Monday, November 30, 2009

प्रेमचंद



आधुनिक हिन्दी और उर्दू कथा साहित्य के पथ प्रदर्शक, मुंशी प्रेमचन्द का असली नाम धनपत राय था। उनका जन्म ३१ जुलाई १८८० को वाराणासी के निकट एक गांव लमही में हुआ था।उनके पिता मुंशी अजायबलाल डाक घर में अत्यन्त मामूली वेतन पाने वाले एक कर्मचारी थे। आठ वर्ष की अल्पायु में ही उन्होने अपनी माँ को खो दिया। उनकी दादी ने उनकी देखभाल करने की जिम्मेदारी ली प्रन्तु वे भी शीघ्र ही इस दुनिया को छोङकर चली गयीं।
उनकी प्राम्भिक शिक्षा एक मदरसे में मौलवी द्वारा हुयी जहां उन्होने उर्दू का अधययन किया। उनका विवाह १५ वर्ष की अल्पायु में, जब वे ९वीं कक्षा मॆं पढ रहे थे, हो गया; परन्तु यह विवाह चल नहीं सका और बाद में उन्होंने दोबारा एक बाल विधवा शिवरानी देवी से विवाह किया।
बाद में उनके पिता की भी मृत्यु हो गयी और १८९८ में इण्टरमीडीयेट के बाद उन्हे अपनी पढायी छोङनी पङी। वे एक प्राईमरी स्कूल मे अध्यापन का कार्य करने लगे और कई पदोन्नतियों के बाद वे ड्प्युटी इंस्पैक्टर आफ़ स्कूल बन गये। १९१९ में उन्होने अंग्रेजी, पर्षियन,और इतिहास विषयों से स्नातक किया। महात्मा गांधी के 'असहयोग आन्दोलन' में योगदान देते हुये उन्होने अंग्रेजी सरकार की नौकरी को त्याग दिया। उसके बाद उन्होने अपना सारा ध्यान अपने लेखन की ओर लगा दिया। उनकी पहली कहानी कानपुर से प्रकाशित एक पत्रिका 'ज़माना' में प्रकाशित हुयी। उन्होने अपनी प्रारम्भिक लघुकथाओं में उस समय की देश्भक्ति की भावना का चित्रण किया है। 'सोज़-ए-वतन' नाम से उनका देशभक्ति की कहानियों का पहला संग्रह १९०७ में प्रकाशित हुआ,जिसने ब्रिटिश सरकार का ध्यान १९१४ में आकृष्ट किया।
जब प्रेमचन्द ने हिन्दी में लिखना शुरु किया तो उस समय तक उनकी पहचान उर्दू कहानी कार के रूप में बन चुकी थी।
उन्होने अपने उपन्यास और कहानियों में जीवन की वास्तविकताओं को प्रस्तुत किया है और भारतीय गांवो को अपने लेखन का प्रमुख केन्द्रबिन्दु रखा है।उनके उपन्यासों में निम्न-मध्यम वर्ग की समस्याओं और गांवो क चित्रण है। उन्होने हिन्दू-मुस्लिम एकता पर भी बल दिया।
प्रेमचन्द को उर्दू लघुकथाओं का जनक कहा जाता है। लघु कथायें या 'अफ़साने' प्रेम्चन्द द्वारा ही शुरु किये गये। उनके उपन्यासों की तरह उनके अफ़साने भी समाज का आईना थे।
प्रेमचन्द पहले हिन्दी लेखक थे जिन्होने अपने लेखन में वास्तविकता का परिचय दिया। उन्होने कहानी को एक सामाजिक उद्देश्य से पथ-प्रदर्षित किया। उन्होने गांधी जी के कार्य में सहयोग देते हुये उनके राजनीति क और सामाजिक आदर्शों को अपनी लेखनी का आधार बनाया।
एक महान उपन्यास कार होने के साथ-साथ प्रेमचन्द एक समाज सुधारक और विचारक भी थे। उनके लेखन का उद्देश्य सिर्फ़ मनोरंजन कराना ही नहीं बल्कि सामाजिक कुरीतियों की ओर ध्यान आकृष्ट कराना है। वे सामाजिक क्रान्ति में विश्वास करते थे और उनका विचार था कि सभी को सुअवसर प्राप्त हो। उनकी मृत्यु १९३६ में हो गयी और तब से वो भारत ही नहीं अपितु अन्य देशों में भी उनका अध्ययन सदी के एक महान साहित्यकार के रूप में होता है।
उनकी प्रमुख रचनायें:-
उनके प्रमुख उपन्यास हैं-प्रेमा,वरदान, सेवासदन, प्रेमाश्रमा, प्रतिज्ञान, निर्मला, गबन, रंगभूमि, कायाकल्प, कर्मभूमि, गोदान, और एक अपूर्ण उपन्यास मंगलसूत्र।
उन्होने बहुत सी यादगार लघुकथाऎ लिखी। उनके प्रमुख अफ़सानों में कातिल की मा, जेवर का डिब्बा, गिल्ली डण्डा, ईदगाह, नमक का दरोगा, और कफ़न हैं। उनकी कहानियों के संग्रह प्रेम पचीसी, प्रेम बत्तीसी, वारदात, और ज़ाद-ए-राह के नाम से प्रकाशित हुये।

3 comments:

महफूज़ अली said...

बहुत अच्छा लगा यह आलेख.......

सागर said...

पहले तो पोस्ट अ कमेन्ट हाई लाइट नहीं होता... इसलिए शायद लोगों को आपसे जुड़ने में मुश्किल हो सकती है...

रही इस लेख की बात तो एक बार फिर से याद करने के लिए शुक्रिया...

संजीव कुमार said...

बहुत अच्छा लगा