

हिन्दी साहित्य के छयावादी काल के चार प्रमुख स्तंभों में सुमित्रानन्दन पन्त,जयशंकर प्रसाद और सूर्यकान्त त्रिपाठी निराला के साथ महादेवी जी की गिनती की जाती है.
शिक्षा और साहित्य प्रेम महदेवी जी को एक तरह से विरासत में मिला था. महादेवी जी में काव्यरचना के बीज बचपन से ही विधमान थे. छ: सात वर्ष की अवस्था में भगवान की पूजा करती हुयी मां पर उनकी तुक्बन्दी :
ठंडे पानी से नहलाती
ठंडा चन्दन उन्हे लगाती
उनका भोग हमें दे जाती
तब भी कभी न बोले हैं
मां के ठाकुर जी भोले हैं.
वे हिन्दी के भक्त कवियों की रचनाओं और भगवान बौध के चरित्र से अत्यन्त प्रभावित थीं. उनके गीतों में प्रवाहित करुणा के अनन्त स्त्रोत को इसी कोण से समझा जा सकता है. वेदना और करुणा उनके गीतों की मुख्य प्रवत्ति है. असीम दु:ख के भाव में से ही उनके गीतों का उदय और अन्त दोनो होता है.
उनकी कुछ प्रमुख रचनायें हैं-
स्म्रति की रेखायें ,दीप शिखा, निहार,रश्मि,नीरजा, सान्ध्य गीत
इसके अतिरिक्त श्रन्खला की कडियां, और अतीत के चलचित्र के नाम से उन्होने अनूठे रेखाचित्र हिन्दी को दिये.
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