उपन्यास, नाटक और निबन्ध- सभी में उनकी गति समान है। किन्तु अपनी हर विद्या मॆं उनका कवि सर्वत्र मुखरित है। वस्तुतः एक कवि की गहरी कल्पनाशीलता ने ही साहित्य को अन्य विद्याओं में उन्हें विशिष्ट और व्यक्तिगत प्रयोग करने के लिये अनुप्रेरित किया। उनकी कहानियों का अपना पृथक और सर्वथा मौलिक शिल्प है; उनके चरित्र-चित्रण का, भाषा-सौष्ठव का, वाक्यगठन का एक सर्वथा निजी प्रतिष्ठान है।
उनके नाटकों में भी इसी प्रकार के अभिनव और श्लाघ्य प्रयोग मिलते हैं। अभिनेयता को दृष्टि मॆं रखकर उनकी बहुत आलोचना की गई तो उन्होंने एक बार कहा भी था कि 'रंगमंच नटक के अनुकूल होना चाहिये न कि नाटक रंगमंच के अनुकूल।' उनका यह कथन ही नाटक रचना के आन्तरिक विधान को अधिक महत्वपूर्ण सिद्व कर देता है।
कविता, नाटक, कहानी, उपन्यास-सभी क्षेत्रों मॆं प्रसाद जी एक नवीन 'स्कूल' और नवीन जीवन-दर्शन की स्थापना करने में सफल हुये हैं। वे 'छायावाद' के संस्थापकों और उन्नायकों में से एक हैं। वैसे सर्वप्रथम कविता के क्षेत्र में इस नव-अनुभूति के वाहक वही रहे हैं और प्रथम विरोध भी उन्हीं को सहना पङा है। भाषा शैली और शब्द-विन्यास के निर्माण के लिये जितना संघर्ष प्रसाद जी को करना पङा है, उतना दूसओं को नही।
यह बहुत अंशो तक सच है कि कलाकार की आस्था उसके जीवन से बङी वस्तु होती है। जीवन तो चारों ओर की विपदाओं से घिरा होता है। उनसे परित्राण कहां! विश्वास और 'आस्था' क के रूप में कलाकार इस जीवन की क्षणिक अनुभूतियों को ऊपर उठाकर एक विशाल और कल्याण्कार मानव-भूमि की रचना करता है। प्रसाद जी ने भी अपने अल्पकालीन जीवन में इसी उच्च्तर संदेश को अपनी कृतियों के माध्यम से वाणी दी है।

प्रसाद जी द्वारा लिखे गये ग्रन्थ
काव्य कानन कुसुम
करुणालय
प्रेम्पथिक
महाराणा का महत्व
झरना
आंसू
लहर
कामायनी
नाटक कामना
विशाख
एक घूंट
अजातशत्रु
जनमेजय का नाग-यज्ञ
राज्यश्री
स्कन्दगुप्त
चन्द्रगुप्त
ध्रुवस्वामिनी
उपन्यास कंकाल
तितली
इरावती (अपूर्ण)
कहानी संग्रह छाया
आंधी
प्रतिध्वनि
इन्द्रजाल
आकाश दीप
निबन्ध संग्रह
काव्य और कला तथा अन्य निबन्ध
प्रसाद-संगीत

नाटकों में प्रयुक्त गीतों का एकत्र संकलन
चित्राधार (विविध)
कामायनी : आधुनिक सर्वश्रेष्ठ महाकाव्य
'कामायनी' छायावादी काव्य का एकमात्र महाकाव्य और आधुनिक साहित्य की सर्वश्रेष्ठ रचना मानी जाती है। इसमें मनु, श्रद्वा और इङा की पौराणिक कथा को लेकर युग की मानवता को समरसता के आनन्द का संदेश दिया गया है। आचार्य शुक्ल के शब्दों में, "यह काव्य बङी विशद कल्पनाओं और मार्मिक उक्तियों से परिपूर्ण है।"
प्रसाद का प्रकृति दर्शन मानव-सापेक्ष होने से उनका काव्य मानव के अत्यन्त मांसल और आकर्षक रूप वर्णन से भरा हुआ है। 'श्रद्वा' का रूप वर्णन हिन्दी साहित्य की अमूल निधि है। मानव जीवन के प्रति कवि का अगाध ममत्व है। इस ममत्व के मूल रूप में कवि का अति मानवीय रूप, जीवन की साधना और वास्तविकता है। इसलिये उसमें प्रेम और त्याग, अधिकार और आत्मविसर्जन, भोग और निग्रह दोंनो ही बातें पायी जाती हैं। अतीत को उन्होंने वर्तमान रूप मॆं ही देखा है। प्रसाद के सम्पूर्ण काव्य में करुणा और विषाद की भावना निष्क्रियता का संदेश न देकर मानव के महत्व और उसके जीवन मॆं आनन्द की प्रकृत अवस्थिति का निर्देश कर उसे जीवन -पथ पर आगे बढने के लिये प्रेरित करती है। प्रसाद के काव्य की यही सर्वश्रेष्ठ विशेषता है। उसमें जीवन की कर्मण्य हलचल और आशा का संगीत है।
प्रसाद काव्य का कलापक्ष
प्रसाद काव्य का कलाप्क्ष भी उसके भावपक्ष के समान ही उत्कृष्ट, प्रभावक और सुन्दर है। उनकी भाषा संस्कृत गर्भित होते हुये भी क्लिष्ट नहीं हो पायी है। शब्द-विन्यास, वस्तु-चयन, अलंकार योजना आदि स्भी की दृष्टि में भावों की व्यंजना सरस, सुन्दर, आकर्षक, प्रतीकात्मक और विशाल बनी है। रस-निरूपण में प्रसाद किसी रस विशेष को अपना लक्ष्य बनाकर नहीं चले हैं। सामान्य रूप से उनके काव्य का आरम्भ श्रघार से होकर उसकी परिणति शान्त या करुण-रस में होती है।

Monday, November 30, 2009

उन्माद प्रेमचन्द

मनहर ने अनुरक्त होकर कहा-यह सब तुम्हारी कुर्बानियों का फल है वागी। नहीं तो आज मैं किसी अन्धेरी गली में, किसी अंधेरे मकान के अन्दर अंधेरी जिन्दगी के दिन काट र्हा होता। तुम्हारी सेवा और उपकार हमेशा याद रहेंगे, तुमने मेरा जीवन सुधार दिया -मुझे आदमी बना दिया।
वागेश्वरी ने सिर झुकाये नम्रता से उत्तर दिया-यह तुम्हारी सज्जनता मानूं,मैं बेचारी भला तुम्हारी जिन्दगी क्या सुधारूंगी? हां, तुम्हारे साथ रहकर मैं भी एक दिन अदमी बन जाऊंगी। तुमने परिश्रम किया, उसका पुरस्कार पाया। जो अपनी मदद आप करते हैं उनकी मद परमात्मा भी करते हैं, अगर मुझ-जैसी गंवारन किसी और के पाले पङती, तो अब तक न जाने क्या गत बनी होती।
मनहर मानो इस बहस में अपना पक्ष-समर्थ करने के लिये कमर बांधता हुआ बोला-तुम जैसी गंवारन पर मैं एक लाख सजी हुयी गुङियों और रंगीन तितलियों को निछावर कर सकता हूं। तुमने मेहनत करने का वह अवसर और अवकाश दिया जिनके बिना कोई सफल हो ही नहीं सकता। अगर तुमने अपनी अन्य विलास प्रिय, रंगीन मिजाज बहनों की तरह मुझे अपने तकाजों से दबा रखा होता, तो मुझे उन्नति करने का अवरर कहां मिलता? तुमने मुझे निश्चिन्तता प्रदान की, जो स्कूल के दिनों में भी न मिली थी। अपने और सहकारियों को देखता हूं, तो मुझे उन पर दया आती है। किसी का खर्च पूरा नहीं पङता। आधा महीना भी नहीं जाने पाता और हांथ खाली हो जाता है। कोई दोस्तों से उधार मांगता है, कोई घरवालों को खत लिखता है। कोई गहनों की फिक्र में मरा जाता है कोई कपङों की। कभी नौकर की टोह में हैरान, कभी वैध की टोह में परेशान। किसी को शान्ति नहीं। आये दिन स्त्री-पुरुष मॆं जूते चलते हैं। अपना जैसा भाग्यवान तो मुझे कोई नहीं दीख पङता। मुझे घर के सारे आनन्द प्राप्त हैं और जिम्मेदारी एक भी नहीं। तुमने ही मेरे हौसलों को उभारा, मुझे उत्तेजना दी। जब कभी मेरा उत्साह टूटने लगता, तो तुम मुझे तसल्ली देती थीं। मुझे मालूम ही नहीं हुआ कि तुम घर का प्रबन्ध कैसे करती हो। तुमने मोटे से मोटा काम अपने हाथों से किया, जिससे मुझे पुस्तकों के लिये रुपयों की कमी न हो। तुम्ही मेरी देवी हो और तुम्हारी ही बदौलत आज मुझे यह सौभाग्य प्राप्त हुआ है। मैं तुम्हारी इन सेवाओं की स्मृति को हृदय में सुरक्षित रखूंगा वागी, और एक दिन वह आयेगा, जब तुम अपने त्याग और तप का आनन्द उठाओगी।
वागेश्वरी ने गदगद होकर कहा-तुम्हारे ये शब्द मेरे लिये सबसे बङे पुरस्कार हैं, मानू! मैं और किसी पुरस्कार की भूखी नहीं! मैंने जो कुछ तुम्हारी थोङी बहुत सेवा की, उसका इतना यश मुझे मिलेगा, मुझे तो आशा भी न थी।
मनहरनाथ का हृदय इस समय उदार भावों से उमङा हुआ था। वह यों बहुत ही अल्पभाषी, कुछ रूखा आदमी था और शायद बागेश्वरी के मन में उसकी शुष्कता पर दःख भी हुआ हो; पर इस समय सफलता के नशे ने उसकी वाणी मॆं पर लगा दिये थे। बोला- जिस समय मेरे विवाह की बात चल रही थी, मैं बहुत शंकित था। समझ गया कि मुझे जो कुछ होना था हो गया। अब सारी उम्र देवी जी की नाजबरदारी में गुजरेगी। बङे-बङे अंग्रेज विद्वानों की पुस्तकें पढने से मुझे विवाह से घृणा हो गयी थी। मैं इसे उम्र कैद समझने लगा था, जो आत्मा और बुधि की उन्नति का मार्ग बन्द क्र देती है, जो मनुष्य को स्वार्थ का भक्त बना देती है, जो जीवन के क्षेत्र को संकीर्ण कर देती है। मगर दो ही चार मास के बाद मुझे अपनी भूल मालूम हुयी। मुझे मालूम हुआ कि सुभार्या स्वर्ग की सबसे बङी विभूति है, जो मनुष्य को उज्जवल और पूर्ण बना देती है, जो आत्मोन्नति का मूलमन्त्र है। मुझे मालूम हुआ कि विवाह का उद्देश्य भोग नहीं, आत्मा का विकास है।
वागेश्वरी मनहर की नम्रता सहन नहीं कर सकी। वह किसी बात के बहाने से उठकर चली गयी।
मनहर और वागेश्वरी का विवाह हुये तीन साल गुजरे थे। मनहर उस समय एक दफ्तर में क्लर्क था। सामान्य युवकों की भांति उसे भी जासूसी उपन्यासों से बहुत प्रेम था। धीरे-धीरे उसे जासूसी का शौक हुआ। इस विषय पर उसने बहुत सा साहित्य जमा किया और बङे मनोयोग से उसका अध्ययन किया। इसके बाद उसने इस विषय पर स्वयं एक किताब लिखी। रचना में उसने ऎसी विलक्षण विवेचन-शक्ति का परिचय दिया, उसकी शैली भी इतनी रोचक थी, कि जनता ने उसे हाथों-हाथ लिया। इस विषय पर वह सर्वोत्तम ग्रन्थ था।
देश में धूम मच गयी। यहां तक कि इटली और जर्मनी-जैसे देशों से उसके पास प्रशंसा-[अत्र आये और इस विषय की पत्रिकाओं में अच्छी-अच्छी आलोचनाएं निकली। अन्त में सरकार ने भी अपनी गुण्ग्राहकता का परिचय दिया-उसे इंग्लैण्ड जाकर इस कला का अभ्यास करने के लिये वृत्ति प्रदान की। और यह सब कुछ वागेश्वरी की भहोरणा का शूभ-फल था।
मनहर की इच्छा थी कि वागेश्वरी भी साथ चले, पर वागेश्वरी उनके पांव की बेङी नहीं बनना चाहती थी। उसने घर रहकर सास-ससुर की सेवा करना ही उचित समझा।
मनहर के लिये इंग्लैण्ड एक दूसरी दुनिया थी, जहां उन्नति के मुख्य साधनों में एक रूपवती पत्नी का होना भी जरूरी था। अगर पत्नी रूपवती है, चपल है, वाणी कुशल है, प्रगल्भ है, तो समझ लो उसके पति को सोने की खान मिल गयी। अब वह उन्नति के शिखर पर पहुंच सकता है। मलोयोग और तपस्या के बलबूते पर नहीं, पत्नी के प्रभाव और आकर्षण के तेज पर। उस संसार में रूप और लावण्य व्रत के बन्धनों से मुक्त, एक अबाध सम्मपत्ति थी। जिसने किसी रमणी को प्राप्त कर लिया, उसकी मानो तकदीर खुल गयी। यदि कोई सुन्दरी कोई सहधर्मिणी नहीं है, तो तुम्हारा सारा उध्योग, सारी कार्य पटुता निष्फल है, कोई तुम्हारा पुरसाहाल न होगा; अतएव वहां रूप को लोग व्यापारिक दृष्टि से देखते थे।
साल ही भर के अंग्रेजी समाज के संसर्ग ने मनहर की मनोवृत्तियों में क्रान्ति पैदा कर दी। उसके मिजाज ने सांसारिकता का इतना प्रधान्य हो गया कि कोमल भावों के लिये वहां कोई स्थान ही न रहा। वागेश्वरी उसके विध्याभ्यास में सहायक होती थी, पर उस अधिकार और पद की ऊचाइयों तक न पहुंचा सकती थी। उसके त्याग और सेवा का महत्व भी अब मनहर की निगाहों में कम होता जा रहा था। वागेश्वरी अब उसे एक व्यर्थ सी वस्तु मालूम होती थी, क्योंकि भौतिक दृष्टि से हर एक वस्तु का मूल्य उससे होने वाले साथ पर ही अवलम्बित था। अपना पूर्व जीवन अब उसे हास्यास्पद जान पङता था। चंचल, हंसमुख, विनोदिनी अंग्रेज युवतियों के सामने वागेश्वरी एक हल्की तुच्छ सी वस्तु जान पङती-इस विधुत प्रकाश में वह दीपक अब मलिन पङ गया था। यहां तक कि शनैः शनैः उसका वह मलिन प्रकाश भी अब लुप्त हो गया।
मनहर ने अपने भविष्य का निष्चय कर लिया। वह भी एक रमणी की रूप नौका द्वारा ही अपने लक्ष्य तक पहुंचेगा। इसके सिवा कोई और उपाय न था।

रात के नौ बजे थे। मनहर लंदन के एक फैशनेबल रेस्ट्रां में बना-ठना बैठा था। उसका रंग-रूप और ठाठ-बाट देखकर सहसा कोई नहीं कह सकता था कि वह अंग्रेज नहीं है। लंदन ने भी उसके सौभाग्य ने उसका साथ दिया था। उसने चोरी के कई गहरे मुआमलों का पता लगा लिया था, इसलिये उसे धन और यश दोनो ही मिल रहा था। वह अब यहां के भरतीय समाज का प्रमुख अंग बन गया था, जिसके आथित्य और सौजन्य की सभी सराहना करते थे। उसका लबो-लहजा भी अंग्रेजों से मिलता जुलता था। उसके सामने मेज के दूसरी ओर एक रमणी बैठी हुई उनकी बातें बङे ध्यान से सुन रही थी। उसके अंग-अंग से यौवन ट्पका पङता था। भारत के अदभुत वृत्तान्त सुनकर उसकी आंखे खुशी से चमक रही थीं। मनहर चिङिया के सामने दाने बिखेर रहा था।
मनहर-विचित्र देश है जेनी, अत्यन्त विचित्र।पांच-पांच साल के दूल्हे तुम्हे भारत के सिवा कहीं देखने को नहीं मिलेंगे। लाल रंग के चमकदार कपङे, सिर पर चमकता हुआ लम्बा टोप, चेहर पर फूलों का झालर्दार बुर्का, घोङे पर सवार चले जा रहे हैं। दो आदमी दोनों तरफ़ से छतरी लगाये हुए हैं। हांथो में मेंहदी लगी हुयी है।
जेनी- मेंहदी क्यों लगाते हैं?
मनहर- जिससे हांथ लाल हो जायें। पैरों मीं भी रंग भरा जाता है। उंगलियों के नाखून लाल रंग दिये जाते हैं। वह दृष्य देखते ही बनता है।
जेनी-यह तो दिल में सनसनी पैदा करने वाला दृष्य होगा। दुल्हन भी इसी तरह सजायी जाती होगी?
मनहर-इससे कई गुनी अधिक। सिर से पांव तक सोने चांदी के गहनों से लदी हुयी। ऎसा कोई अंग नहीं जिसमें दो-चार जेवर न हों।
जेनी-तुम्हारी शादी भी इसी तरह हुयी होगी। तुम्हे तो बङा आनन्द आया होगा?
मनहर-हां, वही आनन्द आया था जो तुम्हे मेरी-गोराउण्ड पर चढने में आता है। अच्छी-अच्छी चीजे खाने को मिलती हैं, अच्छे कपङे पहनने को मिलते हैं। खूब नाच तमाशे देखता था और शहनाइयों का गाना सुनता था। मजा तो तब आता है जब दुलहन अपने घर से बिदा होती है। सारे घर में कुहराम मच जाता है। दुलहन हर एक से लिपट-लिपट कर रोती है, जैसे मातम कर रही हो।
जेनी-दुलहन रोती क्यों है?
मनहर-रोने का रिवाज चला आता है। हालांकि सभी लोग जानते हैं कि वह हमेशा के लिये नही जा रही है, फिर भी सारा घर इस तरह फूट फूट कर रोता है, मानो वह काले पानी भेजी जा रही हो।
जेनी-मैं तो इस तमाशे पर खूब हंसू।
मनहर-हंसने की बात ही है।
जेनी-तुम्हारीबीवी भी रोयी होगी?
मनहर-अजी कुछ न पूंछो, पछाङे खा रही थी, मानो मैं उसका गला घॊंट दूंगा। मएरी पालकी से निकलकर भागी जाती थी, पर मैंने जोर से पकङ कर अपनी बगल में बैठा लिया। तब मुझे दांत काटने दौङी।
मिस जेनी ने जोर का कहकहा मारा और हंसी के साथ लोट गयीं। बोलीं-हारिबल! हारिबल! क्या अब भी दांत काटती है?
मनहर-वह अब इस संसार में नहीं रही जेनी! मैं उससे खूब काम लेता था। मैं सोता था तो वो बदन में चम्पी लगाती थी, मेरे सिर में तेल डालती थी, पंखा झलती थी।
जेनी-मुझे तो विश्वास नहीं आता। बिल्कुल मूर्ख थी!
मनहर-कुछ न पूंछॊ।दिन को किसी के सामने मुझसे बोलती भी न थी, मगर मैं उसका पीछा करता रहता था।
जेनी-ओ!नाटी ब्वाय! तुम बङे शरीफ हो। थी तो रूपवती?
मनहर-हां उसका मुंह तुम्हारे तलवों जैसा था।
जेनी-नान्सेन्स! तुम ऎसी औरत के पीछे कभी न दौङते।
मनहर-उस वक्त मैं भी मूर्ख था जेनी।
जेनी-ऎसी मूर्ख लङकी से तुमने विवाह क्यों किया?
मनहर-विवाह न करता तो मां बाप जहर खा लेते।
जेनी-वह तुम्हे प्यार कैसे करने लगी?
मनहर-और करती क्या? मेरे सिवा दूसरा था ही कौन? घर से बाहर न निकलने पाति थी, मगर प्यार हममें से किसी को न था। वह मेरी आत्मा को और हृदय को सन्तुष्ट न कर सकती थी ,जेनी! मुझे उन दिनों की याद आती है, तो ऎसा मालूम होता है कि कोई भयंकर स्वप्न था। उफ! अगर वह स्त्री आज जीवित होती, तो मैं किसी अंधेरे दफ्तर में बैठा कलम घिस रहा होता। इस देश में आकर मुझे यथार्त ज्ञान हुआ कि संसार में स्त्री का क्या स्थान है, उसका क्या दायित्व है और जीवन उसके कारण कितना आनन्दप्रद हो जाता है। और जिस दिन तुम्हारे दर्शन हुये, वह तो मेरी जिन्दगी का सबसे मुबारक दिन था। याद है तुम्हे वो दिन? तुम्हारी वह सूरत मेरी आंखोंं में अब भी फिर रही है।
जेनी-अब मैं चली जाऊंगी। तुम मेरी खुशामद करने लगे।

भारत के मजदूरदल-सचिव थे लार्ड बारबर, और उनके प्राइवेट सेक्रेट्ररी थे मि.कावर्ड। लार्ड बार्बर भारत के सच्चे मित्र समझे जाते थे। जब कंजर्वेटिव और लिबरल दलों का अधिकार था, तो लार्ड बारबर भारत की बङे जोरों से वकालत करते थे। वह उन मन्त्रियों पर ऎसे ऎसे कटाक्ष करते थे कि उन बेचारों को कोई जवाब न सूझता था। एक बार वे हिन्दुस्तान आये थे और यहां कांग्रेस में शरीक हुये थे। उस समय उनकी उदार वक्तृताओं ने समस्त देश में आशा और उत्साह की एक लहर दौङा दी थी। कांग्रेस के जलसे के बाद वह जिस शहर में गये, जनता ने उनके रास्ते में आंखे बिछायीं, उनकी गाङियां खींची, उन पर फ़ूल बरसाये। चारों ओर से यही आवाज आती थी-यह है भारत का उद्वार करने वाला। लोगों को विश्वास हो गया कि भारत के सौभाग्य से अगर कभी लार्ड बारबर को अधिकार प्राप्त हुआ, तो वह दिन भारत के इतिहास में मुबारक होगा।
लेकिन अधिकार पाते ही लार्ड बारबर में एक विचित्र परिवर्तन हो गया। उनके सारे स्वभाव, उनकी उदारता, न्यायपरायणत, सहातुभूति ये सभी अधिकार के भंवर में पङ गये। और अब लार्ड बारबर और उनके पूर्वाधिकार के व्यव्हार में लेशमात्र भी अन्तर न था। वह भी वही कर रहे थे जो उनके पहले के लोगों ने किया। वही दमन था, वही जातिगत अभिमान, वही कट्टरता, वही संकीर्णता। देवता अधिकार के सिंघासन पर पांव रखते ही अपना देवत्व खो बैठा था। अपने दो साल के अधिकार काल में उन्होने सैकङों ही अपसर नियुक्त किये थे; पर उनमें एक भी हिन्दुस्तानी न था। भारत्वासी निराश होकर उन्हें 'डाईहार्ड' 'धन का उपासक' और 'साम्राज्यवाद का पुजारी' कहने लगे थे। यह खुला हुआ रहस्य था कि जो कुछ करते थे मि. कावर्ड करते थे। हक यह था कि लार्ड बारबर नीयत के जितने शेर थे, जितने दिल के कमजोर। हालांकि परिणाम दोनों दिशाओम में एक सा था।
यह मि. कावर्ड एक ही महापुरुष थे। उनकी उम्र चालीस से अधिक गुजर चुकी थी; पर अभी तक उन्होंने विवाह नहीं किया था। शायद उनका ख्याल था कि राजनीति के क्षेत्र में रहकर वे विवाह का आनन्द नहीं उठा सकते। वास्तव में नवीनता के मधूप थे।
उन्हे नित्य नये विनोद और आकर्षण, नित्य नये विलास और उल्लास की टोह रहती थी। दूसरों के लगाये हुये बाग की सैर करके चित्त को प्रसन्न कर लेना इससे कहीं सरल था कि अपना बाग आप लगायें और उसकी रक्षा और सजवट में अपना सिर खपायें। उनको व्यापारिक और व्याव्हारिक दॄष्टि में यह लटका उससे कहीं आसान था।
दोपहर का समय था। मि. कावर्ड नाश्ता करके सिगार पी रहे थे कि मिस जेनी रोज के अने की खबर हुयी। उन्होने तुरन्त आईने के सामने खङे होकर अपनी सूरत देखी,बिखरे बालों को सवांरा, बहुमूल्य इत्र मला और मुख से स्वागत की सहास छवि दर्शाते हुये कमरे से निकलकर मिस रोज से हांथ मिलाया।
जेनी ने कदम रखते ही कहा-अब मैं समझ गयी कि क्यों कोई सुन्दरी तुम्हारी बात नहीं पूंछती। आप अपने वादों को पूरा करना नहीं जानते।
मि. कावर्ड ने जेनी के लिये कुर्सी खींचते हुये कहा-मुझे बहुत खेद है मिस रोज कि कल मैं अपना वादा न पूरा कर सका। प्राइवेट सेक्रेट्ररी का जीवन कुत्तों के जीवन से भी हेय है। बार बार चाहता था कि दफ्तर से उठूं; पर एक न एक काल ऎसा आ जाता था कि रुक जाना पङ जाता था! मैं तुमसे क्षमा मांगता हूं। बाल में तुम्हे खूब आनन्द आया होगा?
जेनी-मैं तुम्हे तलाश करती रही। जब तुम न मिले तो मेरा जी खट्टा हो गया। मैं और किसी के साथ नहीं नाची। अगर तुम्हे नहीं जाना था तो मुझे निमन्त्रण क्यों दिया था।
कावर्ड ने जेनी को सिगार भॆंट करते हुये कहा-तुम मुझे लज्जित कर रही हो,जेनी! मेरे लिये इससे ज्यादा खुशी की बात और क्या हो सकती थी कि तुम्हारे साथ नाचता? एक पुराना बैचलर होने पर भी मैं उस सुख की कल्पना कर सकता हूं। बस यही समझ लो कि तङप-तङप कर रह जाता हूं।
जेनी ने कठोर मुस्कान के साथ कहा-तुम इसी योग्य हो कि बैचलर बने रहो। यही तुम्हारी सजा है।
कावर्ड ने अनुरक्त होकर उत्तर दिया-जेनी तुम बङी कठोर हो! तुम्ही क्या रमणियां सभी कठोर होती हैं। मैं कितनी ही पर्वशता दिखाऊं, तुम्हे विश्वास नहीं आयेगा। मुझे यह अरमान ही रह गया कि कोई सुन्दरी मेरे अनुराग और लगन का आदर करती।
जेनी- तुममें अनुराग हो भी तो? रमणियां ऎसे बहानेबाजों को मुंह नहीं लगाती।
कावर्ड-फ़िर बहानेबाज कहा। मजबूर क्यों नहीं कहती?
जेनी-मैं किसी को मजबुर नहीं मानती। मेरे लिये यह हर्ष और गौरव की बात नहीं हो सकती, कि आपको जब अपने सरकारी, अर्द्व सरकारी और गैर सरकारी कामोम से अवकाश मिले तो, आप मेरा मन रखने के लिये एक क्षण के लिये अपने कोमल चरणों को कष्ट दें। इसी कारण तुम अब तक झीक रहे हो।
कावर्ड ने गम्भीर भाव से कहा-तुम मेरे साथ अन्याय कर रही हो,जेनी! मरे अविवाहित रहने का क्या कारण है, यह कल तक मुझे खुद मालूम न था। कल आप ही आप मालूम हो गया।
जेनी ने उसका परिहास करते हुये कहा-अच्छा तो यह रहस्य आपको मालुम हो गया? तब तो आप सचमुच आत्मदर्शी हैं। जरा मैं भी तो सुनूं, क्या कारण था?
कावर्ड ने उत्साह के साथ कहा-अब तक कोई ऎसी सुन्दरी न मिली जो मुझे उन्मत्त कर सकती।
जेनी ने कठोर परिहास के साथ कहा-मेरा ख्याल था कि दुनिया में ऎसी औरत पैदा ही नहीं हुई, जो तुम्हे उन्मत्त कर सकती। तुम उन्मत्त बनाना चाहते हो, उन्मत्त बनना नहीं चाहते।
कावर्ड-तुम बङा अत्याचार करती हो जेनी!
जेनी-अपने उन्माद का प्रमाण देना चाहते हो?
कावर्ड-हृदय से जेनी! मैं उस अवसर की ताक में बैठा हूं।
उसी दिन शाम को जेनी ने मनहर से कहा-तुम्हारे सौभाग्य पर बधाई! तुम्हे वह जगह मिल गयी।
मनहर उछलकर बोला-सच! सेक्रेट्ररी से कोई बातचीत हुई थी?
जेनी-सेक्रेट्ररी से कुछ कहने की जरूरत ही नहीं पङी। सब कुछ कावर्ड के हांथो में है। मैंने उसी को चंग पर चढाया। लगा मुझे इश्क जताने। पचास साल की तो उम्र है, चांद के बाल झङ गये हैं, गालों पर झुर्रियां पङ गयी हैं, पर अभी तक आपको इश्क का ख्ब्त है। अप अपने को एक ही रसिया समझते हैं। उसके बूढे चोंचले बहुत ही बुरे मालूम होते थे; मगर तुम्हारे ल्ये सब कुछ सहना पङा। खैर मेहनत सफ़ल हो गयी है। कल तुम्हे परवाना मिल जायेगा। अब सफ़र की तय्यारी करनी चाहिये।
मनहर ने गदगद होकर कहा-तुमने मुझ पर बङा एहसान किया है,जेनी!

मनहर को गुप्तचर विभग में ऊंचा पद मिला। देश के राष्ट्रीय पत्रों ने उसकी तारी फ़ों के पुल बांधे, उसकी तस्वीर छापी और राष्ट्र की ओर से उसे बधाई दी। वह पहला भारटीय था, जिसे यह ऊंचा पद प्रदा किया गया था। ब्रिटिश सरकार ने सिद्व कर दिया था कि उसकी न्याय-बुधि जातीय अभिमान और द्वेश से उच्चतर है।
मनहर और जेनी का विवाह इंग्लैण्ड में ही हो गया। हनीमून का महीना फ़्रान्स में गुजरा। वहां से दोनो हिन्दुस्तान आये। मनहर का दफ़्तर बम्बई में था। वहीं दोनो एक होटल में रहने लगे। मनहर को गुप्त अभियोग की खोज के लिये अक्सर दौरे करने पङते थे। कभी कश्मीर, कभी मद्रास, कभी रंगून। जेनी इन यात्राओं में बराबर उसके साथ रहती। नित्य नये दृष्य थे, नये विनोद, नये उल्लास। उसकी नवीनता प्रिय प्रकृति के लिये आनन्द का इससे अच्छा और क्या सामान हो सकता था?
मनहर का रहन-सहन तो विदेशी था ही, घर वालों से भी उसका सम्बन्ध विच्छेद हो गया था। वागेश्वरी के पत्रों का उत्तर देना तो दूर रहा, वह उन्हे खोलकर पढता भी नहीं था। भारत में हमेशा उसे यह शंका बनी रहती थी कि कहीं घरवालों को उसका पता न चल जाये। जेनी से वह अपनी यथार्त स्थिति को छुपाये रखना चाहता था। उसने घरवालों को आने की सूचना तक न दी थी। यहां तक कि वह हिन्दुस्तानियों से बहुत कम मिलता था। उसके मित्र अधिकांश पुलिस और फ़ौज्के अफ़सर थे। वही उसके मेहमान होते। वाकचतुर जेनी सम्मोहनकला में सिद्वहस्त थी। पुरुषों के प्रेम से खेलना उसकी सबसे अमोदमय क्रीङा थी। जलाती थी, रिझाती थी, और मनहर भी उसकी कपट्लीला का शिकार बना रहता था। उसे वह हमेशा भूल-भुलैया मॆं रखती, कभी इतना निकट कि छाती पर सवार न कभी इतना दूर कि योजन का अन्तर-कभी निष्ठुर और कठोर, और कभी प्रेम-विह्वल और व्यग्र। एक रहस्य था, जिसे वह कभी समझता था और कभी हैरान रह जाता था।
इस तरह दो वर्ष बीत गये और मनहर और जेनी कोण की दो भुजाओं की भांति एक दूसरे से दूर होते गये। मनहर इस भावना को हृदय से न निकाल सकता था कि जेनी का मेरे प्रति एक विशेष कर्तव्य है। वह चाहें उसकी संकीर्णता हो या कुल मर्यादा का असर क इवह जेनी को पाबन्द देखना चाहता था। उसकी स्वच्छन्द वृत्ति उसे लज्जास्पद मालूम होती थी। वह भूल जाता था कि जेनी से उसके सम्पर्क का आरम्भ ही स्वार्थ पर अवलम्बित था। शायद उसने समझा था कि समय के साथ जेनी को अपने कर्तव्यों का ज्ञान हो जायेगा; हालांकि उसे मालूम होना चाहिये था कि टेढी बुनियाद पर बना हुआ भवन जल्द या देर से भूमिस्थ होकर ही रहेगा। और ऊंचाई के साथ उसकी शंका और भी बढती जाती थी। इसके विपरीत जेनी का व्यवहार परिस्थिति के बिल्कुल अनुकूल था। उसने मनहर को विनोदमय तथा विलासमय जीवन का एक साधन समझा था और उसी विचार पर वह अब तक स्थित थी। इस व्यक्ति को वह मन में पति का स्थान नहीम दे सकती थी, पाषाण प्रतिमा को वह अपना देवता न बना सकती थी। पत्नी बनना उसके जीवन का स्वप्न न था, इसलिये वह मनहर के प्रति अपने किसी कर्तव्य को स्वीकार नहीम करती थी। अगर मनहर अपनी गाढी कमाई उसके चरणों पर अर्पित करता था तो कोई अहसान न करता था। मनहर उसका बनाया हुआ पुतला, उसी का लगाया हुआ वृक्ष था। उसकी छाया और उसके फ़ल का भोग करना वह अपना अधिकार समझती थी।

मनोमालिन्य बढता गया। आखिर मनहर ने उसके साथ दावतों और जलसों पर जाना छोङ दिया; पर जेनी पूर्ववत सैर करने जाती, मित्रों से मिलती, दावते करती, और दावतों में शरीक होती। मनहर के साथ न जाने से उसे लेश्मात्र भी दुःख या निराशा नहीं होती थी; बल्कि वह शायद उसकी उदासीनता पर और प्रसन्न होती थी। मनहर इस मानसिक व्यथा को शराब के नशे में डुबोने का उध्योग करता। पीना तो उसने इंग्लैण्ड में ही शुरु कर दिया था, पर अब उसकी मात्रा बहुत बढ गयी थी। वहां स्फ़ूर्ति और आनन्द के लिये पीता था, यहां स्फ़ूर्ति और आनन्द को मिटाने के लिये। वह दिन-दिन दुर्बल होता जाता था। वह जानता था कि शराब मुझे पिये जा रही है, पर उसके जीवन कयही एक अवलम्ब रह गया था।
गर्मियों के दिन थे। मनहर एक मुआमले की जांच करने के लिये लखनऊ मॆं डेरा डाले हुये था। मुआमला बहुत संगीन था। उसे सेर उठाने की फ़ुरसत न मिलती थी। स्वास्थ्य भी बहुत खराब हो चला था, पर जेनी अपने सैर-सपाटे मॆम मग्न थी। आखिर उसने एक दिन कहा; मैं नैनीताल जा रही हूं। यहां की गर्मी मुझसे सही नहीं जाती।
मनहर ने लाल-लाल आंखे निकालकर कहा-नैनीताल में क्या काम है?
वह आज अपना अधिकार दिखाने पर तुल गया। जेनी भी उसके अधिकार की उपेक्षा करने पर तुली हुई थी। बोली- यहां कोई सोसायटी नही। सारा लखनऊ पहाङों पर चला गया है।
मनह्र ने जैसे म्यान से तलवार निकाल कर कहा-जब तक मैं य्हां हूं,तुम्हें कही जाने का अधिकार नहीं है। तुम्हारी शादी मेरे साथ हुयी है, सोसायटी के साथ नहीं। फ़िर तुम साफ़ देख रही हो मैं बीमार हूं, तिस पर भी तुम अपनी विलास प्रवत्ति को रोक नहीं सकतीं। मुझे तुमसे ऎसी आशा नहीं थी,जेनी! मैं तुमको शरीफ़ समझता था। मुझे स्वप्न मॆं भी गुमान न था कि तुम मेरे साथ ऎसी बेवफ़ाई करोगी।
जेनी ने अविचलित भाव से कहा-तो क्या तुम समझते थे, मैं भी तुम्हारी हिन्दुस्तानी स्त्री की तरह तुम्हारी लौण्डी बनकर रहूंगी और तुम्हारे तलवे सहलाऊंगी? मैं तुम्हे इतना नदान नहीं समझती। अगर तुम्हे हमारी अंग्रेज सभ्यता की इतनी सी बात नही मालूम, तो अब मालूम कर लो कि अंग्रेज स्त्री अपनी रुचि के सिवा और किसी की पाबन्द नहीं। तुमने मुझसे विवाह इसलिये किया था कि मेरी सहायता से तुम्हे सम्मान और पद प्राप्त हो। सभी पुरुष ऎसा करते हैं और तुमने भी वैसा ही किया। मैं इसके लिये तुम्हे बुरा नहीं कहती लिकिन जब तुम्हारा वह उद्देश्य पूरा हो गया, जिसके लिये तुमने मुझसे विवाह किया था, तो तुम मुझसे अधिक आशा कुओं रखते हो? तुम हिन्दुस्तानी हो अंग्रेज नहीं हो सकते। मैं अंग्रेज हूं हिन्दुस्तानी नहीं हो सकती; एसलिये हममें में से किसी को अधिकार नहीं है कि वह दूसरों को अपनी मर्जीका गुलाम बनाने की चेष्टा करे।
मनहर हतबुद्वि सा बैठा सुनता रहा। एक एक शब्द विष की घूंट की भांति उसके कंठ के नीचे उतर रहा था। कितना कठोर सत्य था! पद लालसा के इस प्रचण्ड आवेग में, विलास तृष्णा के उस अदम्य प्रवाह में वह भूल गया था कि जीवन में कोई ऎसा तत्व भी है, जिसके सामने पद और विलास कांच के खिलौनो से अधिक मूल्य नहीं रखते। वह विस्मृत सत्य इस समय अपने दारुण विलाप से उसकी मद्मग्न चेतना को तङपाने लगा।
शाम को जेनी नैनीताल चली गयी। मनहर ने उसकी ओर आंखे उठा कर भी नहीं देखा।

तीन दिन तक मनहर घर से न निकला। जीवन के पांच छः वर्षों मॆं उसने जितने रत्न संचित किये थे, जिन पर वह गर्व करता था; जिन्हे पाकर वह अपने को धन्य समझता था, अब परीक्षा की कसौटी पर जाकर नकली सिद्व हो रहे थे। उसकी अपमानित, ग्लानित, पराजित आत्मा एकांत रोदन के सिवा और कोई त्राण न पाती थी। अपनी टूटी झोपङी को छोङकर वह जिस जिस सुनहले कलश वाले भवन की ओर लपका था, वह मरीचिका मात्र थी और उसे अब फ़िर अपनी टूटी झोपङी याद आई, जहां उसने शांतिम प्रेम और आशीर्वाद की सुधा पी थी। यह सारा आडम्बर उसे काट खाने लगा। उस सरल, शीतल स्नेह केसामने ये सारी विभूतियां उसे तुच्छ सी जंचने लगीं। तीसरे दिन वह भीषण संकल्प करके उठा और दो पत्र लिखे। एक तो अपने पद से इस्तीफाथा, और दूसरा जेनी से अंतिम विदा की सूचना। इस्तीफे मॆं उसने लिखा- मेरा स्वास्थ्य नष्ट हो गया है और मैं इस भार को नहीं सम्भाल सकता। जेनी के पत्र में उसने लिखा-हम और तुम दोनो ने भूल की है और हमें जल्द से जल्द उस भूल को सुधार लेना चाहिये। मैं तुम्हे सारे बन्धनों से मुक्त करता हूं। तुम भी मुझे मुक्त कर दो। मेरा तुमसे कोई सम्बन्ध नहीं है। अपराध न तुम्हारा है, न मेरा। समझ का फेर तुम्हे भी था और मुझे भी । मैंने अपने पद से इस्तीफा दे दिया है और अब तुम्हारा मुझ पर कोई अहसान नहीं रहा। मेरे पास जो कुछ है, वह तुम्हारा है, वह सब मैं छोङे जाता हूं। मैं तो निमित्त-मात्र था स्वामिनी तुम थी। उस सभ्यता को दूर से ही सलाम है, जो विनोद और विलास के सामने किसी बन्धन को स्वीकार नहीम करती।
उसने खुद जाकर दोनों की रजिस्ट्री करायी और उत्तर का इंतजार किये बिना ही वहां से चलने को तैयार हो गया।

जेनी ने जब मनहर का पत्र पाकर पढा तो मुस्कुराई। उसे मनहर की इच्छा पर शासन करने का ऎसा अभ्यास पङ गया था कि पत्र से उसे जरा भी घबराहट नहीं हुयी। उसे विश्वास था कि दो चार दिन चिकनी-चुपङी बातें करके वह उसे फिर वशीभूत कर लेगी। अगर मनहर की इच्छा केवल धमकी देनी न होती, उसके दिल पर चोट लगी होती तो वह अब तक यहां न होता। कब का यह स्थान छोङ चुका होता। उसका यहां रहना ही बता रहा है कि वह केवल बन्दर घूङकी दे रहा है।
जेनी ने स्थिर चित्त होकर कपङे बदले और तब इस तरह मनहर के कमरे में आई, मानो कोई अभिनय करने स्टेज पर आई हो।
मनहर उसे देखते ही ठट्ठा मार कर हंसा। जेनी सहम कर पीछे हट गयी। इस हंसी में क्रोध का प्रतिकार न था। उसमें उन्माद भरा हुआ था। मनहर के सामने मेज पर बोतल और गिलास रखा हुआ था। एक दिन में उसने न जाने कितनी शराब पी ली थी। उसकी आंखो से जैसे रक्त उबला पङता था।
जेनी ने समीप आकर उसके कन्धे पर हांथ रखा और बोली-क्या रात भर पीते ही रहोगे? चलो आराम से लेटो, रात ज्यादा हो गयी है। घण्टॊ से बैठी तुम्हारा इंतजार कर रही हूं। तुम इतने निष्ठुर तो कभी नहीं थे।
मनहर खोया हुआ सा बोला-तुम कब आ गयीं वागी? देखो मैं कब से तुम्हे पुकार रहा हूं। चलो आज सैर कर आयें। उसी नदी के किनारे ,तुम वही अपना प्यारा गी सुनाना, जिसे सुनकर मैं पागल हो जाता था। क्या कहती हो, मैं बेमुरव्वत हूं? यह तुम्हारा अन्याय है वागी! मैं कसम खाकर कहता हूं, ऎसा एक दिन भी नहीं गुजरा जब तुम्हारी याद ने मुझे न रुलाया हो।
जेनी ने उसका कन्धा हिलाकर कहा-तुम यह क्या ऊल-जलूल बक रहे हो? वागी यहां कहां है?
मनहर ने उसकी ओर देखकर अपर्चित भाव से कुछ कहा, फिर जोर से हंसकर बोला- मैं यह न मानूंगा वागी! तुम्हे मेरे साथ चलना होगा। वहां मैं तुम्हारे लिये एक फूलों की एक माला बनाऊंगा।
जेनी ने समझ यह शराब बहुत पी गये हैं। बकझक कर रहे हैं। इनसे इस वक्त कुछ भी बात करना व्यर्थ है। चुपके से कमरे के बाहर चली गयी। उसे जरा सी शंका हुई थी। यहां उसका मूलोच्छेद हो गया। जिस आदमी का वाणी पर अधिकार नही, वह इच्छा पर क्या अधिकार रख सकता है?
उसघङी से मनहर को घरवालो की रट लग गयी। कभी वागेश्वरी को पुकारता, कभी अम्मां को ,कभी दादाको। उसकी आत्मा अतीत में विचरती रहती, उसातीत मॆं जब जेनी ने काली छाया की भांति प्रवेश नहीं किया था और वाग्र्श्वरी अपने सरल्व्रत से उसके जीवन में प्रकाश फैलाती थी।
दूसरे दिन जेनी ने उसे जाकर कहा-तुम इतनी शराब क्यों पीते हो? देखते नहीं तुम्हारी क्या दशा हो रही है?
मनहर ने उसकी ओर आश्चर्य से देखा-तुम कौन हो?
जेनी-तुम मुझे नहीं पहचानतेहो? इतनी जल्द भूल गये।
मनहर- मैंने तुम्हे कभी नहीं देखा। मैं तुम्हे नहीं पहचानता।
जेनी ने और अधिक बातचीत नहीं की। उसने मनहर के कमरे से शराब की बोतलें उठवा दीं और नौकरों को ताकीद कर दी कि उसे एक घूंट भी शराब की न दी जाय। उसे अब कुछ सन्देह होने लगा था। क्योंकि मनहर की दशा उससे कहीं शंकाजनक थी जितना वह सम्झती थी। मनहर का जीवित और स्वस्थ रहना उसके लिये आवश्यक था।इसी घोङे पर बैठकर वह शिकार खेलती थी। घोङे के बगैर शिकार का आनन्द कहां?
मगर एक सप्ताह हो जाने पर भी मनहर की दशा में की अंतर न हुआ। न मित्रों को पहचान्ता, न नौकरों को। पिछ्ले तीन वर्षों का जीवन एक स्वप्न की भांति मिट गया था।
सातवें दिन जेनी सिविल सर्जन को लेकर आयी तो मनहर का कहीं पता नहीं था।

पांच साल के बाद वागेश्वरी का लुट हुआ सुहाग फ़िर चेता। मां-बाप पुत्र के वियोग में रो-रोकर अन्धे हो चुके थे। वागेश्वरी निराशा में भी आस बांधे बैठी हुयी थी। उसका मायका सम्पन्न था। बार-बार बुलावे आते, बाप आया, भाई आया, पर धैर्य और व्रत की देवी घर से न टली।
जब मनहर भारत आया, तो वागेश्वरी ने सुना कि वह विलायत से एक मेम लाया है। फिर भि उसे आशा थी कि वह आयेगा, लेकिन उसकी आशा पूरी न हुयी। फिर उसने सुना वह ईसाई हो गया है। आचार-विचार त्याग दिया है। तब उसने माथा ठोंक लिया।
घर की व्यवस्था दिन दिन बिगङने लगी। वर्षा बन्द हो गयी और सागर सूखने लगा। घर बिका, कुछ जमीन थी वह बिकी, फिर गहनों की बारी आई। यहं तक कि अब केवल आकाशी वृत्तिथी। कभी चूल्हा जल गया, कभी ठंडा पङा रहा।
एक दिन संध्या समय वह कुऎ पर पानी भरने गयी थी के एक थका हुआ, जीर्ण, विपत्ति का मारा जैसा आदमी आकर कुऎ की जगत पर आकर बैठ गया। वागेश्वरी ने देखा तो मनहर! उसने तुरन्त घूंघट काढ लिया। आंखों पर विश्वास नहीं हुआ, फिर भी आनन्द और विस्मय की हृदय में फ़ुरेरियां उङने लगीं। रस्सी और कलसा कुऎ पर छोङकर लपकी हुयि घर आयी और सास से बोली-अम्मांजी, जरा कुऎ पर जाकर देखो कौन आया है। सास न कहा-तू पानी भरने गयी थी, या तमाशा देखने? घर में एक बूंद पानी की नहीम है। कौन आया है कुऎ पर?
'चलकर देख लो न'
कोई सिपाही प्यादा होगा। अब उनके सिवा कौन अने वाला है। कोई महाजन तो नहीं है?
'नही अम्मां तुम चली क्यों नहीं चलती?'
बूढी माता भांति-भांति की शंकाये करती हुयी कुऎ पर पहुंची, तो मनहर दौङकर उनके पैरों में लिपट गया। माता ने उसे छाती से लगाकर कहा-तुम्हारी यह दशा है, मानू? क्या बीमार हो? असबाब कहां है?
मनहर ने कहा-पहले कुछ खाने को दो अम्मा! बहुत भूखा हूं। मैं बङी देर से पैदल चला आ रहा हूं।
गांव मॆं खबर फैल गयी कि मनहर आया है। लोग उसे देखने दौङ पङे। किस ठाट से आया है? ऊंचे पद पर है। हजारों रुपये पाता है। अब उसके ठाट का क्या पूंछना! मेम भी साथ आयी है या नहीं?
मगर जब आकर देखा, तो आफत का मारा आदमी, फटेहाल, कपङे तार-तार, बाल बढे हुये, जैसे जेल से आया हो।
प्रश्नों की बौछार होने लगी-हमने तो सुना था तुम किसी ऊंचे पद पर हो।
मनहर ने जैसे किसी भूली बात को याद करने का विफल प्रयास किया-मैं! मैं तो किसी ओहदे पर नहीं।
'वाह! विलायत से मेम नहीं लाये थे?'
मनहर ने चकित होकर कहा-विलायत! कौन विलायत गया था?
'अरे भंग तो नहीं ख आये हो। विलायत नहीं गये थे?
मनहर मूढों की भांति हंसा-मैं विलायत क्या करने जाता?
'अजी तुमको वजीफा मिला नहीं था? यहां से तुम विलायत गये थे। तुम्हारे पत्र बराबर आते थे। अब कहते हो मैं विलायत गया ही नहीं। होश में हो, या हम लोगों को उल्लू बना रहे हो?'
मनहर ने उन लोगों की तरफ़ आंखे फाङ कर देखा और बोला-मैं तो कहीं नहीं गया था। आप लोग न जाने क्या कह रहे हैं।
अब इसमें सन्देह की गुन्जाइश न रही कि वह अपने होशोहवास में नहीं है। उसे विलायत जाने के पहले की सारी बातें याद थीं।गांव और घर के एक-एक आदमी को पहचानता था; लेकिन जब इंग्लैण्ड , अंग्रेज बीवी और ऊंचे पद का जिक्र आता तो भौचक्का होकर ताकने लगता। वागेश्वरी को अब उसके प्रेम में एक अस्वाभाविक अनुराग दीखता, जो उसे बनावटी मालूम होता था। वह चाहती थई कि उसके व्यवहार और आचरण में पहले जैसी बेतकल्लुफी हो। वह प्रेम का स्वांग नहीं, प्रेम चाहती थी। दस ही पांच दिनों में उसे ज्ञात हो गया कि इस विशेष अनुराग का कारण बनावट या दिखावा नहीं है, वरन कोई मानसिक विकार है। मनहर ने मां बाप का इतना अदब पहले कभी नहीं किया था। उसे अब मोटे से मोटा काम करने में कोई संकोच नहीं था। वह, जो बाजार से साग-सब्जी लाने में अपना अनादर समझता था, अब कुऎ से पानी खींचता, लकङ्यां फाङता और घर में झाङू लगाता थाऔर अपने घर में ही नहीं, सारे मुहल्ले में उसकी सेवा और नम्रता की चर्चा होती थी।
एक बार मुहल्ले में चोरी हो गयी। पुलिस ने बहुत दौङ-धूप की; पर चोरों का पता न चला। मनहर ने चोरी का पता ही नहीं लगा दिया, वरन माल भी बरामद करा दिया। इससे आस-पास के गांवो और मुहल्लों में उसका यश फैल गया। कोई चोरी होती तो लोग उसके पास दौङे आते और अधिकांश उध्योग उसके सफल भी होते। इस तरह उसकी जीविका की एक व्यवस्था हो गयी। वह अब वगेश्वरी के इशारों का गुलाम था। उसी की दिल्जोई और सेवा में उसके दिन कटते। अगर उसमें विकार या बीमारी का कोई लक्षण था तो ,तो वह इतना ही। यही सनक उसे सवार हो गयी थी।
वागेश्वरी को उसकी दशा पर दुःख होता; पर उसकी यह बीमारी उस स्वास्थय से उसे कहीम प्रिय थी, जब वह उसकी बात भी न पूंछता था।

छः महीनों के बाद एक दिन जेनी मनहर का पता लगाती हुयी आ पहुंची। हांथ में जो कुछ था, वह सब उङा चुकने के बाद अब उसे किसी आश्रय की खोज थी। उसके चाहने वालों में कोई ऎसा न था, जो उसकी आर्थिक सहायता करता। शायद अब जेनी को कुछ ग्लानि भी होती थी। वह अपने किये पर लज्जित थी।
द्वार पर हार्न की आवाज सुनकर मनहर बाहर निकला और इस प्रकार जेनी को देखने लगा मानो कभी देखा ही नहीं हो।
जेनी ने मोटर से उतरकर उससे हांथ मिलाया और अपनी आप-बिती सुनाने लगी-तुम इस तरह छिपकर मुझसे क्यों चले आये? और फिर आकर एक पत्र भी नहीं लिखा। आक्खिर मैंने तुम्हारे साथ क्या बुराई की थी। फिर मुझमें कोई बुराई देखी थी, तो तुम्हे था कि मुझे सावधान कर देते। छिपकर चले आने का क्या फायदा हुआ। ऎसी अच्छी जगह मिल गयी थी वोभी हांथ से निकल गयी।
मनहर काठ के उल्लू की भांति खङा रहा।
जेनी ने फिर कहा-तुम्हारे चले आने के बाद मेरे ऊपर जो संकट आये, वह सुनाऊं तो तुम घबरा जओगे। मैं इसी चिन्ता और दुःख से बीमार हो गयी। तुम्हारे बगैर मेरा जीवन निरर्थक हो गया। तुम्हारा चित्र देखकर मन को ढांढस देती थी। तुम्हारे पत्रों को आदि से अन्त तक पढना मेरे लिये सबसे मनोरंजक विषय था। तुम मेरे साथ चलो मैंने एक डाक्टर से बात की है, वह मस्तिष्क के विकारों का डाक्टर है।मुझ आशा है उसके उपचार से तुम्हे लाभ होगा।
मनहर चुपचाप विरक्त बव से खङा रहा, मानो न वह कूछ देख रहा है, न सुन रहा है।
सहसा वगेश्वरी निकल आयी। जेनी को देखते ही वह ताङ गयी कि यही मेरी यूरोपियन सौत है। वह उसे बङे आदर-सत्कार के साथ भीतर ले आयी। मनहर भी उनके पीछे-पीछे चला आया।
जेनी ने टूटी खाट पर बैठत हुये कहा। इन्होने मेरा जिक्र तो कियाही होगा। मेरी इनसे लंदन में शादी हुयी है।
वागेश्वरी बोली-यह तो मैं आपको देखते ही समझ गयी थी।
जेनी-इन्होने कभी मेरा जिक्र नहीं किया?
वागेश्वरी-कभी नहीं। इन्हें तो कुछ याद नहीं। आपको यहां आने में बङा कष्ट हुआ होगा?
जेनी-महीनों के बाद तब इनके घर का पता चला। वहां से बिना कुछ कहे सुने चल दिये।
'आपको कुछ मालूम है, इन्हे क्या शिकायत है?'
'शराब बहुत पीने लगे थे। आपने किसी डाक्टर को नहीं दिखाया?'
हमने तो किसी को नहीं दिखया।'
जेनी ने तिरस्कार से कहा-क्यों? क्या आप उन्हे हमेशा बीमार रखना चाहती हैं?
वागेश्वरी ने बेपरवाही से कहा-मेरे लिये तो इनका बीमार रहना इनके स्वस्थ रहने से कहीं अच्छा है। तब वह अपनी आत्मा को भुले हुए थे अब उसे पा गये।
फिर उसने निर्दय कटाक्ष करके कहा-मेरे विचार में तो वह तब बीमार थे, अब उसे पा गये।
जेनी ने चिढकर कहा-नान्सेंस! इनकी किसी विशेषज्ञ से चिकित्सा करानी होगी। यह जासूसू में बङे कुशल हैं। इनके सभी अफ़सर इनसे प्रसन्न थे। वह चाहें तो अब भी वह जगह उन्हें मिल सकती है। अपने विभाग मॆं ऊंचे से ऊंचेपद तक पहुंच सकते हैं। मुझे विश्वास है कि इनका रोग असाध्य नहीं है; हां, विचित्र अवश्य है। आप क्या इनकी बहन हैं?
वागेश्वरी ने मुस्कुराकर कहा-आप तो गाली दे रहीं हैं। यह मेरे स्वामी हैं।
जेनी पर मानो वज्रपात हुआ। उसके मुख पर से नम्रता का आवरण हट गया और मन में छुपा हुआ क्रोध जैसे दांत पीसने लगा।
उसकी गर्दन की नसें तन गयीं, दोनों मुट्ठियां बंध गयीं। उन्मत्त होकर बोली-बङा दगाबाज आदमी है। इसने मुझसे बङा धोका किया। मुझसे इसने कहा कि मेरी स्त्री मर गयी है। कितना बङा धूर्त है! यह पागल नहीं है। इसने पागलपन का स्वांग भरा है। मैं अदालत से इसकी सजा कराऊंगी।
क्रोधावेश के कारण वह कांप उठी। फिर रोते हुये बोली-इस दगाबाजी का मैं इसे मजा चखाऊंगी। ओह! इसने मेरा कितना घोर अपमान किया है। ऎसा विश्वास घात करने वाले को जओ दण्ड दिया जाय वह थोङा है। इसने कैसी मीठी-मीठी बातें करके मुझे फ़ांसा। मैने ही इसे जगह दिलायी, मेरे ही प्रयत्नों से यह बङा आदमी बना। इसके लिये मैने अपना घर छोङा, अपना देश छोङा और इसने मेरे साथ ऎसा कपट किया।
जेनी सिर पर हांथ रखकर बैठ गयी। फिर तैश में उठी और मनहर के पास जाकर उसको अपनी ओर खींचती हुयी बोली-मैं तुम्हे खराब करके छोङूंगी। तूने मुझे समझा क्या है_
मनहर इस तरह शान्त भाव से खङा र्हा, मानो उससे उसे कोई प्रयोजन ही नहीं है।
फिर वह सिंहनी की भांति मनहर पर टूट पङी और उसे जमीन पर गिराकर उसकी छाती पर चढ बैठी। वागेश्वरी ने उसका हांथ पकङकर अलग कर दिया।और बोली-तुम ऎसी डायन न होती, तो उनकी यह दशा क्यों होती?
जेनी ने तैश में आकर जेब से पिस्तौल निकाली और वागेश्वरी की तरफ़ बढी। सहसा मनहर तङपकर उठा, उसके हांथ से भरा हुआ पिस्तौल छीनकर फ़ेंक दिया और वागेश्वरी के सामने खङा हो गया। फिर ऎसा मुंह बना लिया मानो कुछ हुआ ही नही हो।
उसी वक्त मनहर की माताजी दोपहरी की नींद सोकर उठीं और जेनी को देखकर वागेश्वरी की ओर प्रश्न भरी आंखो से ताका।
वागेश्वरी ने उपहास भाव से कहा-यह आपकी बहू है।
बुढिया ठिनककर बोली-कैसी मेरी बहू? यह मेरी बहू बनने जोग है बंदरिया?
लङके पर न जाने क्या कर करा दिया, अब छाती पर मूंग दलने आयी है?
जेनी एक क्षण तक मनहर को खून भरी आंखो से देखती रही। फिर बिजली की भांति कौधकर उसने आंगन में पङा पिस्तौल उठा लिया और वागेश्वरी पर छोङना ही चाहती थी कि मनहर सामने आ गया। वह बेधङक जेनी के सामने चला गया। उसके हांथ से पिस्तौल छीन लिया और अपनी छाती में गोली मार ली।